विकास की चकाचौंध और दाहोद का सन्नाटा
जब हम गुजरात के आदिवासी बेल्ट, विशेषकर दाहोद, पंचमहल और डांग जैसे जिलों की ओर रुख करते हैं, तो 'विकास मॉडल' का गुब्बारा फूटता हुआ दिखाई देता है। आज भी इन क्षेत्रों के कई दूरदराज के गांवों में पक्की सड़कें एक सपना हैं। विडंबना देखिए, एक तरफ सरकार बुलेट ट्रेन और मेगा-इवेंट्स पर करोड़ों खर्च कर रही है, वहीं दूसरी तरफ आदिवासी इलाकों में एक गर्भवती महिला को प्रसव के लिए एम्बुलेंस तक नसीब नहीं होती।
हकीकत का कड़वा सच
स्ट्रेचर पर टिकी जिंदगी: दाहोद के कई गांवों में आज भी बीमार व्यक्ति या गर्भवती महिला को कपड़े और लकड़ी से बने अस्थायी स्ट्रेचर (कावड़) पर लिटाकर 2 से 5 किलोमीटर तक पैदल मुख्य सड़क तक लाया जाता है।
एम्बुलेंस की पहुंच से बाहर: सरकारी आंकड़ों में भले ही '108 सेवा' की पहुंच का दावा किया जाए, लेकिन बिना सड़क के कोई भी गाड़ी पहाड़ की ढलानों और उबड़-खाबड़ रास्तों पर नहीं चल सकती।
कुपोषण का दंश: हालिया रिपोर्टों के अनुसार, गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण की दर चिंताजनक है। दाहोद जैसे जिले में कुपोषित बच्चों की संख्या शहरी क्षेत्रों की तुलना में कई गुना अधिक है।
इवेंट मैनेजमेंट बनाम बुनियादी अधिकार
हाल ही में आई कुछ मीडिया रिपोर्टों और राजनीतिक आरोपों ने गुजरात सरकार की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आरोप है कि आदिवासी विकास के लिए आवंटित फंड का एक बड़ा हिस्सा वीआईपी कार्यक्रमों, रैलियों और पंडालों के आयोजन में खर्च कर दिया जाता है।
"जब एक आदिवासी परिवार को बुनियादी सुविधाओं के लिए 'ग्रांट नहीं है' कहकर लौटा दिया जाता है, तो करोड़ों रुपये की रैलियों का आयोजन उन गरीबों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है।"
एक तरफ गुजरात राष्ट्रमंडल खेलों (Commonwealth
Games) जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की मेजबानी की तैयारी कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसके अपने ही राज्य का एक बड़ा हिस्सा बुनियादी मानवाधिकारों—जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और संपर्क मार्ग—से वंचित है। क्या एक भव्य स्टेडियम का निर्माण उस सड़क से अधिक महत्वपूर्ण है जो किसी की जान बचा सकती थी?
विकास किसके लिए?
विकास का पैमाना केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) या बड़े आयोजन नहीं हो सकते। यदि विकास समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँच रहा, तो उसे 'मॉडल' कहना बेमानी है। गुजरात सरकार को अपनी आत्ममुग्धता से बाहर निकलकर यह देखना होगा कि आदिवासी क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति के नाम पर अब और बहानेबाजी नहीं चलेगी।
यदि सड़कों के अभाव में आज भी लोगों को जान गंवानी पड़ रही है, तो यह शासन की विफलता है। गुजरात को 'वाइब्रेंट' होने से पहले 'संवेदनशील' होने की जरूरत है। विकास की असली कसौटी चमकते शहर नहीं, बल्कि दाहोद के उन दुर्गम गांवों के रास्ते हैं जहाँ आज भी एक एम्बुलेंस का इंतजार किया जा रहा है।
- Abhijit
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