गुजरात की धरती से उभरे 'विकास मॉडल' का ढोल पूरे देश में पीटा जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर मंच से खुद को 'गरीबों का मसीहा' और 'प्रधान सेवक' घोषित करते हैं। लेकिन जब उसी गुजरात के 200 से अधिक मछुआरे पाकिस्तान की काल कोठरियों में अपनी जिंदगी के दिन गिन रहे हों और उनके बिलखते परिवारों को मदद के बजाय सत्ता का अहंकार परोसा जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है—क्या यह सरकार सच में गरीबों के साथ है, या 'गरीब कल्याण' महज एक विज्ञापन का नारा बनकर रह गया है?
जीतू वाघाणी का बयान: सत्ता के नशे में डूबी संवेदनहीनता
हाल ही में गुजरात के कृषि और मत्स्य पालन मंत्री जीतू वाघाणी ने उन परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया, जो सालों से अपने अपनों की वापसी की राह देख रहे हैं। जब इन परिवारों ने अपनी गुहार लगाई, तो मंत्री महोदय ने उन्हें सहानुभूति देने के बजाय उल्टा उन पर 'राजनीति करने' का आरोप जड़ दिया।
यह केवल एक मंत्री का निजी बयान नहीं है, बल्कि यह उस विचारधारा का प्रतिबिंब है जिसमें सत्ता के सामने सिर झुकाकर खड़े न होने वाले हर पीड़ित को 'राजनीति' का हिस्सा बता दिया जाता है। क्या एक गरीब मां का अपने बेटे के लिए रोना राजनीति है? क्या एक पत्नी का अपने पति की रिहाई की मांग करना अपराध है? मंत्री जी, राजनीति वो लोग कर रहे हैं जो इन मछुआरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रहे हैं, न कि वो जो अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी: कथनी और करनी का अंतर
प्रधानमंत्री मोदी अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी धाक जमाने और पड़ोसी मुल्कों को 'घर में घुसकर मारने' की बात करते हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि पाकिस्तान की जेलों में बंद हमारे मछुआरों के मुद्दे पर केंद्र सरकार की कूटनीति पूरी तरह पस्त नजर आती है।
एक तरफ प्रधानमंत्री 'सबका साथ, सबका विकास' का संकल्प दोहराते हैं, तो दूसरी तरफ उनके अपने गृह राज्य के कैबिनेट मंत्री उन्हीं के लोगों का अपमान करते हैं। यदि प्रधानमंत्री वाकई गरीबों के रक्षक होते, तो क्या उनकी नाक के नीचे एक मंत्री इस तरह की बदतमीजी करने की हिम्मत जुटा पाता? यह खामोशी बताती है कि शायद सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए ये मछुआरे और उनके वोट तभी तक महत्वपूर्ण हैं जब तक वे शांत हैं। जैसे ही वे सवाल पूछते हैं, वे 'विपक्ष के मोहरे' या 'राजनीति करने वाले' हो जाते हैं।
केंद्र सरकार की विफलता: कूटनीति या सिर्फ दिखावा?
आज भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों का जो हाल है, उसका सबसे ज्यादा खामियाजा सीमावर्ती इलाकों के गरीब समुदायों को भुगतना पड़ रहा है। पाकिस्तान की जेलों में बंद ये 200 मछुआरे कोई आतंकवादी नहीं हैं, वे अपना पेट पालने के लिए समुद्र की लहरों से लड़ने वाले मेहनतकश लोग हैं।
केंद्र सरकार की विदेश नीति क्या केवल फोटो-अवसरों तक सीमित है? क्यों अरब सागर में 'वेसल कम्युनिकेशन सिस्टम' और सुरक्षा घेरा इतना कमजोर है कि आए दिन हमारे नागरिकों को पकड़ लिया जाता है? और पकड़े जाने के बाद उनकी रिहाई के लिए वो 'इच्छाशक्ति' क्यों नहीं दिखती जो बड़े उद्योगपतियों के हितों की रक्षा के लिए दिखाई जाती है?
रक्षक या सिर्फ प्रचारक?
जीतू वाघाणी का व्यवहार यह स्पष्ट करता है कि भाजपा के भीतर अब संवाद की जगह अहंकार ने ले ली है। प्रधानमंत्री मोदी को यह समझना होगा कि वे केवल उन लोगों के प्रधानमंत्री नहीं हैं जो उनकी जय-जयकार करते हैं, बल्कि उनके भी हैं जो व्यवस्था की मार झेल रहे हैं।
अगर सरकार इन 200 परिवारों को न्याय और उनके अपनों की वापसी सुनिश्चित नहीं कर सकती, तो उसे 'गरीब नवाज' होने का नाटक बंद कर देना चाहिए। देश की जनता देख रही है कि संकट के समय कौन खड़ा होता है और कौन सिर्फ राजनीति का आरोप लगाकर अपना पल्ला झाड़ लेता है। मछुआरों की ये आंसू भरी आंखें आने वाले समय में सत्ता के इस घमंड को चकनाचूर करने की ताकत रखती हैं।
- Abhijit
23/12/2025
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