(फ़ाइल चित्र)
हाल के दिनों में, लखनऊ से लेकर दिल्ली तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई ताबड़तोड़ बैठकों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है। अगस्त 2024 से लेकर दिसंबर 2025 तक, विभिन्न स्तरों पर आयोजित इन "समन्वय बैठकों" का आधिकारिक उद्देश्य भले ही सरकार, संगठन और संघ परिवार के बीच बेहतर तालमेल बिठाना रहा हो, लेकिन सूत्रों से छनकर बाहर आई अंदरूनी कहानी कुछ और ही संकेत देती है। यह कहानी अनुशासन के एक नए, कठोर अध्याय की है, जहाँ किसी खास नेतृत्व पर सवाल उठाना अब केवल मतभेद नहीं, बल्कि ‘विद्रोह’ (rebellion) माना जा रहा है।
'योगी को प्रश्न करना विद्रोह है': अनुशासन की नई संहिता
बैठकों के गलियारों से जो सबसे तीखा और निर्णायक संदेश उभरा है, वह अनुशासन और नेतृत्व के प्रति समर्पण को लेकर है, जिसका केंद्र उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं। अंदरूनी तौर पर स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि "यदि आप योगी पर सवाल उठाते हैं, तो आपको विद्रोही माना जाएगा।" यह आदेश केवल एक नेता की रक्षा का मामला नहीं है, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक और संगठनात्मक रणनीति का हिस्सा है।
यह संदेश स्पष्ट करता है कि पार्टी और संघ परिवार अब किसी भी कीमत पर आंतरिक मतभेद को सार्वजनिक नहीं होने देना चाहते। योगी आदित्यनाथ न केवल उत्तर प्रदेश में BJP का चेहरा हैं, बल्कि हिंदुत्व की राजनीति के सबसे प्रमुख और करिश्माई स्तंभ भी हैं। उनका नेतृत्व, विशेष रूप से 2027 के मिशन और सपा के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की काट के लिए, अपरिहार्य माना जा रहा है। ऐसे में, उनके खिलाफ उठने वाली कोई भी आवाज़, चाहे वह कितनी भी जायज क्यों न हो, संगठन की एकजुटता और राजनीतिक प्रोजेक्ट को क्षति पहुँचाने वाली मानी जा रही है।
इस कठोर रुख के पीछे एक बड़ा कारण हालिया चुनावों में कुछ क्षेत्रों में मिली शिकस्त और आंतरिक गुटबाजी का उभरना है। संघ का मानना है कि असफलता के बाद आलोचना या सवाल उठाना स्वाभाविक है, लेकिन जब यह आलोचना शीर्ष नेतृत्व के प्रति अविश्वास का रूप ले लेती है, तो वह पूरे तंत्र को कमजोर कर देती है। इसलिए, 'विद्रोह' का यह टैग लगाकर, संघ ने एक स्पष्ट लक्ष्मण रेखा खींच दी है— नेतृत्व पर निजी सवाल नहीं, केवल संगठनात्मक सुधार की बात होगी। यह एक तरह से केंद्रीय नेतृत्व द्वारा योगी को पूर्ण कवच प्रदान करने और पार्टी कार्यकर्ताओं को संगठनात्मक अनुशासन की सख्त पट्टी पढ़ाने जैसा है।
'एकता बनाए रखें, असहमति की खबरें नियंत्रित करें'
संघ का दूसरा महत्वपूर्ण संदेश था,
"हिंदुओं, एकता बनाए रखें,
और असहमति की खबरों को नियंत्रित करें।" यह निर्देश दो मोर्चों पर काम करता है: राजनीतिक और मीडिया प्रबंधन।
सबसे पहले, 'हिंदुओं में एकता' का आह्वान एक रणनीतिक अनिवार्यता है। खासकर उत्तर प्रदेश में,
जहाँ अखिलेश यादव ने पीडीए समीकरण के जरिए BJP के पारंपरिक हिंदू वोट बैंक में जातिगत दरारें पैदा की हैं, संघ परिवार के लिए एकमात्र बचाव विभिन्न जातियों में बिखरे हिंदू वोटों को ‘विराट हिंदू सम्मेलन’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से एक छतरी के नीचे लाना है। समन्वय बैठकों में इस बात पर गहन मंथन हुआ कि कैसे ‘विराट हिंदू सम्मेलन’ के जरिए योगी की हिंदुत्ववादी छवि को और मजबूत किया जाए और 2027 विधानसभा चुनाव के लिए संगठनात्मक कसावट लाई जाए। यह स्पष्ट है कि संघ का शताब्दी वर्ष समारोह भी एकता के प्रदर्शन का एक बड़ा मंच बनेगा।
दूसरे, 'असहमति की खबरों को नियंत्रित करें' का निर्देश मीडिया प्रबंधन और सार्वजनिक छवि को दुरुस्त करने का सीधा प्रयास है। संघ के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार और संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष की मौजूदगी वाली बैठकों में यह नसीहत दी गई कि नेताओं को "आपसी बयानबाजी पर रोक लगानी चाहिए" और "मतभेद और मनभेद को आपस में सुलझाना चाहिए।" यह निर्देश मीडिया में आने वाली उन ख़बरों को रोकने के लिए है जो पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को उजागर करती हैं। संघ अच्छी तरह जानता है कि मीडिया में आंतरिक कलह की खबरें आने से कार्यकर्ता निराश होते हैं और विपक्षी दलों को आक्रमण का मौका मिलता है। इसलिए, संगठन की रणनीति अब केवल एकजुट होने की नहीं, बल्कि एकजुट दिखने की भी है।
अंदरूनी कहानी: समन्वय या नियंत्रण?
समन्वय बैठकों की अंदरूनी कहानी 'समन्वय' से कहीं अधिक 'नियंत्रण' और 'दिशा-निर्देश' की रही है। इन बैठकों में संगठन के भीतर संगठनात्मक बदलाव (जैसे प्रदेश अध्यक्ष का नाम तय करना) से लेकर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन तक पर फीडबैक लिया गया।
- फीडबैक और सुधार: बी.एल. संतोष ने संगठनात्मक कमजोरियों का फीडबैक लिया,
जिसके आधार पर प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर मुहर लगाने और संभावित कैबिनेट विस्तार की चर्चा हुई।
- रणनीतिक दिशा: संघ की तरफ से यह स्पष्ट किया गया कि विधायकों और सांसदों को 'एसआईआर', संदिग्ध घुसपैठियों की पहचान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर जनता के बीच जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है,
जिसमें वे 'बेरुखी' दिखा रहे थे। यह दिखाता है कि संघ अपने राजनीतिक एजेंडे को लागू करने के लिए सरकार और संगठन को सक्रिय रूप से प्रेरित कर रहा है।
- लक्ष्य: मिशन 2027: बैठकों का फोकस पूरी तरह से 2027
विधानसभा चुनावों पर था। सपा के पीडीए के काउंटर में विराट हिंदू सम्मेलन और दलित-पिछड़े परिवारों तक पहुँचने की रणनीति तैयार की गई। इस तरह,
बैठकों ने संगठन को केवल 'समन्वित' नहीं किया, बल्कि उसे एक नए मिशन-मोड में डाल दिया, जहाँ लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किसी भी आंतरिक प्रतिरोध को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
संघ-भाजपा समन्वय बैठकों की 'अंदरूनी कहानी' दर्शाती है कि संगठन ने अब अनुशासन और एकजुटता को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बना दिया है। 'योगी पर सवाल, विद्रोह का दर्जा' का संदेश स्पष्ट करता है कि पार्टी नेतृत्व अब राजनीतिक जोखिम को न्यूनतम करना चाहता है, जिसके तहत सबसे मजबूत और करिश्माई नेता को आंतरिक आलोचना से परे रखा गया है।
यह सख्ती, हालांकि, एक गहरे विरोधाभास को भी जन्म देती है। एक तरफ, संघ 'हिंदू समाज की एकता' का संदेश देता है, वहीं दूसरी तरफ, आंतरिक विमर्श और स्वस्थ आलोचना की संभावना को 'विद्रोह' कहकर दबाता है। लोकतंत्र और संगठन, दोनों के लिए, आंतरिक विमर्श का बंद होना स्वस्थ संकेत नहीं है। यह ज़ीरो-डिसेंट पॉलिसी 2027 के चुनाव तक संगठन को एकजुट रख सकती है, लेकिन दीर्घकालिक संगठनात्मक स्वास्थ्य के लिए, यह ज़रूरी है कि मतभेद और मनभेद को केवल पर्दे के पीछे नियंत्रित न किया जाए, बल्कि उन्हें संगठन के सिद्धांतों के भीतर संबोधित किया जाए। संघ और भाजपा का यह कदम, जहाँ एक ओर संगठनात्मक नियंत्रण की पराकाष्ठा है, वहीं दूसरी ओर, पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र और आलोचनात्मक सोच की एक बड़ी अग्निपरीक्षा भी है।
- Abhijit
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