Saturday, December 6, 2025

विदेशी मेहमानों से 'विपक्ष' को दूर रखना: लोकतंत्र की हत्या और सत्ता का अहंकार

भारत, जिसे विश्व पटल पर सबसे बड़े और जीवंत लोकतंत्र के रूप में पहचान मिली थी, आज सत्ता के एक ऐसे वीभत्स रूप का साक्षी बन रहा है, जहाँ हर संवैधानिक संस्था और हर स्थापित परंपरा को एकतरफा तानाशाही के बूते कुचलने की कोशिश की जा रही है। पिछले एक दशक में भारतीय लोकतंत्र पर हुए अनगिनत आघातों में से एक सबसे शर्मनाक और प्रतीकात्मक आघात है: विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के भारत दौरे के दौरान विपक्ष के नेता (Leader of the Opposition - LoP) से मुलाकात की गौरवशाली परंपरा को खत्म करना।

यह महज एक 'प्रोटोकॉल' में बदलाव नहीं है, जिसकी आड़ में सत्ता खुद को छिपा सके; यह हमारे गणतंत्र के मूल विचार पर किया गया एक गहरा और दुर्भावनापूर्ण हमला है। यह साफ तौर पर दिखाता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को देश के 'बहुआयामी' चरित्र से डर लगता है। उन्हें इस बात का भय है कि कहीं दुनिया को भारत का 'दूसरा सच' पता चल जाए। यह रवैया लोकतंत्र नहीं, बल्कि एक असुरक्षित और एकाधिकारवादी मानसिकता का स्पष्ट प्रदर्शन है। जिस देश ने दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाया, आज उसी देश में विपक्ष को विदेशी मेहमानों की आँखों से ओझल रखने का षड्यंत्र रचा जा रहा हैइससे बड़ा राष्ट्रीय अपमान और क्या हो सकता है?

एक गौरवशाली परंपरा, क्यों थी अपरिहार्य?

भारत में विदेशी मेहमानों का विपक्ष के नेता से मिलना, सत्ता के किसी भी दल के लिए कोई एहसान नहीं था, बल्कि यह हमारी विदेश नीति की परिपक्वता और लोकतांत्रिक गरिमा का अटूट हिस्सा था। यह परंपरा क्यों इतनी महत्वपूर्ण थी, इसे गहराई से समझना आवश्यक है:

1. भारत का समग्र और संतुलित चित्र: कोई भी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष, चाहे वह अमेरिकी राष्ट्रपति हो, जापानी प्रधानमंत्री हो या किसी यूरोपीय देश का चांसलर, जब भारत आता है, तो वह केवल सरकार के साथ संबंध नहीं बनाता, बल्कि पूरे भारत से संबंध स्थापित करने की उम्मीद रखता है। विपक्ष, देश के करोड़ों नागरिकों की वैकल्पिक सोच और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। विपक्ष से मिलकर विदेशी मेहमानों को भारत की राजनीतिक नब्ज, नीतिगत विरोध, आर्थिक चुनौतियों और सत्ता की जवाबदेही जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं की गहरी और संतुलित समझ मिलती थी। यह मुलाकात विदेशी शक्ति को यह संदेश देती थी कि भारत की विदेश नीति किसी एक दल की बपौती नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सहमति का परिणाम है।

2. नीतिगत निरंतरता की गारंटी: जब विपक्ष को भी अंतर्राष्ट्रीय संवाद में शामिल किया जाता है, तो यह संदेश जाता है कि भविष्य में अगर सत्ता परिवर्तन होता है, तब भी द्विपक्षीय संबंध और संधियाँ पटरी पर बने रहेंगे। यह विदेशी राष्ट्रों को निवेश और दीर्घकालिक साझेदारी के लिए आवश्यक विश्वास प्रदान करता है। आज, जब विपक्ष को अंतरराष्ट्रीय मंचों से पूरी तरह काट दिया गया है, तो विदेशी शक्तियों के मन में यह आशंका पैदा होना स्वाभाविक है कि भारत में नीतियां केवल वर्तमान शासक के कार्यकाल तक ही सीमित हैं। यह एक राष्ट्र के रूप में हमारी विश्वसनीयता पर सीधा प्रश्नचिह्न है।

3. लोकतांत्रिक मर्यादा और संवैधानिक सम्मान: विपक्ष के नेता से मिलना एक मूलभूत लोकतांत्रिक मर्यादा थी, जो संसद में विपक्ष की गरिमा को सुनिश्चित करती थी। यह स्थापित करता था कि भले ही हम संसद में एक-दूसरे के धुर विरोधी हों और तीखी बहसें करें, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने हम सब एक राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस परंपरा को समाप्त करके, सत्ताधारी दल ने खुद को ही 'राष्ट्र' घोषित कर दिया हैएक ऐसी सोच जो लोकतंत्र के लिए जहर है और जो संविधान की भावना का घोर उल्लंघन है।

अतीत की मिसाल: जब मर्यादा थी सर्वोपरि

आज की सत्ताधारी पार्टी के नेता और समर्थक भले ही इस परंपरा को बेमानी करार दें, लेकिन इतिहास के पन्ने चीख-चीखकर बताते हैं कि जब देश की बागडोर वास्तविक लोकतंत्रवादियों के हाथ में थी, तब विपक्ष को पूरा सम्मान मिलता था।

अटल बिहारी वाजपेयी जी का कार्यकाल (1998-2004) एक स्वर्णिम उदाहरण है। अपनी तमाम राजनीतिक कटुता के बावजूद, वाजपेयी जी ने यह सुनिश्चित किया कि जब भी कोई बड़ा विदेशी मेहमान भारत आए, तो वह शिष्टाचारवश विपक्ष के नेता से अवश्य मिले। उन्हें पता था कि विपक्ष की आवाज को दबाना राष्ट्र का अपमान है।

इसी तरह, डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल (2004-2014) भी इस परंपरा का साक्षी रहा। कई उदाहरण हैं जब यूपीए सरकार के दौरान आए विदेशी प्रमुखों ने विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की।

  • नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज की मुलाकातें: 2009 से 2014 के बीच, जब सुषमा स्वराज लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष थीं, तब उन्होंने कई महत्वपूर्ण विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात की। इन मुलाकातों में महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर विपक्ष का दृष्टिकोण सामने आता था। उस वक्त की कांग्रेस सरकार ने कभी इस पर आपत्ति नहीं जताई, क्योंकि वह जानती थी कि यह देश हित में है और लोकतंत्र के इस 'खेल' को समझना सत्ता की जिम्मेदारी है।

ये मिसाल सिद्ध करती हैं कि यह परंपरा 2014 से पहले तक लगातार जारी थी, और इसे निभाना सत्ताधारी दल की 'महानता' नहीं, बल्कि उनकी 'लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता' का प्रमाण था। आज उस प्रतिबद्धता का गला घोंटा जा रहा है।

असुरक्षा का गर्त और तानाशाही मानसिकता

आज की स्थिति पर नज़र डालिए। यह परंपरा एक झटके में क्यों खत्म कर दी गई? इसका एकमात्र, कड़वा सच यही है कि मौजूदा सत्ताधारी दल में गहरी असुरक्षा का भाव है।

सत्ता को डर है कि:

  1. विपक्ष, विदेशी शक्तियों के सामने देश में पनप रहे असंतोष, महंगाई, बेरोजगारी, और सामाजिक विभाजन जैसे गंभीर मुद्दों को उजागर कर सकता है। यह सरकार की 'सब कुछ ठीक है' वाली चिकनी-चुपड़ी छवि को तोड़ सकता है।
  2. विदेशी मीडिया, जो अक्सर सरकार के मुखपत्र जैसा नहीं होता, विपक्ष से मिलकर सत्ता के नैरेटिव पर सवाल खड़े कर सकता है और भारत की असली राजनीतिक चुनौतियों को दुनिया के सामने ला सकता है।
  3. वैश्विक मंच पर केवल एक 'महान नेता' की छवि बनाए रखने का जो प्रोजेक्ट चल रहा है, विपक्ष की आवाज उसे खंडित कर सकती है।

यही 'डर' विदेश मंत्रालय को आज एक 'संदेशवाहक' की भूमिका में धकेल रहा है, जहाँ वह विदेशी मेहमानों को विपक्ष के नेता से मिलने की 'अनौपचारिक सलाह' देता है। यह किसी भी संप्रभु और मजबूत राष्ट्र के लिए शर्म का विषय है। एक तरफ, हम खुद को विश्वगुरु बताते हैं, और दूसरी तरफ, हम इतने असुरक्षित हैं कि अपने ही विपक्ष से दुनिया को रूबरू नहीं कराना चाहते। यह दोगलापन देश की छवि को धूमिल कर रहा है।

यह मानसिकता बताती है कि सत्ता दल लोकतंत्र को एक 'जरूरत' नहीं, बल्कि एक 'बाधा' मानता है। उनके लिए, विपक्ष एक 'दुश्मन' है, कि राष्ट्र निर्माण में एक भागीदार। इस हठधर्मिता ने भारत की छवि को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर नुकसान पहुँचाया है। दुनिया अब भारत को एक ऐसी जगह के रूप में देखती है, जहाँ केवल एक व्यक्ति की आवाज गूंजती है, और जहाँ आलोचना को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर दबा दिया जाता है।

लोकतंत्र बचाओ, परंपरा निभाओ!

विदेशी मेहमानों को विपक्ष से दूर रखना केवल एक रस्मी गलती नहीं है; यह हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा स्थापित सिद्धांतों का क्रूर परित्याग है। यह सत्ता का वह अहंकार है, जो यह मानता है कि 'वही राष्ट्र है और राष्ट्र वही है।' यह रवैया केवल लोकतंत्र के लिए खतरा है, बल्कि यह भविष्य के लिए एक बुरा उदाहरण पेश करता है, जहाँ आने वाली सरकारें भी विपक्ष की आवाज को पूरी तरह से अप्रासंगिक घोषित कर सकती हैं।

जब तक यह शर्मनाक परंपरा बहाल नहीं होती, तब तक भारत की विदेश नीति एक खोखली चीज़ बनी रहेगी, जो केवल एक दल के संकीर्ण एजेंडे को आगे बढ़ाती है। सत्ता को यह समझना होगा कि मजबूत लोकतंत्र वह नहीं है जहाँ विपक्ष मौन रहे, बल्कि वह है जहाँ विपक्ष अपनी पूरी शक्ति के साथ सत्ता की जवाबदेही तय करे।

इस 'असुरक्षा' की भावना को त्यागिए। लोकतंत्र को कमज़ोर करना बंद कीजिए। विदेशी मेहमानों को भारत की सच्ची और संपूर्ण तस्वीर देखने दीजिए। नहीं तो इतिहास आपको लोकतांत्रिक मर्यादा को ध्वस्त करने वाले शासक के रूप में याद रखेगा। भारत के नागरिक यह तानाशाही नहीं सहेंगे!

- Abhijit

06/12/2025

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