(फोटो सौजन्यः LiveLaw.in)
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट से नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी को मिली हालिया 'राहत' ने भारतीय राजनीति के गलियारों में एक बार फिर बहस छेड़ दी है। कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दायर की गई मनी लॉन्ड्रिंग की शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह मामला किसी पुलिस एफआईआर पर आधारित नहीं है, बल्कि एक 'प्राइवेट कंप्लेंट' (निजी शिकायत) से शुरू हुआ है।
लेकिन क्या प्रक्रियात्मक आधार पर मिली इस राहत को 'ईमानदारी का प्रमाण पत्र' मान लेना चाहिए? या फिर यह भारतीय न्याय तंत्र की उन पेचीदगियों का एक और उदाहरण है, जहाँ प्रभावशाली लोग कानून की खामियों का फायदा उठाकर समय काटने में माहिर हैं?
अदालती फैसला: राहत का आधार क्या है?
विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने अपने 117 पन्नों के आदेश में स्पष्ट किया कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत प्रवर्तन निदेशालय तब तक कार्रवाई नहीं कर सकता जब तक कि उसके पास किसी ‘आधारभूत अपराध’ की एफआईआर न हो। चूंकि यह पूरा मामला डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा 2012 में दायर एक निजी आपराधिक शिकायत से उपजा है, इसलिए तकनीकी रूप से ईडी का सीधे चार्जशीट दाखिल करना 'कानूनन अनुमेय' नहीं था।
अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह फैसला आरोपों की गुणवत्ता पर नहीं, बल्कि कानून की प्रक्रिया पर आधारित है। यानी, भ्रष्टाचार हुआ है या नहीं, इस पर कोर्ट ने अभी क्लीन चिट नहीं दी है।
सत्ता पक्ष का तीखा प्रहार: "डकैती के आरोपी अब भी आरोपी ही हैं"
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने इस फैसले पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि गांधी परिवार को जश्न मनाने की कोई जरूरत नहीं है।
भाजपा के दिग्गज नेता राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटियाने गरजते हुए कहा, "कांग्रेस के नेता इसे 'सत्य की जीत' बता रहे हैं, लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि वे आज भी जमानत पर हैं, 'बरी' नहीं हुए हैं। कोर्ट ने सिर्फ तकनीकी आधार पर शिकायत खारिज की है। सोनिया गांधी 'एक्यूज्ड नंबर 1' और राहुल गांधी 'एक्यूज्ड नंबर 2' बने रहेंगे। यह 2000 करोड़ की संपत्ति की लूट का मामला है, जिसे गांधी परिवार ने महज 50 लाख रुपये में अपनी निजी कंपनी 'यंग इंडियन' के जरिए हड़प लिया।"
शहजाद पूनावाला कहते है, दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने पहले ही इस मामले में एफआईआर दर्ज कर ली है। अब ईडी के पास वह 'कानूनी हथियार' मौजूद है, जिसकी कमी की वजह से यह चार्जशीट रुकी थी। यह सिर्फ एक अस्थायी विराम है, फिल्म अभी बाकी है।
सत्ता पक्ष का तर्क सीधा है: अगर कोई चोरी पकड़ी जाए और पुलिस उसे पकड़ने की प्रक्रिया में कोई तकनीकी चूक कर दे, तो इसका मतलब यह नहीं कि चोर अब साधु हो गया है।
विपक्ष का 'सत्यमेव जयते' का राग: राजनीतिक प्रतिशोध या ढाल?
दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस फैसले को मोदी सरकार के चेहरे पर एक करारा तमाचा बताया है। पार्टी के शीर्ष नेताओं ने इसे सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग का जीता-जागता प्रमाण करार दिया।
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा,
"सत्य की जीत सुनिश्चित है। यह फैसला मोदी-शाह की जोड़ी के मुंह पर करारा तमाचा है। दस
साल से एक फर्जी मामले के जरिए गांधी परिवार और कांग्रेस को प्रताड़ित किया जा रहा
था। जब कोई एफआईआर ही नहीं थी, तो किस
आधार पर ईडी ने उन्हें घंटों बैठाया? यह एजेंसियों का नग्न
दुरुपयोग है और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को इस्तीफा देना चाहिए।"
2000 करोड़ की संपत्ति और 50 लाख का खेल
एक आम नागरिक के नजरिए से देखें तो यह पूरा मामला बेहद संदिग्ध है। 'एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड' के पास दिल्ली, मुंबई और लखनऊ जैसे शहरों के प्राइम लोकेशन पर अरबों की संपत्तियां हैं। कांग्रेस ने पार्टी फंड से इस कंपनी को 90 करोड़ का कर्ज दिया, और फिर उस कर्ज को महज 50 लाख रुपये में 'यंग इंडियन' नाम की कंपनी को ट्रांसफर कर दिया। इस नई कंपनी के 76% शेयर सोनिया और राहुल गांधी के पास हैं।
सवाल यह उठता है कि क्या एक राजनीतिक दल का पैसा, जो चंदे से आता है, किसी निजी कंपनी के फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है? क्या यह 'पब्लिक ट्रस्ट' का उल्लंघन नहीं है?
कानूनी लड़ाई का अगला अध्याय
कोर्ट के इस आदेश ने एक खिड़की बंद की है, तो दूसरा दरवाजा खोल भी दिया है। कोर्ट ने ईडी को जांच जारी रखने की अनुमति दी है क्योंकि अब दिल्ली पुलिस की एफआईआर मौजूद है। ईडी ने संकेत दिए हैं कि वे इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में जाएंगे और जल्द ही एक नई, तकनीकी रूप से पुख्ता चार्जशीट दाखिल करेंगे।
गिरती साख और संस्थागत संकट
यह
मामला अब केवल एक राजनीतिक दल बनाम दूसरे राजनीतिक दल का नहीं रह गया है। यह हमारी
लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता का सवाल है। अगर देश की सर्वोच्च जांच
एजेंसियां ‘प्रक्रियात्मक चूक’ करती हैं, तो यह दो ही बातें दर्शाता है: या तो वे
कानूनी रूप से अक्षम हैं, या फिर वे किसी अदृश्य दबाव में
इतनी हड़बड़ी में हैं कि कानून की बुनियादी किताबों को पढ़ना भूल गई हैं।
ED जैसी एजेंसियों का उपयोग यदि राजनीतिक हिसाब चुकता करने के लिए किया जाएगा,
तो भविष्य में जब वास्तव में गंभीर आर्थिक अपराधी पकड़े जाएंगे,
तब भी जनता उन्हें 'राजनीतिक प्रतिशोध'
की नजर से ही देखेगी। यह स्थिति किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए
घातक है।
अदालत
ने यह भी साफ किया है कि अब जबकि दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने एक नई FIR दर्ज कर ली है, तो ED उसके आधार पर अपनी जांच आगे बढ़ा सकती है। यानी खेल अभी खत्म नहीं हुआ है,
लेकिन पहले राउंड में नैतिकता और कानून की बाजी निश्चित रूप से
विपक्ष के हाथ लगी है।
एक डरावनी मिसाल
राउज
एवेन्यू कोर्ट का यह फैसला बताता है कि भले ही राजनीतिक शोर कितना भी तेज क्यों न
हो, न्याय की तराजू तथ्यों और प्रक्रियाओं पर
ही झुकती है। ईडी ने जिस तरह से इस केस को 'इन्वर्ट' करने की कोशिश की—यानी पहले जांच और बाद में अपराध की तलाश—वह कानून के
शासन के लिए एक खतरनाक मिसाल थी।
अब
देखना यह होगा कि क्या ईडी इस फैसले को चुनौती देती है या फिर नई एफआईआर के सहारे
फिर से उसी चक्रव्यूह को रचने की कोशिश करती है। फिलहाल के लिए, सोनिया और राहुल गांधी ने राजनीतिक बिसात पर एक बड़ी बाजी जीत
ली है, और भाजपा के 'भ्रष्टाचार मुक्त
भारत' के नैरेटिव को एक गहरी चोट पहुँची है।
लोकतंत्र के लिए चेतावनी
नेशनल हेराल्ड मामला भारतीय राजनीति के उस स्याह पक्ष को उजागर करता है जहाँ सत्ता और संपत्ति का घालमेल होता है। कांग्रेस द्वारा इस फैसले को 'नैतिक जीत' बताना जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है। यह जीत केवल 'प्रक्रिया' की जीत है, 'ईमानदारी' की नहीं।
जब तक 2000 करोड़ की उस संपत्ति का हिसाब नहीं होता, जिसे कागज पर एक कंपनी से दूसरी कंपनी में सरका दिया गया, तब तक देश की जनता इसे 'क्लीन चिट' नहीं मानेगी। लोकतंत्र में नेताओं को कानून से ऊपर होने का भ्रम पालना छोड़ देना चाहिए। गांधी परिवार को याद रखना चाहिए कि न्याय की चक्की धीरे चलती है, पर पीसती बहुत महीन है।
सत्य का संघर्ष अभी लंबा है, और तकनीकी आधार पर मिली यह राहत सिर्फ एक 'इंटरवल' है, क्लाइमेक्स अभी बहुत दूर है।
- Abhijit
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