बीते कुछ समय से भारतीय रुपया लगातार डॉलर के मुकाबले अपने सबसे निचले स्तर को छू रहा है। जो विनिमय दर कभी 70 के इर्द-गिर्द थी, वो आज 90 के मनोवैज्ञानिक और आर्थिक रूप से खतरनाक स्तर को भी पार कर चुकी है। यह केवल एक संख्या नहीं है; यह एक गंभीर आर्थिक संकट का संकेतक है। लेकिन, सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि देश के उन शीर्ष नेताओं के होंठ सिल गए हैं, जो आज से कुछ साल पहले, जब रुपया 60-65 के स्तर पर था, तब इसे देश का ‘अपमान’ और सरकार का ‘भ्रष्टाचार’ बताते थे। यह चुप्पी केवल रहस्यमय नहीं, बल्कि एक शर्मनाक दोहरा मापदंड है।
कल के मुखर 'राष्ट्रवादी' और आज का सन्नाटा
हमें 2013-14 का दौर याद करना चाहिए। तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी को लेकर यूपीए सरकार पर हमलावर थे। उनके भाषणों में एक ही बात गूंजती थी: "जब रुपया गिरता है, तो देश का मान-सम्मान गिरता है।" भाजपा के हर बड़े नेता, सुषमा स्वराज से लेकर अरुण जेटली तक, रुपये के अवमूल्यन को मनमोहन सिंह सरकार की आर्थिक विफलता और देश की गिरती प्रतिष्ठा से जोड़ते थे। वे इसे भ्रष्टाचार और खराब नीतियों का सीधा परिणाम बताते थे।
(2013-14 में गिर रहे रुपये को लेकर नरेंद्र मोदीने दिया हुआ बयान)
यह तर्क इतना प्रबल था कि आम जनता के मन में यह बात बैठ गई थी कि रुपये का गिरना सीधे तौर पर सरकार की नियत और नीतियों से जुड़ा हुआ है।
लेकिन आज क्या हो रहा है?
रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर है। 90 के पार जाना एक ऐतिहासिक गिरावट है, जिसके गहरे आर्थिक परिणाम होंगे। मगर, वही नेता जो कल तक इस मुद्दे पर सबसे मुखर थे, आज मौन हैं। उनका गुस्सा, उनकी चिंता, उनका 'राष्ट्रवादी' आक्रोश – सब कहाँ गायब हो गया?
आज सरकार की ओर से जो जवाब आ रहे हैं, वे निहायत ही बुज़दिल और बहानेबाजी से भरे हैं। वित्त मंत्रालय के अधिकारी और मंत्री अब वैश्विक अस्थिरता, अमेरिका में ब्याज दरों में बढ़ोतरी, या विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की निकासी को दोष दे रहे हैं।
सवाल यह है: क्या 2013 में वैश्विक दबाव नहीं थे? क्या मनमोहन सिंह के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था वैश्विक कारकों से अछूती थी?
अगर पिछली सरकार के समय रुपये का गिरना घरेलू भ्रष्टाचार और नीतिगत पंगुता का प्रमाण था,
तो आज रुपये का 90 के पार चले जाना क्या दर्शाता है? क्या यह 'विश्वगुरु' बनने की ओर अग्रसर भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था का संकेत है, जैसा कि हमें बताया जाता है?
बदल गए बोल, लेकिन नहीं बदली आम आदमी की तकलीफ़
यह सत्ता का वह पाखंड है जो आम आदमी को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। रुपये के कमजोर होने से सीधे तौर पर आयात महंगा होता है। हम बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई अन्य आवश्यक वस्तुएँ आयात करते हैं। इन सबके दाम बढ़ेंगे। यानी, पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ेगी, महंगाई आसमान छूएगी, और आम नागरिक की जेब पर सीधा डाका पड़ेगा।
सरकार का एक तर्क यह भी होता है कि रुपये की कमजोरी निर्यातकों के लिए फायदेमंद है। यह आधा सच है। हां, निर्यातकों को लाभ होता है, लेकिन क्या वह लाभ उस व्यापक आर्थिक क्षति की भरपाई कर सकता है जो देश के 140 करोड़ नागरिकों को झेलनी पड़ती है?
जब डॉलर के मुकाबले रुपया 90 को पार कर जाता है, तो यह केवल विनिमय दर का मामला नहीं रहता। यह सरकार की साख और उसकी जवाबदेही का मामला बन जाता है। जिस 'मजबूत' सरकार के नाम पर जनादेश मांगा गया था, वही आज रुपये को संभालने में पूरी तरह से विफल क्यों दिखाई दे रही है?
जब 'मान-सम्मान' सत्ता के साथ बदल जाता है
यह मानना भोलापन होगा कि रुपये की कीमत सिर्फ एक ही देश की सरकार नियंत्रित कर सकती है। वैश्विक अर्थव्यवस्था जटिल है। लेकिन, नेताओं के शब्दों का मूल्य सत्ता की कुर्सी बदलने के साथ इतनी तेजी से गिर जाए, यह देखना दुखद है।
नरेंद्र मोदी और भाजपा को अपनी पुरानी बयानबाजी के लिए आज देश को जवाब देना चाहिए। उन्हें बहाने बनाना छोड़कर यह स्वीकार करना होगा कि रुपया केवल डॉलर के मुकाबले नहीं गिर रहा है, बल्कि गिर रही है उनकी विश्वसनीयता और जवाबदेही।
आज जब देश की मुद्रा अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर है, तब देश को आर्थिक ज्ञान की नहीं, बल्कि राजनीतिक ईमानदारी और स्पष्ट उत्तरों की जरूरत है। देश यह जानना चाहता है: वह 'मान-सम्मान' कहाँ गया, जिसकी दुहाई देकर कल तक विपक्ष को कटघरे में खड़ा किया जाता था? या क्या 'मान-सम्मान' का पैमाना सिर्फ विपक्ष में बैठने वाले नेताओं के लिए ही सुरक्षित रखा गया है?
- Abhijit
04/12/2025
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