Thursday, December 25, 2025

अटल बिहारी वाजपेयी: राजनीति में कविता, सत्ता में संतुलन

भारतीय राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो सत्ता के शिखर पर पहुँचकर भी मानवीय संवेदना, वैचारिक संतुलन और सांस्कृतिक गरिमा को नहीं छोड़ते। अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे ही एक असाधारण राजनेता थे। वे केवल भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता या देश के प्रधानमंत्री ही नहीं थे, बल्कि वे राजनीति में कविता, संवाद और सहमति की परंपरा के प्रतिनिधि थे।

अटलजी स्वयं कहते थे -

"हार नहीं मानूंगा,

रार नहीं ठानूंगा,

काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं,

गीत नया गाता हूं।"

यह पंक्तियाँ उनके जीवन-दर्शन को व्यक्त करती हैं। अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक जीवन संघर्ष, असफलताओं और पुनरुत्थान की कहानी है, लेकिन उसमें कभी कटुता या प्रतिशोध नहीं दिखता। विपक्ष भी उनके व्यक्तित्व और भाषा की मर्यादा का सम्मान करता थाजो आज की राजनीति में दुर्लभ होता जा रहा है।

एक कवि-हृदय प्रधानमंत्री

अटलजी की राजनीति का मूल आधार मानवीयता थी। वे मानते थे कि राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम है। उनकी कविता की पंक्तियाँ -

आओ फिर से दिया जलाएँ,

भरी दुपहरी में अँधियारा,

सूरज परछाईं से हारा।

-       देश के कठिन दौर में भी आशा और आत्मविश्वास का संदेश देती हैं।

यही कारण था कि परमाणु परीक्षण जैसे साहसिक फैसले लेने वाले अटलजी शांति वार्ता और संवाद के भी उतने ही प्रबल समर्थक थे। लाहौर बस यात्रा और पाकिस्तान के साथ बातचीत की पहल उनकी दूरदृष्टि का प्रमाण थी।

शासनकाल में संतुलन

अटल बिहारी वाजपेयी का प्रधानमंत्री कार्यकाल (1998–2004) गठबंधन राजनीति के दौर में स्थिरता और संतुलन का उदाहरण माना जाता है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को उन्होंने संवाद और समन्वय के माध्यम से चलाया। यह उनकी राजनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है कि भिन्न विचारधाराओं वाले दल भी उनके नेतृत्व में सहज महसूस करते थे।

उनके शासनकाल की प्रमुख उपलब्धियों में स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना, दूरसंचार क्षेत्र में सुधार, आर्थिक उदारीकरण को गति देना और परमाणु शक्ति के रूप में भारत की वैश्विक पहचान शामिल हैं। साथ ही, उन्होंने संसद और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को बनाए रखने का प्रयास किया। उनकी वाणी में संयम था, और आलोचना में भी शालीनता।

आज के संदर्भ में अटलजी

आज जब भारतीय राजनीति में भाषा की मर्यादा, असहमति का सम्मान और संवाद की संस्कृति कमजोर होती दिखती है, तब अटल बिहारी वाजपेयी का स्मरण और भी प्रासंगिक हो जाता है। वे कहते थे -

हम जंग नहीं चाहते,

पर आत्मसम्मान से समझौता भी नहीं।

अटलजी की विरासत केवल नीतियों या परियोजनाओं में नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कार में है जहाँ विरोधी भी दुश्मन नहीं होता। वे भाजपा की वैचारिक नींव के साथ-साथ भारतीय लोकतंत्र की गरिमा के भी संरक्षक थे।

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति में एक ऐसे युग का प्रतीक हैं जहाँ विचारधारा के साथ संवेदना, सत्ता के साथ शालीनता और शक्ति के साथ जिम्मेदारी जुड़ी हुई थी। वे चले गए, लेकिन उनकी कविता, उनका दृष्टिकोण और उनका लोकतांत्रिक आचरण आज भी मार्गदर्शक है।

अटलजी की ही पंक्तियों में -

दीप जले, अंधकार मिटे,

विश्वास बने इतिहास।

देश को आज फिर ऐसे ही अटल विश्वास और लोकतांत्रिक विवेक की आवश्यकता है।

अटल जी को उनकी जयंती पर शत्-शत् नमन।

- Abhijit

25/12/2025

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