राष्ट्रमंडल खेल 2030 की मेजबानी मिलना भारत के लिए राष्ट्रीय गौरव का क्षण है। और जब यह गौरव शताब्दी वर्ष (Centenary Games) के साथ जुड़ता है, तो इसकी चमक और भी बढ़ जाती है। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में जब यह घोषणा हुई कि 2030 का खेल महाकुंभ अहमदाबाद में आयोजित होगा, तो पूरे देश में उत्साह की लहर दौड़ गई। गुजरात, जो पिछले एक दशक से विकास और आधुनिकता का चेहरा रहा है, अब खुद को 'स्पोर्ट्स कैपिटल' के रूप में स्थापित करने के लिए तैयार है।
लेकिन इस उत्साह की आतिशबाजी के बीच, एक कड़वी हकीकत का साया अब भी मंडरा रहा है— 2010
के दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल।
क्या अहमदाबाद उस इतिहास को दोहराएगा, या 'गुजरात मॉडल' अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप समय पर, त्रुटिरहित और विश्वस्तरीय आयोजन सुनिश्चित करेगा? यह सवाल केवल एक शहर की तैयारी का नहीं है, यह राष्ट्रीय प्रतिष्ठा की अग्निपरीक्षा है।
तैयारी का दावा बनाम जमीनी हकीकत
प्रशासन की तरफ से बार-बार यह दावा किया जा रहा है कि इस बार 2010 जैसी अराजकता नहीं होगी। गुजरात के प्रधान खेल सचिवों ने स्पष्ट किया है कि "हम समय से काफी आगे हैं, अधिकांश स्थल तैयार हैं, और फंड सुरक्षित है।"
अहमदाबाद की ताकत:
- विश्वस्तरीय केंद्र: नरेंद्र मोदी स्टेडियम, दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम, पहले से ही उपलब्ध है, जो उद्घाटन समारोह और कुछ प्रमुख आयोजनों का केंद्र बन सकता है। इसके अलावा, ट्रांस्टेडिया (TransStadia) और गुजरात विश्वविद्यालय में भी उच्च क्षमता वाले खेल स्थल मौजूद हैं।
- मेगा-प्रोजेक्ट: सरदार पटेल स्पोर्ट्स एन्क्लेव: यह परियोजना 2030
के खेलों की मुख्य धुरी है। इसमें अत्याधुनिक एक्वेटिक्स सेंटर,
विशाल फुटबॉल स्टेडियम,
दो इंडोर एरीना और सबसे महत्वपूर्ण— 3000 खिलाड़ियों की क्षमता वाला एथलीट विलेज शामिल है।
- तैयारी का लक्ष्य: अधिकारियों ने स्पष्ट रोडमैप दिया है। नए वेन्यू का निर्माण कार्य 2028
के अंत या 2029 की शुरुआत तक पूरा करने का लक्ष्य है। सबसे बड़ी बात, इन वेन्यू को अक्टूबर 2029
में वर्ल्ड पुलिस एंड फायर गेम्स की मेजबानी के साथ टेस्ट किया जाएगा। यह एक अनिवार्य 'ड्रेस रिहर्सल' है, जो किसी भी अंतिम मिनट की देरी की गुंजाइश को खत्म कर देगा।
शेष काम: केवल ईंट-पत्थर का निर्माण नहीं
खेलों के लिए बुनियादी ढांचे को 'तैयार' बताना एक बात है, लेकिन उसे 'विश्वस्तरीय' बनाना और शहर के समग्र बुनियादी ढांचे को संभालना दूसरी।
1. शहरी कायाकल्प: राष्ट्रमंडल खेलों का मतलब केवल स्टेडियम नहीं होता। इसमें कनेक्टिविटी, परिवहन और आवास की व्यवस्था भी शामिल है।
- मेट्रो और बीआरटीएस: शहर के मेट्रो रेल नेटवर्क और बीआरटीएस सिस्टम को खेल स्थलों से seamlessly
जोड़ना होगा। मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट सुविधाओं को बेहतर बनाने का काम तेज़ी से चल रहा है।
- आतिथ्य और आवास: खिलाड़ियों और लाखों पर्यटकों के लिए पर्याप्त होटल इन्वेंटरी तैयार करना एक बड़ी चुनौती है,
जिसके लिए विस्तार और नए निर्माण की आवश्यकता होगी।
2. सरदार पटेल स्पोर्ट्स एन्क्लेव की चुनौती: इस विशाल एन्क्लेव के निर्माण के लिए टाउन प्लानिंग (टीपी) स्कीम में बदलाव किए गए हैं और बड़ी मात्रा में डेमोलिशन का काम शुरू हो चुका है। स्थानीय निवासियों को वैकल्पिक आवास में शिफ्ट किया जा रहा है। इस संवेदनशील प्रक्रिया को मानवीय और त्वरित तरीके से पूरा करना होगा ताकि प्रोजेक्ट की गति धीमी न हो।
3. 2010 का भूत: सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की होगी। दिल्ली 2010 में समय पर काम पूरा करने की जल्दबाजी में गुणवत्ता से समझौता किया गया था और बड़े घोटाले सामने आए थे। अहमदाबाद को दुनिया को यह दिखाना होगा कि भारत अब एक परिपक्व आयोजक है, जो पारदर्शिता और गुणवत्ता को अपनी प्राथमिकता में रखता है।
निर्णायक घड़ी: 2036 ओलंपिक का सपना
यह मत भूलिए कि 2030 राष्ट्रमंडल खेल केवल एक इवेंट नहीं हैं। यह भारत के 2036
ओलंपिक की मेजबानी के सपने की ओर पहला कदम है,
और अहमदाबाद को ही उस बोली का चेहरा बनाया गया है।
अगर हम 2030 में एक भी गलती करते हैं, अगर निर्माण कार्य में देरी होती है, या बुनियादी सुविधाओं पर सवाल उठते हैं, तो ओलंपिक मेजबानी का हमारा सपना धूल फाँक सकता है।
प्रशासन को यह चेतावनी समझनी होगी: 2029 की समय सीमा मजाक नहीं है। हर विभाग को, हर ठेकेदार को यह समझना होगा कि उनके हाथ में केवल सीमेंट और सरिया नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव है।
अहमदाबाद में क्षमता है, संसाधन हैं, और सबसे महत्वपूर्ण, राजनीतिक इच्छाशक्ति है। अब यह देखना है कि क्या यह शहर 2010 की गलतियों से सीखकर, 'तैयार' होने के दावों को 'बेदाग सफलता' की जमीनी हकीकत में बदल पाता है या नहीं।
दुनिया देख रही है। इस बार चूकने की कोई गुंजाइश नहीं है!
- Abhijit
08/12/2025
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