
हाल के वर्षों में गुजरात के शैक्षणिक संस्थानों से आने वाली आत्महत्या की खबरें न केवल विचलित करने वाली रही हैं, बल्कि यह हमारे शिक्षा तंत्र की विफलता का भी संकेत थीं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों और हालिया रिपोर्टों के अनुसार, गुजरात में पिछले पांच वर्षों में 3000 से अधिक छात्रों ने अपनी जान दी है। इस गंभीर संकट को देखते हुए गुजरात सरकार ने अब राज्य के सभी कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और निजी कोचिंग संस्थानों के लिए अनिवार्य मानसिक स्वास्थ्य नीति (Mandatory Mental Health Policy) लागू करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है।
नीति का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ: 100:1 का अनुपात
इस नई नीति की सबसे बड़ी और क्रांतिकारी विशेषता यह है कि अब प्रत्येक कॉलेज और विश्वविद्यालय में हर 100 छात्रों पर कम से कम एक योग्य काउंसलर की नियुक्ति अनिवार्य होगी।
- छोटे संस्थानों के लिए प्रावधान: जिन संस्थानों में छात्रों की संख्या 100
से कम है,
उन्हें बाहरी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ औपचारिक 'रेफरल व्यवस्था' करनी होगी।
- गोपनीयता की गारंटी: छात्रों को मिलने वाला परामर्श पूरी तरह गोपनीय और संवेदनशील होगा, विशेषकर परीक्षा के तनाव और शैक्षणिक परिवर्तनों के दौरान।
कोचिंग संस्थानों की 'मनमानी' पर लगाम
अक्सर देखा गया है कि निजी कोचिंग संस्थानों में अंकों और प्रदर्शन के आधार पर छात्रों के बीच भेदभाव किया जाता है, जो उनके मानसिक दबाव का मुख्य कारण बनता है। नई गाइडलाइन ने इस पर कड़ा प्रहार किया है:
- भेदभाव पर रोक: शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर छात्रों को अलग-अलग समूहों में बांटना या उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित करना अब प्रतिबंधित है।
- यथार्थवादी अपेक्षाएं: संस्थानों को निर्देश दिया गया है कि वे छात्रों पर अवास्तविक लक्ष्यों का दबाव न डालें।
इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा में बदलाव
आत्महत्या के प्रयासों को भौतिक रूप से रोकने के लिए भी सरकार ने सख्त निर्देश जारी किए हैं:
- हॉस्टल सुरक्षा: हॉस्टल के कमरों में 'एंटी-सुसाइड पंखे' (जिन पर वजन पड़ते ही वे नीचे गिर जाते हैं) और बालकनियों में ग्रिल लगाना अनिवार्य कर दिया गया है।
- हेल्पलाइन का प्रदर्शन: कैंपस, क्लासरूम और वेबसाइटों पर 'टेली-मानस' और स्थानीय हेल्पलाइन नंबर बड़े अक्षरों में प्रदर्शित करने होंगे।
शिक्षकों और कर्मचारियों का प्रशिक्षण
मानसिक स्वास्थ्य केवल काउंसलर की जिम्मेदारी नहीं है। नई नीति के तहत:
- शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को साल में
दो बार
'मेंटल हेल्थ फर्स्ट एड'
और शुरुआती चेतावनी संकेतों को पहचानने का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
- संस्थानों को एक
'कैंपस वेलनेस टीम' बनानी होगी, जो नियमित रूप से छात्रों की स्थिति की समीक्षा करेगी।
समावेसी वातावरण पर जोर
सरकार ने स्पष्ट किया है कि SC, ST, OBC, EWS और LGBTQ+ समुदायों के छात्रों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव या रैगिंग बर्दाश्त नहीं की जाएगी। एक सुरक्षित और समावेशी वातावरण तैयार करना अब कानूनी और नैतिक रूप से अनिवार्य है।
गुजरात सरकार की यह पहल कागजों पर तो बहुत मजबूत और संवेदनशील नजर आती है। 100 छात्रों पर 1 काउंसलर का नियम यदि ईमानदारी से लागू होता है, तो यह देश के अन्य राज्यों के लिए एक रोल मॉडल बन सकता है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कॉलेज इसे केवल एक 'अनुपालन' के रूप में देखते हैं या छात्रों के प्रति एक 'मानवीय जिम्मेदारी' के रूप में।
छात्रों की जान अंकों से कहीं अधिक कीमती है, और यह नीति उसी दिशा में एक ठोस कदम है।
- Abhijit
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