Wednesday, December 10, 2025

वंदे मातरम: सियासत की मंडी में बिकता हुआ एक राष्ट्रीय गौरव

यह कैसा समय गया है? जब देश के सामने आर्थिक मंदी, सीमा पर तनाव, और बेरोज़गारी की भयंकर चुनौती खड़ी है, तब हमारी संसद में, हमारे सार्वजनिक विमर्श में किस बात पर बहस हो रही है? एक ऐसे 'महामंत्र' पर, जिसने कभी करोड़ों भारतीयों को गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के लिए प्रेरित किया था, आज उसी को सियासत की मंडी में एक सस्ता, घिनौना और विभाजनकारी हथियार बनाकर बेचा जा रहा है।

वंदे मातरम! बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वह अमर गान, जिसने एक सदी से अधिक समय तक 'मातृभूमि' के विचार को केवल एक भौगोलिक इकाई से ऊपर उठाकर उसे एक देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया। यह वह नारा था, जिसे कहते हुए जलियाँवाला बाग में गोलियाँ खाई गईं, जिसे कहते हुए हज़ारों स्वतंत्रता सेनानी फाँसी के फंदे पर चढ़े। यह त्याग, बलिदान और राष्ट्रीय एकता का सर्वोच्च प्रतीक है। और आज, हमारे तुच्छ, अवसरवादी राजनेता इसी प्रतीक की खाल ओढ़कर देश को बाँटने का खेल खेल रहे हैं।

यह सिर्फ राजनीतिक मतभेद नहीं है; यह राष्ट्रीय गौरव के साथ किया गया एक अक्षम्य अपराध है। यह गीत आज किसी राष्ट्रगीत की तरह नहीं, बल्कि एक युद्ध के बिगुल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य विरोधियों को नीचा दिखाना और देश को भावनात्मक आधार पर विभाजित करना है। यह पाखंड और अवसरवाद का वह नंगा नाच है, जिसे देखकर देश के बलिदानियों की आत्मा भी रो रही होगी।

ऐतिहासिक अनादर: प्रतीक को हथियार बनाना

राजनीतिक दलों ने वंदे मातरम के 150वें वर्ष को 'उत्सव' के रूप में नहीं, बल्कि 'आरोप-प्रत्यारोप' के एक भद्दे तमाशे के रूप में मनाया है।

सत्ता में बैठे दल अपनी हर असफलता, हर प्रशासनिक चूक और जनता के हर दुख से ध्यान भटकाने के लिए अतीत के पन्नों को कुरेद रहे हैं। उनका एजेंडा स्पष्ट है: विपक्ष पर 'राष्ट्रगीत को खंडित करने' और 'तुष्टिकरण' की राजनीति करने का आरोप लगाकर स्वयं को देशभक्ति का एकमात्र ठेकेदार साबित करना। वे इतिहास की उस चुनिंदा व्याख्या को सामने लाते हैं जो उन्हें चुनावी लाभ दे सके। उन्हें गीत की पवित्रता से कोई मतलब नहीं, उन्हें मतलब है उस भावनात्मक चिंगारी से, जिसे भड़काकर वह वोटों की फसल काट सकें।

यह ऐतिहासिक अनादर है! जब प्रधानमंत्री या गृहमंत्री जैसे सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग संसद के पवित्र मंच का उपयोग करके यह साबित करने में लग जाते हैं कि किस पार्टी ने 1937 में गीत के साथ न्याय नहीं किया या किस नेता ने पहले इस पर आपत्ति जताई थी, तो वे असल में उस महान विरासत को तुच्छ बना देते हैं। वंदे मातरम का जन्म अंग्रेजों की 'बांटो और राज करो' की नीति को ध्वस्त करने के लिए हुआ था, और आज की राजनीति ठीक उसी ब्रिटिश चाल को दोहरा रही हैराष्ट्रीय प्रतीकों को धार्मिक और राजनीतिक आधार पर बाँटकर 'राज' करने की कोशिश!

सत्ता पक्ष का खोखला प्रतीकवाद

सत्ता पक्ष कावंदे मातरमप्रेम सिर्फ़ दिखावा है, खोखला प्रतीकवाद है।

यदि आपको राष्ट्रगीत से इतना ही प्रेम है, तो आपकी सारी ऊर्जा वर्तमान की समस्याओं को सुलझाने में क्यों नहीं लगती? लाखों युवा सड़कों पर बेरोज़गारी से जूझ रहे हैं, आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं, किसान अपनी मांगों को लेकर सर्दी-गर्मी झेल रहे हैं। क्या यह देश कीमातृभूमिके बच्चों का अपमान नहीं है? लेकिन नहीं! इन ज़मीनी हकीकतों से मुँह मोड़कर, सरकार और उनके नुमाइंदे संसद में 10 घंटे तक इस बात पर बहस करेंगे कि नेहरू ने जिन्ना के सामने घुटने टेके थे या नहीं।

यह शर्मनाक है। यह देश की जनता के साथ किया गया सबसे बड़ा छल है। आप वंदे मातरम को 'महामंत्र' कहते हैं, पर आप उसे केवल चुनावी विमर्श का 'जुमला' बना चुके हैं। जब आप जनता के मूलभूत सवालों का जवाब देने में असमर्थ होते हैं, तो आप तुरंत राष्ट्रगीत का कवच पहनकर देशभक्ति का डंका पीटने लगते हैं। यह राष्ट्रवाद नहीं है, यह बेशर्म राजनीतिक opportunism है!

आप उस गीत को एक राजनीतिक हथियार बना रहे हैं, जो कभी एकता का सूत्र था। यह एक पवित्र मंदिर को राजनीतिक अखाड़े में बदलने जैसा है।

विपक्ष की प्रतिक्रियावादी कमजोरी

और विपक्ष? उनकी स्थिति तो और भी दयनीय और निराशाजनक है। विपक्ष भी पूरी तरह से सत्ता पक्ष के बिछाए जाल में फँस चुका है। उन्हें पता है कि यह चर्चा केवल ध्यान भटकाने के लिए है, फिर भी वे इस तमाशे में भागीदार बनते हैं।

विपक्ष अपनी सारी ऊर्जा इस बात पर ख़र्च कर रहा है कि 80 साल पहले उनके नेताओं ने क्या किया था और क्यों किया था। वे लगातार सफाई दे रहे हैं, जबकि उन्हें आक्रामक रूप से वर्तमान की समस्याओं पर हमला करना चाहिए।

क्या विपक्ष की प्राथमिकता आज भी इतिहास की रक्षा करना है, या देश के वर्तमान की रक्षा करना? जब सत्ता पक्ष 'वंदे मातरम' का नारा लगाता है, तो विपक्ष को 'बेरोज़गारी हटाओ', 'महंगाई कम करो', और 'किसानों को न्याय दो' का नारा लगाना चाहिए। लेकिन इसके बजाय, वे 'कौन ज़्यादा देशभक्त' की बेकार की प्रतियोगिता में उलझ जाते हैं। यह प्रतिक्रियावादी राजनीति विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी है।

विपक्ष को समझना होगा कि राष्ट्रीय प्रतीकों पर अपनी ऊर्जा बर्बाद करने के बजाय, उन्हें अपनी एक स्पष्ट, भविष्योन्मुखी दृष्टि जनता के सामने रखनी चाहिए। राष्ट्रगीत पर सफाई देना बंद कीजिए! अपने पूर्वजों की गलतियों या सही फैसलों को जनता स्वयं समझेगी, लेकिन यदि आप आज के भारत को बचाने के लिए नहीं लड़ेंगे, तो इतिहास आपको कभी माफ नहीं करेगा।

असली जंग: रोटी, रोज़गार, और राष्ट्रगीत का व्यापार

आज देश की असली जंग कहाँ है?

  1. रोटी: करोड़ों परिवारों की थाली में महंगाई का ज़हर।
  2. रोज़गार: पढ़ा-लिखा युवा हाथ में डिग्री लेकर भटक रहा है।
  3. किसान: खेतों में लागत निकलना मुश्किल हो गया है।
  4. न्याय: हर कोने में सामाजिक और आर्थिक असमानता।

यह हैं हमारे राष्ट्र की असली चुनौतियाँ। और संसद में क्या हो रहा है? 'वंदे मातरम' के छंदों पर बहस! यह ऐसा है जैसे घर में आग लगी हो और हम इस बात पर झगड़ रहे हों कि हमारे परदादा ने कौन सा श्लोक पढ़ा था।

देश के राजनेता, शर्म करो! तुम जिस मातृभूमि की वंदना का ढोंग करते हो, उसके बच्चों को भूखा और बेरोज़गार रख रहे हो। तुम वंदे मातरम को एक पवित्र मंत्र से बदलकर अपनी चुनावी दुकान में बिकने वाला एक 'माल' बना चुके हो। तुम राष्ट्रीय भावना को एक सस्ते प्रोडक्ट की तरह इस्तेमाल कर रहे हो, जिसकी मार्केटिंग करके सत्ता हासिल की जा सके।

अंतिम चेतावनी: यह गीत किसी पार्टी का नहीं

मैं भारत के हर नागरिक से कहना चाहता हूँ, और विशेषकर इन राजनीतिक दलों को अंतिम चेतावनी देना चाहता हूँ: वंदे मातरम किसी पार्टी की जागीर नहीं है। यह तो किसी दल की विचारधारा से शुरू होता है और किसी के चुनाव चिन्ह पर ख़त्म होता है। यह गीत हमारा है, उस देश का है जिसे हम भारत माँ कहते हैं।

राजनेताओं, अपनी ओछी सियासत को दूर रखो। यदि आप वास्तव में वंदे मातरम का सम्मान करते हैं, तो उस भारत को विकसित और समृद्ध बनाओ जिसकी वंदना इस गीत में की गई है। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते, तो कम से कम इसे बख्श दीजिए। इसे अपनी विभाजनकारी राजनीति से और प्रदूषित मत कीजिए।

राष्ट्रीय गौरव को अपनी सस्ती सियासत से दूर रखिए! आज देश को प्रतीकों की माला नहीं, समस्याओं के समाधान का साहस चाहिए। और यह साहस, इतिहास को कुरेदने से नहीं, वर्तमान के सामने खड़े होने से आएगा। वंदे मातरम!

- Abhijit

10/12/2025

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