जल, जंगल और जमीन की लूट के बाद अब क्या भारत की सबसे प्राचीन रक्षक, 'अरावली पर्वतमाला' भी कॉर्पोरेट गिद्धों के निशाने पर है? यह सवाल आज इसलिए मौजूं है क्योंकि जिस पहाड़ ने सदियों से रेगिस्तान को दिल्ली-NCR की तरफ बढ़ने से रोका, जिसने करोड़ों लोगों की प्यास बुझाने के लिए भूजल को सहेज कर रखा, उसे आज विकास की वेदी पर बलि चढ़ाया जा रहा है।
हैरानी की बात यह है कि जब पूरा मुख्यधारा मीडिया सत्ता की चालीसा पढ़ने में व्यस्त है, तब 'रिपब्लिक मीडिया' के अर्नब गोस्वामी ने इस मुद्दे पर जो सवाल उठाए हैं, वे न केवल कड़वे हैं बल्कि इस देश के तंत्र की पोल खोलते हैं।
अरावली: सिर्फ पत्थर नहीं, हमारी जीवन रेखा है
अरावली कोई बेजान पत्थरों का ढेर नहीं है। यह उत्तर भारत का वह 'वॉटर रिचार्ज ज़ोन' है, जिसके बिना हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली का आधा हिस्सा रेगिस्तान बन जाएगा। लेकिन हाल ही में जिस तरह से अरावली की परिभाषा को बदला गया और 100 मीटर की ऊंचाई का जो 'तकनीकी खेल' खेला गया, उसने अरावली के 90% हिस्से को कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर धकेल दिया है। यह कोई इत्तेफाक नहीं है, यह एक सोची-समझी साजिश है ताकि बड़े उद्योगपति वहां बेखौफ होकर खनन (Mining) कर सकें और कंक्रीट के जंगल खड़े कर सकें।
सरकार और उद्योगपतियों की 'अपावन' जुगलबंदी
सरकारें कहती हैं कि वे 'विकसित भारत' बना रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या पर्यावरण को मटियामेट करके विकास संभव है? बड़े उद्योगपतियों की तिजोरियां भरने के लिए अरावली की पहाड़ियों को समतल किया जा रहा है। सत्ता और पूंजी का यह गठजोड़ इतना गहरा है कि नियम और कायदे इनके सामने बौने नजर आते हैं। जब सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों की आड़ लेकर पारिस्थितिकी (Ecology) को बर्बाद किया जाता है, तो समझ लेना चाहिए कि अब आम नागरिक के हिस्से में सिर्फ धूल और सूखा ही बचा है।
मीडिया की शर्मनाक खामोशी और अर्नब का प्रहार
भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा आज 'दरबारी' बन चुका है। जो सवाल बुनियादी होने चाहिए—जैसे पानी का संकट, प्रदूषण और पहाड़ों का गायब होना—उन पर चर्चा करने के बजाय ये 'लुटियंस चैनल' और '15 करोड़ी एंकर' सत्ता के एजेंडे को चमकाने में लगे हैं।
अर्नब गोस्वामी ने सही कहा है कि अगर अरावली नहीं बची, तो हम 'विकसित भारत' नहीं बल्कि 'पर्यावरणीय रूप से नष्ट भारत' होंगे। जब मीडिया अपना काम करना भूल जाए, तब ऐसे सवाल उठाना जरूरी हो जाता है जो सीधे सरकार की मंशा पर चोट करें। आखिर क्यों अन्य चैनल इस कॉर्पोरेट अतिक्रमण पर चुप्पी साधे हुए हैं? क्या उद्योगपतियों के विज्ञापन उनकी जुबान पर ताला लगा चुके हैं?
प्यास पत्थर नहीं बुझाते
अगर आज अरावली को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इतिहास की किताबों में पढ़ेंगी कि एक समय भारत में दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला हुआ करती थी जिसे कुछ लालची लोगों ने अपनी तिजोरियां भरने के लिए 'इरेज़' कर दिया। याद रहे, प्यास लगने पर कॉर्पोरेट के मुनाफे काम नहीं आएंगे, बल्कि वही पहाड़ और पानी काम आएंगे जिन्हें आज हम खुद अपने हाथों से नष्ट कर रहे हैं।
समय आ गया है कि हम विकास के इस 'विनाशकारी मॉडल' के खिलाफ आवाज उठाएं। अरावली बचेगी, तभी हम बचेंगे।
- Abhijit
22/12/2025
True
ReplyDeleteVery nice
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