Sunday, December 7, 2025

दिखावे की चमक और गंदगी का साम्राज्य: कहाँ है अहमदाबाद की 'स्वच्छता'?

(छारानगर में गंदगी का साम्राज्य. तस्वीरः कुशल बाटूंगे)

हाल ही में, देश के वार्षिक स्वच्छता सर्वेक्षण में अहमदाबाद शहर को 'स्वच्छ शहर' के प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाज़ा गया। यह खबर सुनते ही शहर के प्रशासनिक गलियारों में जश्न का माहौल छा गया। निगम के अधिकारियों ने कैमरे के सामने आकर अपनी उपलब्धियाँ गिनाईं, अख़बारों के पहले पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में शहर की "सफलता" की गाथा छपी, और स्थानीय नेताओं ने अपनी पीठ थपथपाई। यह एक ऐसा दृश्य था, जो एक प्रगतिशील, नागरिक-केंद्रित शासन का भ्रम पैदा करता है।

मगर, यह पुरस्कार केवल एक कागज़ी प्रमाण हैएक भव्य आवरण जिसके भीतर एक सड़ी हुई, गंदी और बदबूदार हकीकत दफ़न है।

सवाल यह है: क्या इस देश का 'स्वच्छता सर्वेक्षण' केवल चिकनी-चुपड़ी सड़कों, एयरपोर्ट के रास्तों और चुनिंदा पॉश इलाकों की चमक-दमक देखकर ही अपनी अंतिम राय बनाता है? क्या वह शहर का वह हिस्सा नहीं देखता, जहाँ देश का आम नागरिक, मज़दूर और वंचित वर्ग साँस लेने को मजबूर है? अगर देखता है, तो अहमदाबाद के छारानगर जैसी बस्तियाँ आज भी गंदगी के साम्राज्य क्यों बनी हुई हैं?

भवन्स के पत्रकारिता के मेरे छात्र कुशल बाटूंगे ने अपनी वीडियो रिपोर्ट के माध्यम से जो हकीकत कैमरे में क़ैद की है, वह इस 'स्वच्छता पुरस्कार' के दावे को सिर्फ़ चुनौती देती है, बल्कि उस पर कालिख पोत देती है। बटुंगे ने छारानगर के स्थानीय लोगों से बात की, और उनकी आपबीती सुनकर स्पष्ट हो जाता है कि निगम का सारा काम केवल दिखावा और आंकड़ेबाजी है, ज़मीनी बदलाव शून्य है।

स्वच्छता पुरस्कार: एक कागज़ी तमाशा

स्वच्छता का अर्थ केवल कचरा प्रबंधन नहीं है; इसका अर्थ है नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता और उनके मौलिक अधिकारों का सम्मान करना। जब कोई शहर राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छता का तमगा जीतता है, तो यह उम्मीद की जाती है कि शहर का हर कोना, हर बस्ती, बुनियादी साफ-सफ़ाई और सीवरेज व्यवस्था से युक्त होगी। लेकिन अहमदाबाद में हो रहा है इसका ठीक विपरीत।

यह विडंबना की पराकाष्ठा है कि जिस शहर को 'स्वच्छता' के लिए पुरस्कृत किया जाता है, उसी शहर के छारानगर जैसे इलाक़ों में पिछले आठ से नौ महीनों से नालियाँ ओवरफ्लो हो रही हैं। कल्पना कीजिए! आठ महीने! क्या निगम के अधिकारियों को आठ महीने तक शहर की एक पूरी बस्ती में बहते हुए गंदे पानी की बदबू और दृश्य दिखाई नहीं देते? क्या यह उनकी नज़र से चूक गया या यह जानबूझकर किया गया उपेक्षित व्यवहार है?

यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि स्वच्छता सर्वेक्षण की प्रक्रिया में ही गंभीर खामियाँ हैं। यह व्यवस्था वास्तविक बदलाव को नहीं, बल्कि डेटा प्रस्तुति और प्रबंधन की कुशलता को पुरस्कृत करती है। यह प्रशासन को प्रोत्साहित करती है कि वह समस्या को हल करने के बजाय उसे छिपाए। अहमदाबाद ने यही किया हैगंदगी को गरीब बस्तियों में धकेल दिया, जहाँ उसकी चीखें उच्चाधिकारियों के कानों तक नहीं पहुँचतीं, और चमकती सड़कों को चमका कर पुरस्कार हासिल कर लिया। यह जनता के साथ किया गया एक घिनौना छल है।

छारानगर की चीख़: गंदगी की कालिख

छारानगर की स्थिति केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक नैतिक पतन की कहानी है। पत्रकार कुशल बाटूंगे की रिपोर्ट में स्थानीय लोगों ने बताया कि ओवरफ्लो होती नालियों का पानी सड़कों, गलियों और यहाँ तक कि घरों के दरवाज़ों तक जमा हो जाता है। यह रुका हुआ, सड़ा हुआ पानीबीमारियों के प्रजनन केंद्ररोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गया है।

(छारानगर की गंदगी को बयान करता हुआ कुशल बाटूंगे की वीडियो रिपोर्ट)

बच्चे इस गंदे पानी से होकर स्कूल जाने को मजबूर हैं, बुज़ुर्ग घर से बाहर नहीं निकल सकते, और पूरा समुदाय हैजा, डेंगू, मलेरिया जैसी गंभीर बीमारियों के साये में जीने को मजबूर है। यह भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्तगरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकारका खुला उल्लंघन है।

निगम के सफाई कर्मचारियों का व्यवहार इस पूरे नाटक को और भी क्रूर बना देता है। लोगों का कहना है कि वे आते तो हैं, पर उनकी सफाई को 'टॉप टू बॉटम' (ऊपर-ऊपर) सफाई कहकर छोड़ दिया जाता है। इसका मतलब है कि सतह पर पड़े कुछ कूड़े को हटाया जाता है, लेकिन नौ महीने से जाम पड़े सीवर और नालियों की वास्तविक सफ़ाई या मरम्मत का काम छुआ भी नहीं जाता। यह केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का एक शर्मनाक तरीक़ा है, जिससे लगता है कि 'काम हो रहा है', जबकि ज़मीनी स्तर पर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।

यह कैसा विरोधाभास है? एक तरफ़ स्वच्छता का राष्ट्रीय पुरस्कार, दूसरी तरफ़ आठ महीने से ओवरफ्लो होती नालियों में डूबता एक इलाका। यह केवल एक ही बात साबित करता है: अहमदाबाद नगर निगम के लिए छारानगर के नागरिक 'दूसरे दर्जे' के नागरिक हैं।

निगम का अहंकार और जन-प्रतिनिधियों की विश्वासघात

जब छारानगर के निवासी, अपनी समस्या का समाधान खोजने के लिए, निगम के अधिकारियों के पास जाते हैं, तो उन्हें क्या मिलता है? अधिकारियों का वह पुराना, घिसा-पिटा 'कोरा आश्वासन' यह अधिकारियों का अहंकार है, जो उन्हें यह सोचने पर मजबूर करता है कि वे जनता को केवल आश्वासन के जुमले देकर शांत करा सकते हैं।

वे जानते हैं कि वे झूठ बोल रहे हैं। वे जानते हैं कि वे अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रहे हैं। लेकिन उनका मानना ​​है कि उनकी कुर्सी सुरक्षित है, क्योंकि यह बस्ती उनके वीआईपी रूट का हिस्सा नहीं है। यह प्रशासनिक संवेदनहीनता का एक जीता-जागता उदाहरण है, जहाँ अधिकारियों की प्राथमिकता 'जनसेवा' नहीं, बल्कि 'जन-प्रबंधन' बन गई हैजनता को चुप कराना, उनकी समस्याएँ सुलझाना नहीं।

इससे भी ज़्यादा निराशाजनक है स्थानीय कॉर्पोरेटर का रवैया। कॉर्पोरेटर, जो इस क्षेत्र का 'जन-प्रतिनिधि' है, जिसकी पहली और अंतिम ज़िम्मेदारी इस जनता के प्रति है, वह कहाँ है? बटुंगे की रिपोर्ट के अनुसार, वह 'जनसेवक' सिर्फ़ चुनावों के दौरान ही वोट मांगने आता है। एक बार चुनाव जीत जाने के बाद, वह अपनी जीत की कुर्सी पर विराजमान होकर, जनता की पीड़ा को पूरी तरह से भूल जाता है।

यह विश्वासघात है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का मज़ाक है। कॉर्पोरेटर जनता से यह कह रहा है कि उनका वोट उसके लिए केवल सत्ता हासिल करने का एक साधन था, और एक बार सत्ता मिल जाने के बाद, वह जवाबदेही से मुक्त है।

जवाबदेही और ज़मीनी न्याय की मांग

अहमदाबाद नगर निगम और गुजरात सरकार को यह समझना होगा कि 'स्वच्छ शहर' का पुरस्कार कोई स्थायी अलंकरण नहीं है। यह पुरस्कार, छारानगर जैसी हकीकत के सामने, एक मज़ाक बनकर रह गया है। यह दिखाता है कि निगम की पूरी मशीनरीऊपर से नीचे तकअपने कर्तव्य के निर्वहन में विफल रही है।

इस गंदगी के लिए कौन ज़िम्मेदार है? वह अधिकारी जिसने आठ महीने तक नालियों की गंदगी को अनदेखा किया? वह कॉर्पोरेटर जिसने जीतने के बाद क्षेत्र का दौरा करना ज़रूरी नहीं समझा? या वह शीर्ष नेतृत्व जिसने पुरस्कार की चमक में शहर के अंधेरे कोनों को देखना गवारा नहीं किया?

हम मांग करते हैं कि:

  1. तत्काल कार्रवाई: छारानगर और अहमदाबाद की ऐसी सभी बस्तियों में युद्ध स्तर पर सफ़ाई और सीवरेज मरम्मत का कार्य शुरू किया जाए।
  2. जवाबदेही तय हो: संबंधित निगम अधिकारियों और स्थानीय कॉर्पोरेटर की पहचान की जाए और उनकी घोर लापरवाही के लिए उन पर सख्त प्रशासनिक कार्रवाई हो।
  3. पुरस्कार की समीक्षा: स्वच्छता पुरस्कारों की प्रक्रिया की समीक्षा हो, ताकि वे केवल दिखावे पर नहीं, बल्कि वंचित और उपेक्षित बस्तियों में हुए वास्तविक बदलावों पर आधारित हों।

जब तक अहमदाबाद शहर के सबसे गरीब और कमज़ोर निवासी भी साफ़ हवा में साँस नहीं ले पाते और बहते हुए गंदे पानी के बीच चलने को मजबूर नहीं होते, तब तक यह पुरस्कार केवल अहंकार का प्रतीक है। अहमदाबाद, अपने पुरस्कार को एक तरफ़ रखो और पहले अपने ही लोगों को गंदगी के नरक से बाहर निकालो। यह आलोचना नहीं, यह ज़मीनी न्याय की मांग है।

- Abhijit

07/12/2025

1 comment: