गुजरात, जिसे महात्मा गांधी की जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है, पिछले कई दशकों से 'ड्राई स्टेट' यानी सूखा राज्य बना हुआ है। सिद्धांत रूप में यह एक आदर्शवादी संकल्पना है, लेकिन हकीकत यह है कि यह 'शराबबंदी' आज एक मज़ाक बनकर रह गई है। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि कैसे एक सख्त कानून भ्रष्ट तंत्र के लिए कमाई का जरिया बन जाता है, और जब विपक्ष इस विफलता पर सवाल उठाता है, तो सत्ता पक्ष केवल "बयानबाजी और चरित्र हनन" की राजनीति पर उतर आता है।
1. सख्त कानून, कमज़ोर इरादे: शराबबंदी एक दिखावा
गुजरात निषेध अधिनियम, 1949
(Gujarat Prohibition Act, 1949) राज्य में शराब के निर्माण, बिक्री और उपभोग पर कड़ा प्रतिबंध लगाता है, जिसके उल्लंघन पर 10 साल तक की सज़ा का प्रावधान है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि यह कानून केवल कागज़ों पर सख्त है।
गुजरात निषेध अधिनियम मुख्य रूप से 1949 में बॉम्बे निषेध अधिनियम के रूप में लागू किया गया था, जो शराब के निर्माण, बिक्री और खपत पर प्रतिबंध लगाता है। इस अधिनियम को 2011 में गुजरात मद्य निषेध अधिनियम नाम दिया गया, और 2017 में इसमें संशोधन किया गया, जिसके तहत उल्लंघन करने वालों के लिए 10 साल तक की जेल हो सकती है। इस अधिनियम के तहत, शराब की खरीद और सेवन के लिए परमिट अनिवार्य है और गैर-परमिट वाले व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता है।
राज्य की सीमाओं पर करोड़ों रुपये की अवैध शराब की खेप नियमित रूप से पकड़ी जाती है, जिसे पुलिस और प्रशासन बुलडोजर या रोड रोलर से नष्ट करने के बड़े-बड़े 'शो' आयोजित करते हैं। विडंबना यह है कि यह ज़ब्ती इस बात का सबूत नहीं है कि कानून सफल है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि अवैध कारोबार कितने बड़े पैमाने पर फला-फूला है। हर ज़ब्ती एक खुली स्वीकारोक्ति है कि राज्य में 'अंडरग्राउंड इकॉनमी' चल रही है, जिसकी धुरी पुलिस और तस्करों का गठजोड़ है।
2. पुलिस-बूटलेगर नेक्सस: कानून जिसने भ्रष्टाचार को जन्म दिया
पुलिस और बूटलेगर (शराब तस्करों) के बीच साँठगाँठ की बात अब कोई रहस्य नहीं रही है, बल्कि यह एक खुली सच्चाई है। यह 'नेक्सस' इतना मजबूत है कि यह पूरे राज्य में शराब की होम डिलीवरी सुनिश्चित करता है।
दिलचस्प बात यह है कि सरकार खुद इस गठजोड़ को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार कर चुकी है। जब पहले सख्त कानून के तहत छोटी मात्रा में शराब पकड़े जाने पर भी वाहन जब्ती और गिरफ्तारी की जाती थी, तो आरोप लगे थे कि पुलिस इसी सख्ती का इस्तेमाल आम लोगों और छोटे तस्करों से पैसे ऐंठने के लिए कर रही है। इसी के चलते सरकार को 20 लीटर से कम शराब के साथ पकड़े जाने पर गिरफ्तारी और वाहन जब्ती के नियमों में ढील देनी पड़ी थी। यह दिखाता है कि कानून की विफलता के मूल में नियत का नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का स्थान है।
3. ड्रग्स का बढ़ता जाल: जब बड़ा ख़तरा छोटे मुद्दे को निगल जाता है
शराबबंदी की विफलता के साथ-साथ, गुजरात आज ड्रग्स के बढ़ते जाल का सामना कर रहा है। एनसीआरबी (NCRB) के आँकड़े बताते हैं कि निषेध और एनडीपीएस (NDPS) अधिनियम के तहत दर्ज होने वाले मामलों की संख्या में गुजरात शीर्ष राज्यों में से एक है। तटीय राज्य होने के कारण, यह अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स तस्करी का एक बड़ा प्रवेश द्वार बन गया है।
हजारों करोड़ रुपये के मादक पदार्थ, चाहे वह मुंद्रा पोर्ट से हों या ज़मीन के रास्ते, लगातार पकड़े जा रहे हैं। जब विपक्ष इस गंभीर समस्या पर चर्चा की माँग करता है, तो सरकार की प्रतिक्रिया भ्रामक और बचाव वाली होती है।
4. राजनैतिक विमर्श की कला: 'बयानबाजी बनाम ज़मीनी कार्य'
गुजरात के उप-मुख्यमंत्री और गृह मंत्री, हर्ष संघवी अक्सर 'जीरो टॉलरेंस' (Zero Tolerance) की बात करते हैं और बड़े ड्रग्स ज़ब्ती को पुलिस की सक्रियता और सफलता के रूप में पेश करते हैं। उनका यह कहना कि "अगर आप कानून के दायरे में रहेंगे तो आपको फायदा होगा,"
उस समय खोखला लगता है जब:
- कानून लागू करने वाली मशीनरी (पुलिस) ही खुद अवैध कारोबारियों के साथ नेक्सस में शामिल होने के आरोपों से घिरी हो।
- ड्रग्स का कारोबार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहा हो,
और राज्य की एजेंसियाँ केवल तस्करों को पकड़ने के बजाय मूल नेटवर्क को तोड़ने में विफल रही हों।
जब विपक्ष इन गंभीर विसंगतियों, पुलिस-तस्करों के गठजोड़, और ड्रग्स के बढ़ते कारोबार पर सवाल उठाता है, तो भाजपा सरकार और उसके आईटी सेल की तरफ से तर्कपूर्ण जवाब के बजाय सीधे-सीधे विपक्ष के नेताओं के चरित्र पर हमला किया जाता है। यह एक खतरनाक राजनैतिक चलन है, जहाँ समस्या पर चर्चा करने के बजाय, समस्या उठाने वाले को ही राष्ट्र-विरोधी या विकास-विरोधी घोषित कर दिया जाता है।
यह ज़रूरी है कि गुजरात सरकार, बयानबाजी और 'आई टी सेल' की आलोचना की आड़ लेने के बजाय, यह स्वीकार करे कि शराबबंदी का प्रयोग विफल हो चुका है और अवैध कारोबार के खिलाफ ज़मीनी स्तर पर सख्त कार्रवाई करे, जहाँ राजनैतिक संरक्षण और पुलिस की मिलीभगत पर सीधी चोट हो। गुजरात के युवाओं का भविष्य सुरक्षित कानून और ईमानदार क्रियान्वयन पर निर्भर करता है, न कि केवल आकर्षक नारों और दोषारोपण की राजनीति पर।
- Abhijit
28/11/2025
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