(इंडिगो में आई समस्या के बाद एयरपोर्ट पर स्थिति)
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कई साल पहले बड़े गर्व से घोषणा की थी कि उनका सपना है कि देश का आम नागरिक, जो हवाई चप्पल पहनता है, वह भी हवाई जहाज में यात्रा करे। 'उड़े देश का आम नागरिक' (UDAN) योजना को इसी सपने के पर लगे पंख बताया गया था। यह नारा देश के एक बड़े वर्ग की आकांक्षाओं से जुड़ा, जिसने गरीबी और साधारणता को गर्व से पहनने वाले मोदी जी की यात्रा के साथ खुद को जोड़ लिया।
मगर, आज जब हम देश के हवाई अड्डों पर फंसे हजारों यात्रियों की कतारें, रद्द हो चुकी उड़ानों की सूचना और आसमान छूते किराए का भयानक मंजर देखते हैं, तो यह 'हवाई चप्पल' वाला वादा सिर्फ एक खोखला जुमला बनकर रह जाता है। सवाल यह नहीं है कि हवाई जहाज में अब कितने लोग बैठ रहे हैं, सवाल यह है कि उन यात्रियों को, खासकर आम आदमी को, कितनी इज्जत और सुविधा मिल रही है?
हाल ही में इंडिगो एयरलाइंस के साथ जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक कंपनी की परिचालन विफलता नहीं थी, बल्कि यह पूरी व्यवस्था की सामूहिक विफलता थी। एक साथ हजारों उड़ानें रद्द हुईं, लाखों यात्री एयरपोर्ट पर बेहाल हुए, और टिकट के दाम 80,000 से 90,000 रुपये तक पहुँच गए। यह मंजर चीख-चीखकर बता रहा था कि जिस 'आम आदमी' को हवाई यात्रा कराने का दम भरा गया था, आज वही आदमी हवाई अड्डों पर बेइज्जत, परेशान और लूटा जा रहा है।
डीजीसीए: बस कागजी शेर और नियम तोड़ने की अनुमति
समस्या सिर्फ एयरलाइन की नहीं है, बल्कि उस नियामक संस्था की है, जिसका काम यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करना है—यानी नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA)।
यह कोई पहली बार नहीं है जब देश के विमानन क्षेत्र में गड़बड़ी हुई हो। इससे पहले भी यात्रियों की शिकायतें, उड़ानों में अनियमितता और नियमों के उल्लंघन की खबरें आती रही हैं। लेकिन हर बार डीजीसीए क्या करता है? वह एक सख्त 'कारण बताओ नोटिस' जारी करता है। मीडिया में शोर मचता है, बयानबाजी होती है, और फिर… मामला ठंडा पड़ जाता है। इस बार भी वही हुआ।
इंडिगो संकट की जड़ फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (FDTL) नियमों के पालन में थी, जो पायलटों और क्रू सदस्यों को पर्याप्त आराम देने के लिए बनाए गए हैं—यानी सीधे तौर पर हवाई सुरक्षा से जुड़े नियम। जब एयरलाइन ने जानबूझकर या लापरवाही से इन नियमों को लागू नहीं किया, जिससे बड़े पैमाने पर व्यवधान हुआ, तो डीजीसीए ने एयरलाइन के सीईओ को नोटिस भेजा। यह तो अपेक्षित था।
मगर, जब स्थिति और बिगड़ी और सरकार पर दबाव बढ़ा, तो डीजीसीए ने जो किया, वह अविश्वसनीय और निंदनीय है: उसने परिचालन को सामान्य करने के नाम पर उन्हीं FDTL नियमों में अस्थायी छूट दे दी!
यह कैसी नियामक संस्था है? यह कैसा नागरिक उड्डयन नियामक है, जो नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनी को दंडित करने के बजाय, उसे उन्हीं नियमों से छूट देकर 'राहत' देता है? इसका सीधा मतलब यह है कि डीजीसीए यात्रियों की सुरक्षा और दीर्घकालिक अनुपालन की परवाह किए बिना, केवल तात्कालिक राजनीतिक और मीडिया दबाव को कम करने का काम कर रहा है। वह कागजी शेर बनकर रह गया है, जिसकी दहाड़ में दम नहीं, बल्कि केवल आत्मसमर्पण है।
डीजीसीए को पहले ही एयरलाइनों की क्रू प्लानिंग पर नजर रखनी चाहिए थी, न कि तब जागना चाहिए, जब लाखों यात्री एयरपोर्ट पर भूखे-प्यासे फंसे हों। उसकी यह कार्यशैली साफ़ बताती है कि वह सरकारी तंत्र के दबाव में काम करता है, जहां दिखावा, पारदर्शिता से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
नागरिक उड्डयन मंत्रालय: बयानबाजी और हवाई किराए का खेल
और बात जब दिखावे की आती है, तो केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री और मंत्रालय की भूमिका भी कम संदेहास्पद नहीं है।
जब संकट चरम पर पहुंचा, तब जाकर मंत्रालय हरकत में आया। मंत्री महोदय ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की, उच्च-स्तरीय जांच समिति बनाने की घोषणा की, और कहा कि दोषियों को 'कीमत चुकानी पड़ेगी'। यह सब बहुत अच्छा लगता है, मगर यह प्रतिक्रिया देरी से आई और इसका फोकस समस्या के दीर्घकालिक समाधान पर कम, बल्कि डैमेज कंट्रोल पर अधिक था।
मंत्री ने किराए पर लगाम लगाने के लिए दूरी-आधारित अधिकतम सीमा (Cap) निर्धारित की, जो स्वागत योग्य कदम था। लेकिन सवाल यह है: यह कैप तब क्यों लगाया गया, जब आम यात्रियों को 80,000 रुपये की चपत लग चुकी थी? क्या सरकार को पता नहीं था कि एकाधिकार (Monopoly)
के दौर में, जब एक बड़ी एयरलाइन लड़खड़ाती है, तो बाकी कंपनियां मिलकर मनमाने ढंग से किराया बढ़ाती हैं? यह कदम 'रोकथाम' नहीं, बल्कि 'घायल को मरहम' लगाने जैसा था, जब घाव बहुत गहरा हो चुका था।
इससे भी अधिक निराशाजनक तब हुआ, जब मंत्री महोदय ने संकट के बीच भी विपक्ष के नेता के राजनीतिक बयानों पर पलटवार करने में समय खर्च किया। संकट जनता का था, लेकिन प्राथमिकता राजनीति की थी। यात्रियों को राहत देने से ज़्यादा महत्वपूर्ण राजनीतिक स्कोर को सेटल करना था।
यह रवैया स्पष्ट करता है: सरकार और मंत्रालय समस्या को जड़ से उखाड़ने के बजाय, केवल सतह पर बयानबाजी करके मामले को शांत करने में यकीन रखते हैं।
किसे फायदा हुआ इस पूरे संकट से?
यह सबसे महत्वपूर्ण और तीखा सवाल है। विमानन क्षेत्र में उत्पन्न इस व्यापक समस्या से यात्रियों, अर्थव्यवस्था, और सरकार की छवि—सबको नुकसान हुआ। तो फिर फायदा किसे हुआ?
जवाब साफ़ है: एयरलाइंस को, खासकर उस प्रमुख एयरलाइन को जिसने नियमों का उल्लंघन किया।
- बाजार नियंत्रण: भारतीय घरेलू बाजार में इंडिगो का एकाधिकार (लगभग 61%)
है। जब संकट आया,
तो बाकी एयरलाइंस को मनमाना किराया वसूलने की खुली छूट मिल गई,
जिससे उन्होंने रिकॉर्ड मुनाफा कमाया।
- नियमों में छूट: सबसे बड़ी जीत इंडिगो की हुई। FDTL
जैसे महत्वपूर्ण सुरक्षा नियमों का पालन न करने पर उसे कड़ी सजा मिलने के बजाय,
डीजीसीए ने उसे अस्थायी राहत दे दी। यह संदेश गया कि अगर आप इतने बड़े हो जाते हैं कि आपका गिरना पूरी व्यवस्था को हिला दे,
तो आप नियम तोड़ सकते हैं और आपको बचाया जाएगा।
- सरकारी समर्थन का भाव: इस पूरी प्रक्रिया से यह भावना मजबूत हुई है कि सरकार की प्राथमिकता हमेशा उस विशाल कॉर्पोरेट संस्था को बचाना होती है,
जो देश की कनेक्टिविटी का आधार बन चुकी है,
भले ही इसके लिए यात्रियों के हित और सुरक्षा नियमों की बलि क्यों न देनी पड़े।
प्रधान मंत्री मोदी ने हवाई चप्पल वाले को हवाई जहाज में बिठाने का सपना देखा था। लेकिन आज हकीकत यह है कि हवाई जहाज में बैठे आम आदमी को भी हवाई चप्पल पहनने वाले से बदतर व्यवहार झेलना पड़ रहा है।
डीजीसीए को तत्काल आत्ममंथन करना चाहिए। सरकार को बयानबाजी और राजनीतिक रोटियां सेकने के बजाय, एक सख्त और दीर्घकालिक नीति बनानी चाहिए जो एयरलाइंस को यात्रियों की कीमत पर फलने-फूलने की अनुमति न दे। अन्यथा, 'हवाई चप्पल' का सपना सिर्फ एक मज़ाक बनकर रह जाएगा, और भारतीय नागरिक उड्डयन क्षेत्र हमेशा संकट और अव्यवस्था के बीच ही फंसा रहेगा।
- Abhijit
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