14 नवंबर 2025 को आए बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राजनीति में सिर्फ लहर नहीं, बल्कि सटीक रणनीति और गठबंधन की अटूट एकजुटता ही अंतिम सत्य होती है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने 243 सीटों वाली विधानसभा में 202 सीटों का प्रचंड बहुमत हासिल कर लिया, जो एक अभूतपूर्व 'सुनामी' जैसा था। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेतृत्व वाला महागठबंधन (MGB) महज 35 सीटों पर सिमट कर रह गया, जो उसकी अब तक की सबसे शर्मनाक हार में से एक है। एनडीए को 46.52% वोट शेयर मिला, जबकि महागठबंधन 37.64% पर अटक गया।
इस विशाल जनादेश के पीछे क्या कारण रहे और विपक्ष ने ऐसी कौन-सी गलतियाँ कीं, जिसने उसे ऐतिहासिक पराजय की खाई में धकेल दिया?
खंड 1: एनडीए की प्रचंड जीत के तीन स्तंभ
एनडीए की सफलता का आधार केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्मा या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की छवि नहीं थी, बल्कि यह महीनों की रणनीति, सामाजिक इंजीनियरिंग और एकजुट अभियान का परिणाम था।
1. 'जंगल राज' बनाम 'सुशासन' का सफल नैरेटिव एनडीए ने अपने पूरे अभियान को 'सुशासन' (गुड गवर्नेंस) बनाम 'जंगल राज' की वापसी के इर्द-गिर्द केंद्रित रखा। प्रधानमंत्री मोदी और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने लालू-राबड़ी शासनकाल (1990-2005)
के दौरान कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति से जुड़ी गहरी आशंकाओं को प्रभावी ढंग से फिर से जीवंत किया। यह 'डराने की रणनीति' उन महत्वपूर्ण मतदाताओं, विशेषकर मध्यम वर्ग और सवर्णों, को लामबंद करने में सफल रही जो स्थिरता और सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं। यह नैरेटिव विकास के वादों के साथ जुड़कर एनडीए की विश्वसनीयता का आधार बना।
2. 'M-E फैक्टर' और महिला मतदाताओं का ऐतिहासिक समर्थन इस चुनाव में एनडीए के लिए सबसे निर्णायक कारक 'M-E' फैक्टर यानी महिला (Mahila) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) का गठजोड़ साबित हुआ।
- महिला शक्ति: इस बार महिला मतदाताओं ने पुरुषों की तुलना में अधिक मतदान किया, और यह वर्ग निर्णायक रूप से एनडीए के साथ खड़ा दिखा। नीतीश कुमार द्वारा लागू की गई कल्याणकारी योजनाएं,
जैसे 'जीविका दीदी' समूहों पर ध्यान केंद्रित करना, वृद्धों के लिए पेंशन में वृद्धि, और महिलाओं के लिए ₹10,000
की नई योजना,
ने महिला मतदाताओं को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने 'सुशासन बाबू' की छवि पर अपना भरोसा जताया।
- जातिगत संतुलन: नीतीश कुमार ने अपना मजबूत EBC
(अत्यंत पिछड़ा वर्ग) आधार बनाए रखा। वहीं,
भाजपा ने सवर्ण वोट बैंक को मजबूत किया। चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को गठबंधन में शामिल करने से दलितों और पासवान समुदाय के लगभग 6% पारंपरिक वोट बैंक का लाभ एनडीए को मिला।
3. अचूक चुनावी रणनीति और गठबंधन की परिपक्वता 2020 के चुनाव से सबक लेते हुए, इस बार एनडीए ने गठबंधन के भीतर शानदार समन्वय दिखाया।
- सीट बंटवारा: एनडीए ने बिना किसी बड़ी खींचतान के समय पर सीट बंटवारा (भाजपा और जदयू लगभग 101-101
सीटों पर) करके यह संदेश दिया कि वह चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार है।
- संगठन और बूथ प्रबंधन: भाजपा के नेतृत्व में एनडीए ने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखा। हर विधानसभा क्षेत्र में कई बैठकों का आयोजन किया गया,
जिसका सीधा असर बेहतर बूथ प्रबंधन और मतदान प्रतिशत बढ़ाने में दिखा।
खंड 2: महागठबंधन की करारी हार: कहाँ हुई चूक?
महागठबंधन की करारी हार के पीछे न तो एक, न ही दो, बल्कि कई मूलभूत संगठनात्मक और रणनीतिक कमजोरियां थीं जिन्होंने उनके अभियान को ध्वस्त कर दिया।
1. नेतृत्व का संकट और आंतरिक कलह हार का सबसे बड़ा कारण महागठबंधन के घटक दलों के बीच तालमेल और विश्वास का घोर अभाव रहा।
- मुख्यमंत्री उम्मीदवार पर असमंजस: कांग्रेस के भीतर एक धड़ा कथित तौर पर तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने का इच्छुक नहीं था,
जिससे नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता का संदेश गया। कई कांग्रेस नेताओं ने तेजस्वी पर 'जंगल राज' और भ्रष्टाचार के बोझ का हवाला देते हुए उन्हें सीएम चेहरा बनाने को गलती माना।
- सीट बंटवारे में देरी: सीटों के बंटवारे में अंतिम समय तक देरी होती रही। इतना ही नहीं, नामांकन की अंतिम तिथि तक कई सीटों पर सहयोगी दलों के बीच 'फ्रेंडली फाइट' की खबरें आती रहीं, जिससे कार्यकर्ताओं में अविश्वास पैदा हुआ और वोट ट्रांसफर बाधित हुआ।
2. बिखरी हुई रणनीति और विश्वसनीयता की कमी महागठबंधन एक 'कॉमन मिनिमम प्रोग्राम' (CMP) या एकीकृत चुनावी रणनीति पेश करने में विफल रहा।
- बिखरा हुआ संदेश: तेजस्वी यादव केवल 'सरकारी नौकरी' के अपने वादे पर ध्यान केंद्रित करते रहे, जबकि कांग्रेस अपनी अलग 'गारंटियों' पर चल रही थी। यह बिखराव एनडीए के एकजुट संदेश के सामने कमजोर पड़ गया।
- विश्वसनीयता का अभाव: तेजस्वी ने रोजगार के जो बड़े-बड़े वादे किए, जनता उन पर विश्वास नहीं कर पाई। मतदाताओं को यह भरोसा नहीं हुआ कि विपक्षी गठबंधन सरकार बनाने और काम करने पर केंद्रित है, जिससे उनके चुनावी वादे हवा-हवाई साबित हुए।
3. संगठन की कमजोरी और सीमांचल में झटका महागठबंधन ने बूथ स्तर पर भी एनडीए के मजबूत संगठन का मुकाबला नहीं कर पाया। कई सीटों पर शिकायतें मिलीं कि महागठबंधन के बूथ एजेंट ही गायब रहे,
जिससे वोटों की प्रभावी निगरानी नहीं हो सकी। इसके अलावा, पारंपरिक रूप से महागठबंधन का गढ़ माने जाने वाले सीमांचल क्षेत्र में भी उसे बड़ा झटका लगा। रुझानों से स्पष्ट हुआ कि मुस्लिम वोट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा एनडीए के खाते में चला गया, जिससे महागठबंधन की सामाजिक समीकरण की नींव कमजोर हुई।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का परिणाम स्पष्ट करता है कि यह चुनाव केवल विकास बनाम जाति की लड़ाई नहीं थी। यह स्थिरता बनाम अराजकता की आशंका, एकजुट रणनीति बनाम आंतरिक कलह,
और सुशासन के वादे बनाम विश्वसनीयता के संकट के बीच लड़ा गया था। एनडीए ने जहां सामाजिक समीकरणों को साधते हुए 'M-E' फैक्टर के दम पर महिला मतदाताओं का भरोसा जीता, वहीं महागठबंधन अपनी आंतरिक लड़ाई, बिखरे हुए नेतृत्व और 'जंगल राज' के साये से बाहर निकलने में विफल रहा। यह जनादेश केवल जीत नहीं है, बल्कि एक स्पष्ट संकेत है कि बिहार की जनता अब स्थिर और समावेशी शासन को प्राथमिकता देती है।
- Abhijit
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