Monday, December 15, 2025

भारतकूल अध्याय-2: विमर्श, संस्कृति और विकसित भारत का संकल्प

सकारात्मकता के आईने में मीडिया, युवा शक्ति और 'भाव, राग, ताल' की पड़ताल

गुजरात मीडिया क्लब द्वारा आयोजित 'भारतकूल अध्याय-2' केवल एक सम्मलेन नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की सांस्कृतिक चेतना, युवा आकांक्षाओं और मीडिया के नैतिक दायित्वों पर एक त्रि-दिवसीय वैचारिक महाकुंभ था। अहमदाबाद की गुजरात यूनिवर्सिटी में संपन्न हुए इस आयोजन ने, राजनीति, अध्यात्म, साहित्य और पत्रकारिता के दिग्गजों को एक मंच पर लाकर, राष्ट्र निर्माण के लिए एक व्यापक एजेंडा निर्धारित किया। इस वर्ष के विमर्श का केंद्रबिंदु 'विकसित भारत @ 2047' के संकल्प को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना था, और इसमें जिन महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहन चर्चा हुई, उनका विश्लेषण आज के समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है।

मीडिया का धर्म: सवाल समाज से, सवाल 'स्व' से भी

कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और उप-मुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने मीडिया की भूमिका पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि राज्य के विकास में मीडिया की भूमिका एक 'सहायक' की है। उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियों में सुधार और लोक कल्याण के लिए उचित आलोचना आवश्यक है, लेकिन उस आलोचना का भाव हमेशा सकारात्मक होना चाहिए और उसका उद्देश्य लोक कल्याण होना चाहिए। उनका यह आह्वान वर्तमान मीडिया परिदृश्य के लिए एक मार्मिक टिपण्णी है, जहाँ टीआरपी की दौड़ में सकारात्मकता अक्सर नकारात्मकता के शोर में दब जाती है। मुख्यमंत्री ने आशा व्यक्त की कि इसी सकारात्मक दृष्टिकोण से 'नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदलकर विकसित भारत का सपना साकार किया जाएगा।'

इस विमर्श को नया आयाम दिया बी..पी.एस. संस्था के संत पूज्य ब्रह्मविहारी स्वामी ने उन्होंने मीडिया के मूल धर्म यानी सत्य को उजागर करने पर जोर दिया, जिसके लिए लगातार सवाल पूछते रहना चाहिए। लेकिन, उन्होंने यहीं एक गहरी आध्यात्मिक और नैतिक टिपण्णी भी की: “साथ ही साथ 'स्वयं' से भी प्रश्न पूछते रहना चाहिए। यह अंतर्दृष्टि पत्रकारिता को केवल बाहरी आलोचना तक सीमित रखने के बजाय, आत्म-परीक्षण और नैतिक जवाबदेही के एक उच्च स्तर पर ले जाती है। स्वामी जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भारत को विश्वगुरु बनाने के प्रयासों की सराहना करते हुए नागरिकों से राष्ट्र-निर्माण में सहभागिता का आग्रह किया।

गुजरात के विकास में 'भाव, राग और ताल' का महत्त्व

उप-मुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने गुजरात के विकास मॉडल को 'भाव, राग और ताल' (Bhav, Raag, Taal - भावना, माधुर्य/सामंजस्य, और लय/ताल) के तीन स्तंभों पर आधारित बताया, जो इस आयोजन का एक अनूठा विषय था। यह अवधारणा विकास को केवल आर्थिक आँकड़ों तक सीमित रखकर, मानवीय भावना, सांस्कृतिक सामंजस्य और कार्य की निरंतर गति (ताल) से जोड़ती है।

  • भाव: यह राष्ट्र या राज्य के प्रति समर्पण की भावना है। संघवी ने कहा कि विकास के लिए यह भावना आवश्यक है कि राज्य के लिए कुछ अच्छा हो तो खुशी हो और कुछ गलत हो तो दुःख हो। यह अपनेपन का भाव ही सामूहिक प्रगति का आधार बनता है।
  • राग: यह सांस्कृतिक और कलात्मक विकास को दर्शाता है। गुजरात सरकार द्वारा वड़नगर में देश के सबसे बड़े संगीत स्टूडियो की स्थापना की योजना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। यह राग युवाओं को अपनी विरासत और प्रतिभा से जुड़ने का मंच देता है।
  • ताल: यह विकास कार्यों की निरंतरता और सही गति को दर्शाता है। यह दर्शाता है कि सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करते हुए आधुनिकता के साथ सही तालमेल बिठाना जरूरी है।

'भाव, राग और ताल' का यह संयोजन यह साबित करता है कि सांस्कृतिक गहराई और विकास की गति एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।

सनातन संस्कृति और विकसित भारत @ 2047 का संकल्प

'भारतकूल अध्याय-2' का सबसे बड़ा विमर्श 'विकसित भारत @ 2047' के लक्ष्य को भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में देखना था। मुख्यमंत्री पटेल ने भारतीय संस्कृति के महत्व पर बल दिया और कहा कि विश्व में भारत की पहचान उसकी प्राचीन और परम् सत्य की ओर ले जाने वाली संस्कृति के कारण ही है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे आधुनिकता की दौड़ में आगे बढ़ें, लेकिन अपनी सनातन सभ्यता के मूल मूल्यों को भूलें। 'स्वदेशी' मूल्यों को अपनाना और 'गुलामी की मानसिकता' से मुक्ति पाकर ही युवा विकास के पथ पर आगे बढ़ सकते हैं।

इस विमर्श ने यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय गौरव के क्षणों का स्मरण जैसे सरदार पटेल और बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती, वन्दे मातरम के 150 वर्ष, केवल अतीत का गुणगान नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण के लिए एक सांस्कृतिक आधार प्रदान करते हैं। 'भारतकूल' का आयोजन स्वयं एक ऐसा मंच है जो युवाओं को उनकी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ता है।

साहित्य, कला और युवा चिंतन का योगदान

इस तीन दिवसीय आयोजन में विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गजों ने अपने विचारों से विमर्श को समृद्ध किया। प्रसिद्ध स्तंभकार और विचारक जैसे जय वसावडा, साहित्यकार राम मोरी और अन्य सांस्कृतिक वक्ता द्वारकेशलाल महाराज, ने युवाओं को साहित्य, कला और लोक-संस्कृति से जोड़ने पर गहन चर्चा की।

  • जय वसावडा ने हमेशा समाज और युवाओं को बदलते वैश्विक परिदृश्य को समझने के लिए प्रेरित किया है, लेकिन साथ ही वे अपनी जड़ों, खासकर गुजराती अस्मिता और साहित्य से जुड़े रहने की बात करते हैं।
  • युवा साहित्यकार राम मोरी ने भाषा और कहानियों के माध्यम से भावनात्मक जुड़ाव और समकालीन जीवन की सच्चाइयों पर प्रकाश डाला।
  • द्वारकेशलाल महाराज ने आध्यात्मिक और सांस्कृतिक वक्ताओं ने सनातन परंपरा और भक्ति के माध्यम से जीवन मूल्यों के महत्व को रेखांकित किया।

इन सभी व्यक्तित्वों की उपस्थिति ने यह सुनिश्चित किया कि 'भारतकूल अध्याय-2' का विमर्श केवल नीतियों और मीडिया तक सीमित रहे, बल्कि जीवन के हर आयामव्यक्तिगत नैतिकता, कलात्मक अभिव्यक्ति और सामाजिक चेतनाको छूता हुआ आगे बढ़े।

एक समग्र विमर्श की आवश्यकता

'भारतकूल अध्याय-2' ने गुजरात की चिंतन-परंपरा को आगे बढ़ाया है। यह आयोजन एक शक्तिशाली संदेश देता है कि राष्ट्र के विकास के लिए आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सांस्कृतिक जड़ों और नैतिक मूल्यों का मजबूत होना अनिवार्य है। मुख्यमंत्री द्वारा सकारात्मक आलोचना का आग्रह, पूज्य संत द्वारा आत्म-परीक्षण पर जोर, और उप-मुख्यमंत्री द्वारा 'भाव, राग, ताल' का दर्शनये सभी मिलकर एक ऐसे समग्र दृष्टिकोण का निर्माण करते हैं जो भारत को 2047 तक 'विकसित' और 'विश्वगुरु' बनाने की क्षमता रखता है। इस तरह के बौद्धिक मंचों से निकले विचारों को नीतिगत निर्णयों में शामिल करना ही इसकी वास्तविक सफलता होगी।

- Abhijit

15/10/2025

3 comments:

  1. बहुत सुंदर भाई

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  2. ग्रेट सफल रूप में है

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