(फोटो सौजन्य: द वायर)
केंद्र सरकार एक बार फिर देश के सबसे बड़े ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA/मनरेगा) को एक नए कलेवर में ढालने की तैयारी में है। नाम दिया गया है— ‘विकसित भारत- गारंटी फॉर रोजगार ऐंड आजीविका मिशन (ग्रामीण): VB-जी राम जी’। ऊपर से देखने पर यह ‘सुधार’ की कवायद लगती है, जहां रोजगार के दिन 100 से बढ़ाकर 125 करने और डिजिटल गवर्नेंस को मजबूत करने का दावा किया जा रहा है, लेकिन गहराई में उतरने पर यह एक राजनीतिक स्टंट और एक ऐतिहासिक, अधिकार-आधारित कानून की आत्मा को कुचलने का भयावह प्रयास नजर आता है।
नाम बदलने की राजनीति: ‘महात्मा’ को बाहर, ‘राम’ को अंदर?
सबसे बड़ा और तीखा सवाल इस योजना के नाम को लेकर है। ‘महात्मा गांधी’ के नाम से जुड़े एक कानून को हटाकर एक ऐसा नाम लाना, जिसका संक्षिप्त रूप ‘जी राम जी’ हो, क्या यह महज एक संयोग है? या फिर यह सत्तारूढ़ दल की उसी सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत देश के हर सरकारी पटल से विपक्षी दलों द्वारा स्थापित की गई ‘विरासत’ को मिटाया जा रहा है?
मनरेगा केवल एक योजना नहीं थी; यह ग्रामीण भारत के लिए एक कानूनी अधिकार था। इसने सूखे और महामारी के समय करोड़ों लोगों को रोटी दी। इसका नाम बदलना, खासकर ऐसे नाम से जो धार्मिक और राजनीतिक भावनाओं को भुनाने का स्पष्ट प्रयास प्रतीत होता है, देश की धर्मनिरपेक्षता और उसकी राजनीतिक शुचिता पर सीधा हमला है। यह बताता है कि सरकार के लिए लोक-कल्याण से ज़्यादा, ब्रांडिंग और वैचारिक कब्जा महत्वपूर्ण है।
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने इस नाम बदलने की प्रक्रिया पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने संसद परिसर में सवाल किया,
"आखिर महात्मा गांधी का नाम क्यों हटाया जा रहा है? नाम बदलने पर जो सरकारी पैसा खर्च होगा, उसका क्या फायदा है? क्या यह सिर्फ अपनी राजनीतिक विचारधारा को थोपने के लिए किया जा रहा है?"
उनकी बात में दम है। एक सफल और वैश्विक स्तर पर प्रशंसित कार्यक्रम को सिर्फ इसलिए बदलना कि उसका नाम एक प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल की विरासत से जुड़ा है, बेहद संकीर्ण और दुर्भाग्यपूर्ण मानसिकता का परिचायक है।
वित्तीय बोझ का राज्यों पर हस्तांतरण
'जी राम जी'
बिल का एक और पहलू, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ सकता है, वह है वित्तीय साझेदारी में बदलाव। मनरेगा में केंद्र सरकार मज़दूरी का पूरा खर्च उठाती थी, जिससे राज्यों पर दबाव कम होता था। नए बिल के ड्राफ्ट में केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 के अनुपात में खर्च साझा करने का प्रस्ताव है।
यह सीधा-सीधा राज्यों पर वित्तीय बोझ डालना है। जहां कई राज्य पहले से ही कर्ज के तले दबे हैं और मनरेगा के बकाया भुगतान को लेकर केंद्र से शिकायत कर रहे हैं, वहीं इस नए नियम से वे इस योजना को लागू करने में हतोत्साहित होंगे। इसका सीधा नुकसान गरीब ग्रामीण मज़दूरों को होगा।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और विपक्षी दल के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है,
"यह विधेयक महात्मा गांधी की विरासत का अनादर है। सबसे बड़ी चिंता है कि सरकार वित्तीय जिम्मेदारी से भाग रही है और राज्यों को बलि का बकरा बना रही है। यह सहकारी संघवाद (Cooperative
Federalism) नहीं, बल्कि वित्तीय ज़बरदस्ती (Fiscal
Coercion) है।"
डिजिटल तानाशाही और केंद्रीकरण का खतरा
सरकार ‘जी राम जी’ योजना को ‘आधुनिक, डिजिटल-शासित’ बता रही है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से धोखाधड़ी रोकने, जीपीएस और मोबाइल आधारित निगरानी की बात है। डिजिटलकरण में कोई बुराई नहीं, लेकिन मनरेगा का विकेंद्रीकृत (decentralised) ढाँचा ग्राम पंचायतों को शक्ति देता था।
नए बिल में, ऐसा प्रतीत होता है कि योजना की योजना, निगरानी और यहाँ तक कि काम की प्राथमिकताएँ भी केंद्र द्वारा तय की जाएंगी। यह ग्राम सभाओं के उस अधिकार को कमजोर करता है, जिसके तहत वे अपनी जरूरतों के अनुसार काम तय करती थीं।
एक और विपक्षी सांसद रंजीता रंजन ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि "मनरेगा में यदि भ्रष्टाचार की कोई चिंता है, तो उसे दूर करने की बजाय आप पूरा कानून ही क्यों बदल रहे हैं? यह महात्मा गांधी का नाम हटाकर अपनी संकीर्ण मानसिकता का प्रदर्शन कर रहे हैं। मनरेगा को कमजोर करना, गरीब को कमजोर करना है।"
सत्तारूढ़ दल की प्रतिक्रिया: सब ‘विकसित भारत’ के लिए
सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इस आलोचना को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका तर्क है कि मनरेगा एक ‘पुरानी’ और ‘लीकेज (भ्रष्टाचार)’ से ग्रस्त योजना बन गई थी, जिसे ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य के साथ तालमेल बिठाने के लिए बदलना ज़रूरी था।
एक प्रमुख सत्तारूढ़ नेता किरेन रिजिजू ने विपक्ष की आलोचना का जवाब देते हुए कहा कि "कांग्रेस को महात्मा गांधी के नाम की चिंता नहीं करनी चाहिए। मनरेगा में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार था और 100 दिन का काम भी पूरा नहीं हो पाता था। हमारी नई योजना ‘जी राम जी’ न केवल 125 दिन के रोजगार की गारंटी देगी, बल्कि एआई और डिजिटल तकनीक से भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करेगी।"
वे दावा करते हैं कि यह योजना अब केवल गड्ढे खोदने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जल सुरक्षा, ग्रामीण बुनियादी ढाँचा और आजीविका-संबंधी कार्यों पर ध्यान केंद्रित करेगी, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सही मायने में मजबूती मिलेगी।
राजनीतिकरण बनाम लोक कल्याण
इसमें कोई संदेह नहीं कि मनरेगा में सुधार की गुंजाइश थी, खासकर मजदूरी भुगतान में देरी और भ्रष्टाचार की शिकायतों को लेकर। लेकिन, एक अधिकार-आधारित कानून को जड़ से खत्म करके, एक ऐसा नाम थोपना जिसमें स्पष्ट रूप से राजनीतिक और वैचारिक एजेंडा दिखता हो, यह बताता है कि सरकार की प्राथमिकताएँ क्या हैं।
क्या ‘जी राम जी’ वास्तव में मनरेगा से बेहतर होगा? क्या 125 दिन की गारंटी, डिजिटल निगरानी और चार प्राथमिकता वाले क्षेत्र ग्रामीण भारत की गरीबी और पलायन की समस्या को हल कर पाएँगे, जबकि राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ रहा है?
यह बिल ग्रामीण भारत के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह देखना होगा कि संसद में विपक्ष कितना मजबूत विरोध दर्ज करा पाता है, क्योंकि अगर यह बिल अपने मौजूदा रूप में पारित हुआ, तो यह सिर्फ एक कानून का बदलाव नहीं होगा— यह देश की एक महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा जाल की राजनीतिक बलि होगी, जिसके बाद ग्रामीण मज़दूरों का अधिकार, राजनीतिक इच्छाशक्ति और राज्य सरकारों की आर्थिक स्थिति की दया पर निर्भर हो जाएगा।
- Abhijit
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