Friday, December 19, 2025

दिल्ली की 'दमघोंटू' राजनीति: बीजेपी और एनडीए सरकार की खोखली राजनीति का सच

देश की राजधानी दिल्ली, जिसे कभी 'दिल वालों की दिल्ली' कहा जाता था, आज 'दम घोंटने वाली दिल्ली' बन गई है। हर साल सर्दियों की शुरुआत के साथ, दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों को एक मोटे, जहरीले स्मॉग की चादर घेर लेती है, जो हमारे फेफड़ों को छलनी कर देती है और जीवन को नारकीय बना देती है। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि हमारी सरकारों की घोर लापरवाही, अक्षमता और अदूरदर्शिता का जीता-जागता प्रमाण है। और इस त्रासदी के लिए सीधे तौर पर दिल्ली की बीजेपी इकाई और केंद्र की एनडीए सरकार जिम्मेदार है, जो बड़ी-बड़ी बातें करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं करती।

विज्ञापनों की चमक और फेफड़ों की कालिख

दिल्ली की सड़कों पर चलते हुए आपको बड़े-बड़े होर्डिंग्स दिखेंगे, जिनमें प्रदूषण कम करने के 'ऐतिहासिक' दावों की चमक होगी। लेकिन हकीकत यह है कि आज दिल्ली का एक्यूआई (AQI) 400 और 500 के पार जाना एक सामान्य बात हो गई है। जब लोग सांस लेने के लिए तड़प रहे होते हैं, तब दिल्ली भाजपा के नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विपक्ष पर ठीकरा फोड़ने में मशगूल होते हैं। सवाल यह है कि अगर आप दिल्ली की व्यवस्था में हिस्सेदार हैं, तो यह विफलता आपकी क्यों नहीं है?

सत्ताधारी दल के नेता अक्सर कहते हैं कि यह 'मौसम की मार' है। क्या वाकई? क्या प्रदूषण केवल दिसंबर में ही आता है? सच तो यह है कि पूरे साल तो सड़कों की धूल रोकने के लिए कोई बुनियादी काम हुआ, ही औद्योगिक प्रदूषण पर लगाम लगी। 'ग्रैप-4' (GRAP-4) जैसे नियम केवल कागजों पर लागू होते हैं, जबकि जमीन पर निर्माण कार्य और कूड़े का जलना बदस्तूर जारी रहता है।

केंद्र सरकार की 'मूक' भागीदारी

प्रदूषण केवल दिल्ली का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक क्षेत्रीय समस्या है, जिसमें हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे पड़ोसी राज्यों की भूमिका भी अहम है। पराली जलाना, औद्योगिक उत्सर्जन, वाहनों का धुआं और धूलये सभी मिलकर दिल्ली की हवा को जहरीला बनाते हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए एक समन्वित और दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें केंद्र सरकार की सक्रिय भूमिका अनिवार्य है।

लेकिन केंद्र की एनडीए सरकार क्या कर रही है? वह दिल्ली सरकार और पड़ोसी राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करने में पूरी तरह विफल रही है। हर साल, पराली जलाने के मुद्दे पर केवल बहस होती है, लेकिन किसानों को वैकल्पिक समाधान उपलब्ध कराने या पराली प्रबंधन के लिए ठोस कदम उठाने में कोई गंभीरता नहीं दिखती। बड़े-बड़े मंत्रालय और विभाग हैं, जो वायु प्रदूषण से निपटने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन वे बस कागजी घोड़े दौड़ाते रहते हैं, जबकि दिल्ली के लोग दम घुट-घुट कर मरते रहते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो हर मंच से 'न्यू इंडिया' और 'विकसित भारत' की बात करते हैं, उन्हें क्या दिल्ली के लाखों नागरिकों का स्वास्थ्य नजर नहीं आता? क्या उन्हें दिल्ली की प्रदूषित हवा में घुली मौत की गंध महसूस नहीं होती? या फिर उनके लिए जनता का स्वास्थ्य केवल चुनावी मुद्दा है, जिसे वे अपनी सहूलियत के हिसाब से उठाते और छोड़ते हैं? यह उदासीनता और गैर-जिम्मेदारी अक्षम्य है।

जवाबदेही से भागना और जनता को गुमराह करना

बीजेपी और केंद्र सरकार की एक और बड़ी चाल है, जवाबदेही से भागना। जब भी प्रदूषण का मुद्दा उठता है, वे आंकड़ों की बाजीगरी करते हैं, पुरानी सरकारों पर ठीकरा फोड़ते हैं, या फिर विदेशी साजिश का राग अलापते हैं। लेकिन वे कभी भी अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते और ही अपनी विफलताओं की जिम्मेदारी लेते हैं।

जनता को गुमराह करना इनकी राजनीति का आधार बन गया है। वे विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये खर्च करते हैं, अपनी उपलब्धियों का ढोल पीटते हैं, लेकिन जब दिल्ली के लोगों को साफ हवा चाहिए होती है, तब वे गायब हो जाते हैं। क्या यह 'लोकतंत्र' है जहां सरकार जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है? क्या यह 'सुशासन' है जहां सरकार अपने नागरिकों को मरने के लिए छोड़ देती है?

समाधान की कमी, सिर्फ राजनीति का खेल

प्रदूषण एक जटिल समस्या है जिसके समाधान के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसमें सार्वजनिक परिवहन में सुधार, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना, उद्योगों के लिए सख्त उत्सर्जन मानक लागू करना, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण, कचरा प्रबंधन और पराली जलाने पर प्रभावी रोक जैसे कदम शामिल हैं।

लेकिन बीजेपी और एनडीए सरकार के पास इन समस्याओं का कोई वास्तविक समाधान नहीं है। वे केवल बयानबाजी करते हैं, आरोप-प्रत्यारोप खेलते हैं और जनता का ध्यान भटकाते हैं। उनके लिए, प्रदूषण सिर्फ एक राजनीतिक हथियार है, जिसका उपयोग वे दिल्ली में अपनी सत्ता की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए करते हैं। यह एक शर्मनाक स्थिति है, जहां राजनीति ने लोगों के जीवन से ऊपर अपनी जगह बना ली है।

दावों का खोखलापन

दिल्ली भाजपा अक्सर 'डबल इंजन' सरकार की दुहाई देती है। लेकिन दिल्ली में जब उनके पास मौका था, तब क्या हुआ? एमसीडी में सालों तक सत्ता में रहने के बावजूद कूड़े के पहाड़ जस के तस रहे। आज जब प्रदूषण बढ़ता है, तो वे तुरंत 'कृत्रिम बारिश' या 'स्मॉग टॉवर' जैसे खर्चीले और अप्रभावी खिलौनों की बात करने लगते हैं। यह जनता की आंखों में धूल झोंकने के सिवा कुछ नहीं है। स्मॉग टॉवर जो करोड़ों की लागत से बने, आज धूल खा रहे हैं। क्या यह जनता के पैसे की बर्बादी नहीं है?

विपक्ष बार-बार यह सवाल उठाता है कि जब प्रदूषण चरम पर होता है, तब ही सरकारें क्यों जागती हैं? जुलाई-अगस्त के महीनों में जब प्रदूषण कम होता है, तब सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करने, सड़कों को गड्ढा मुक्त बनाने और हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए काम क्यों नहीं होता?

दिल्ली की जनता कब तक सहेगी?

दिल्ली की जनता, जो हर साल इस जहरीली हवा को सहने को मजबूर है, अब और कितना धैर्य रखेगी? क्या हमें अपनी सरकारों से स्वच्छ हवा मांगने का भी अधिकार नहीं है? क्या हमारा जीवन इतना सस्ता है कि सरकारें हमें मरने के लिए छोड़ दें?

यह समय है कि दिल्ली की जनता बीजेपी और एनडीए सरकार से जवाब मांगे। यह समय है कि हम इन खोखले वादों और झूठे नारों से बाहर आएं और अपनी सरकारों को उनकी जिम्मेदारियों का एहसास कराएं। हमें ऐसी सरकार चाहिए जो प्रदूषण के मुद्दे पर गंभीर हो, जिसके पास ठोस योजनाएं हों और जो उन योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू कर सके। हमें ऐसी सरकार नहीं चाहिए जो केवल राजनीति करती रहे और हमें मौत के मुंह में धकेलती रहे।

दिल्ली की हवा में घुला यह जहर बीजेपी और एनडीए सरकार की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत है। यह उनकी जनविरोधी नीतियों और भ्रष्टाचार का प्रतीक है। जब तक ये सरकारें अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगी, दिल्ली का दम घुटता रहेगा, और हम एक जहरीले भविष्य की ओर बढ़ते रहेंगे।

- Abhijit

19/12/2025

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