देश का लोकतंत्र आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ हर चुनाव के बाद सबसे पवित्र प्रक्रिया पर ही सबसे बड़े सवाल खड़े हो जाते हैं। गुजरात, जिसे अक्सर 'विकास का मॉडल' कहा जाता है, आज चुनावी प्रक्रिया में 'धांधली का मॉडल' बनने के गंभीर आरोपों के घेरे में है। गुजरात कांग्रेस का दावा है कि राज्य के चुनावी इतिहास में लगभग 74 लाख वोटों की चोरी हुई है। यह कोई छोटा-मोटा इल्जाम नहीं, यह सीधा-सीधा भारत के संविधान और आम नागरिक के मताधिकार पर किया गया सबसे बड़ा हमला है। जब विपक्षी दल इतने विशाल और भयावह आँकड़े पेश कर रहे हों, तो सत्ताधारी दल और देश के शीर्ष चुनावी निकाय, दोनों की चुप्पी और बेरुखी न केवल चौंकाने वाली है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को झकझोर देने वाली भी है।
आज, जब देश 'वोटर अधिकार यात्रा' के नारों से गूँज रहा है, तब गुजरात की जमीन से उठी ये आवाजें चीख़-चीख़कर कह रही हैं कि चुनावी तंत्र के भीतर एक भयानक षड्यंत्र रचा जा रहा है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अमित चावड़ा ने नवसारी लोकसभा सीट के चोर्यासी विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण पेश करते हुए बताया कि जब उन्होंने 40% मतदाताओं की प्राथमिक जाँच की, तो 12.3 प्रतिशत यानी लगभग 30,000 मतदाता संदिग्ध, डुप्लीकेट या फर्जी पाए गए। यदि इस अनुपात को पूरे राज्य पर लागू किया जाए, तो फर्जी और डुप्लीकेट मतदाताओं की संख्या 62
लाख से 74 लाख के बीच पहुँच सकती है!
ये आँकड़े केवल कागजी जमा-खर्च नहीं हैं। ये साबित करते हैं कि फर्जीवाड़ा एक या दो नहीं, बल्कि पाँच अलग-अलग तरीकों से किया गया है—डुप्लीकेट नाम, स्पेलिंग और पते में जानबूझकर की गई गलतियाँ, और अलग-अलग EPIC कार्ड के माध्यम से एक ही व्यक्ति के कई वोट दर्ज करना। यह संगठित अपराध की तरह है, जिसे अंजाम देने के लिए एक विशाल मशीनरी लगी होगी।
सोचिए, एक नागरिक का वोट, जो देश के भविष्य की नींव है, उसे किस तरह से पानी की तरह बहाया जा रहा है। लोकशाही का मूलभूत सिद्धांत है - 'एक व्यक्ति, एक वोट'। लेकिन अगर मतदाता सूची ही भ्रष्टाचार की शिकार हो जाए, अगर हर आठवें या दसवें वोटर के नाम पर संदेह का साया हो, तो चुनावी परिणाम क्या सिर्फ संख्याओं का खेल नहीं रह जाते? क्या यह साफ़ तौर पर सत्ता का दुरुपयोग नहीं है, जहाँ मतदाता सूची को अपनी जीत सुनिश्चित करने का औजार बना लिया गया है?
लाशों पर सियासत: SIR ड्यूटी और BLOs की मौत
वोट चोरी के इस गंभीर आरोप के समानांतर, चुनावी तंत्र के एक और भयानक सच ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है: बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) की दर्दनाक मौतें। गुजरात में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) यानी मतदाता सूची पुनरीक्षण के काम में जुटे कई शिक्षक और सरकारी कर्मचारी, जो BLOs के रूप में काम कर रहे थे, अत्यधिक काम के दबाव और तनाव के कारण अपनी जान गँवा चुके हैं।
हाल ही में, गिर सोमनाथ जिले के एक शिक्षक और BLO अधिकारी, अरविंद वाढ़ेरे ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। उन्होंने अपने सुसाइड नोट में साफ तौर पर लिखा कि वह SIR के असहनीय काम के बोझ को संभाल नहीं पा रहे थे। इसके अलावा, राज्य के कई अन्य BLOs की मौतें हार्ट अटैक से हुईं, जिनके परिवारों ने सीधे-सीधे काम के अत्यधिक दबाव को जिम्मेदार ठहराया है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि पूरे देश में ऐसी कई दर्दनाक घटनाएँ हुई हैं, लेकिन गुजरात में मौतों का आँकड़ा चिंताजनक है।
यह कैसी विडंबना है! लोकतंत्र की बुनियाद को 'साफ' करने की जिम्मेदारी जिन लोगों पर है, उन्हें ही काम के बोझ तले दबाकर मार दिया जा रहा है। चुनाव आयोग और राज्य सरकार इन मौतों को सामान्य घटना या स्वास्थ्य समस्या बताकर पल्ला झाड़ सकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या एक शिक्षक, जिसे अपनी क्लास में होना चाहिए, उसे आधी-अधूरी तकनीकी प्रणालियों और अमानवीय डेडलाइन के साथ फील्ड वर्क में झोंक देना उचित है? यह साफ तौर पर बताता है कि चुनावी तंत्र जमीनी हकीकत से कितना कटा हुआ है।
BLOs की मौतें, चुनावी धांधली से भी अधिक बड़ा नैतिक पतन है। यह दिखाता है कि इस प्रक्रिया को 'निष्पक्ष' बनाए रखने की कीमत सरकारी कर्मचारियों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। चुनाव आयोग को इन लाशों पर सियासत करने के बजाय, फौरन SIR की प्रक्रिया को मानवीय बनाने और पीड़ितों के परिवारों को न्याय दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। इन मौतों का सीधा-सीधा दोष उस तंत्र पर जाता है, जो काम के दबाव को कम करने के लिए कोई विकल्प नहीं तलाशता।
सत्ता का खंडन और आयोग की चुप्पी
जब कांग्रेस ने ये सनसनीखेज आरोप लगाए, तो सत्ता पक्ष का खंडन पूर्वानुमानित था। गृह मंत्री अमित शाह ने इन आरोपों को कांग्रेस की हताशा बताया और कहा कि यह विपक्षी दलों द्वारा अपनी हार छिपाने और चुनाव आयोग की छवि खराब करने की एक कोशिश है। उन्होंने 'वोट चोरी' का असली इतिहास कांग्रेस पर थोप दिया, नेहरू और इंदिरा गांधी के दौर के पुराने विवादों को हवा दी। यह राजनीतिक दाँव-पेंच अपनी जगह सही हो सकता है, लेकिन यह गुजरात में उठाए गए विशिष्ट और तथ्य-आधारित सवालों का जवाब नहीं है।
सवाल यह नहीं है कि अतीत में क्या हुआ, सवाल यह है कि आज गुजरात की मतदाता सूची में फर्जीवाड़े के इतने गंभीर प्रमाण क्यों मिल रहे हैं? सवाल यह है कि देश का चुनाव आयोग, जो एक स्वतंत्र और निष्पक्ष निकाय होने का दावा करता है, वह इन 60-70 लाख संदिग्ध वोटों के मामले पर एक व्यापक, स्वतंत्र और पारदर्शी जाँच क्यों नहीं करवा रहा है?
चुनाव आयोग की चुप्पी, या फिर आरोपों को गोलमोल जवाब देकर टाल देना, इस पूरे मामले को और भी गंभीर बना देता है। जब आयोग वोट चोरी के आरोपों पर सख्त कार्रवाई करने के बजाय, यह कह कर पल्ला झाड़ लेता है कि 'चंदे की जाँच करना हमारा काम नहीं', तो यह आम जनता के मन में संदेह पैदा करता है कि क्या यह संस्था वाकई निष्पक्ष है, या फिर राजनीतिक दबाव में काम कर रही है।
चुनाव आयोग को यह समझना होगा कि उसकी विश्वसनीयता ही इस देश के लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूँजी है। अगर मतदाता सूची की पवित्रता पर ही सवाल उठने लगें, अगर BLO जैसे जमीनी स्तर के अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित न हो, तो फिर हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दावा किस आधार पर कर सकते हैं?
समय आ गया है कि चुप्पी तोड़ी जाए
गुजरात के ये आरोप सिर्फ एक राज्य या एक पार्टी तक सीमित नहीं हैं। ये पूरे देश के चुनावी तंत्र के लिए एक खतरे की घंटी हैं। 74 लाख वोटों की चोरी का आरोप, BLOs
की मौतें, और सत्ताधारी पार्टी एवं चुनाव आयोग का असंवेदनशील रवैया—ये सभी मिलकर एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं, जो भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
समय आ गया है कि चुनाव आयोग अपनी 'मौनव्रत' तोड़े और इन आरोपों पर तत्काल और पारदर्शी कार्रवाई करे। एक स्वतंत्र जाँच टीम का गठन किया जाना चाहिए जो मतदाता सूची के हर पन्ने की पड़ताल करे, और BLOs की मौत के लिए जिम्मेदार काम के दबाव को खत्म करने के लिए तत्काल नीतिगत बदलाव लाए।
अगर आज हमने इन गंभीर सवालों पर आँखें मूंद लीं, तो कल लोकतंत्र की पूरी इमारत ही फर्जी वोटों और दबाव में काम करने वाले कर्मचारियों की लाशों पर खड़ी होगी। यह एक ऐसी कीमत होगी, जिसे चुकाने के लिए देश की कोई भी पीढ़ी तैयार नहीं होगी। लोकतंत्र को बचाना है, तो सबसे पहले उसके बुनियाद—मतदाता सूची और उसे संचालित करने वाले कर्मचारियों—की सुरक्षा और पवित्रता सुनिश्चित करनी होगी।
- Abhijit
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