
अहमदाबाद... एक ऐसा शहर जो लगातार 'स्मार्ट' बनने की होड़ में दौड़ रहा है। हर कोने में नई ऊँची इमारतें, मेट्रो की रेलगाड़ियाँ और चौड़ी होती सड़कें। तरक्की की यह तस्वीर बाहर से तो बहुत लुभावनी लगती है, लेकिन अगर आप इस शहर के रोज़मर्रा के यात्री हैं, तो आप जानते होंगे कि यह विकास की गाथा धूल, जाम और अंतहीन गड्ढों से भरी हुई है। अहमदाबाद में विकास का नारा अब जनता के लिए एक ऐसी सज़ा बन गया है, जहाँ हर सुबह एक नई चुनौती लेकर आती है।
तरक्की का तर्क बनाम सड़क की हकीकत
अहमदाबाद नगर
निगम (AMC) और अन्य विकास प्राधिकरणों के पास अपनी कार्रवाई का स्पष्ट
तर्क है: शहर को भविष्य के लिए तैयार करना। सरदार पटेल (SP) रिंग रोड को छह लेन में चौड़ा करने, 9 ‘आइकॉनिक’ सड़कें बनाने, और गड्ढों को ख़त्म करने के दावे के साथ 'व्हाइट टॉपिंग' सड़कों के निर्माण जैसी परियोजनाएँ इसी दृष्टिकोण का परिणाम हैं। दावा है कि
यह जर्मन तकनीक वाली सड़कें 10 साल तक गड्ढों और जलभराव से
मुक्ति दिलाएंगी।
लेकिन ज़मीनी
हकीकत कुछ और ही है। जहाँ विकास की योजनाएँ कागज़ पर चिकनी और सीधी दिखती हैं, वहीं उनका कार्यान्वयन सड़कों को एक अस्थिर, युद्धग्रस्त
मैदान में बदल देता है शहर का शायद ही कोई प्रमुख चौराहा या सड़क ऐसी बची हो, जहाँ इस समय खुदाई न चल रही हो।
तालमेल की कमी: एक ही सड़क को बार-बार खोदना
जनता की
परेशानी का सबसे बड़ा कारण यह नहीं है कि सड़कें बन रही हैं, बल्कि यह है कि एक ही सड़क को बार-बार, बिना किसी समन्वय के, खोदा जाता है। यह दुखद सच्चाई अहमदाबाद के प्रशासन की सबसे बड़ी विफलता को
दर्शाती है।
उदाहरण के लिए, नारणपुरा जैसे घनी आबादी वाले और पुराने इलाकों में, जहाँ ड्रेनेज या पानी की पुरानी लाइनों की समस्या आम है, वहाँ एक समस्या को ठीक करने के लिए सड़क खोदी जाती है, और कुछ ही महीनों में किसी और यूटिलिटी के लिए उसे फिर से तोड़ दिया जाता है।
इसी तरह, गुरुकुल जैसे क्षेत्रों में, जहाँ व्हाइट टॉपिंग का महँगा काम चल रहा है, सड़क पूरी होने
के तुरंत बाद उसे सीवर या गैस पाइपलाइन के लिए खोद दिया जाता है। ऐसा लगता है जैसे
नगर निगम के विभिन्न विभागों के बीच कोई संवाद ही नहीं है। एक विभाग सड़क बनाता है, और दूसरा विभाग उसे तुरंत तोड़कर अपनी लाइन बिछाता है। यह न केवल जनता के पैसे
की बर्बादी है, बल्कि नागरिकों के धैर्य की भी परीक्षा है।
स्वास्थ्य और समय की कीमत: न्यू गोता का हाल
सड़क की लगातार
खुदाई ने अहमदाबाद को धूल का चैंबर बना दिया है। वाहनों के लगातार आवागमन से उड़ने
वाली धूल श्वसन संबंधी बीमारियों को बढ़ा रही है। मास्क अब केवल कोविड से बचाव का
साधन नहीं रहा, बल्कि यह रोज़मर्रा के वायु प्रदूषण से लड़ने का एक
अनिवार्य उपकरण बन गया है।
न्यू गोता जैसे तेजी से विकसित हो रहे पश्चिमी क्षेत्र में यह समस्या सबसे विकट है। एक
ओर विकास की असीमित संभावनाएँ हैं, तो दूसरी ओर SP रिंग रोड और साणंद-खोराज लिंक जैसी परियोजनाओं के कारण चल रहे चौड़ीकरण के काम
ने पूरे इलाके को धूल और डायवर्जन के जाल में फंसा दिया है। 15 मिनट का सफर अब 45 मिनट में पूरा होता है। हर जगह ट्रैफिक जाम है। यह देरी न
केवल कामकाजी लोगों के उत्पादन पर असर डालती है, बल्कि छात्रों
और आपातकालीन सेवाओं के लिए भी गंभीर चुनौती पैदा करती है। विकास के नाम पर हर
नागरिक अपने जीवन के कीमती घंटे सड़कों पर लगे जाम में खो रहा है।
विकास का मानवीय पहलू
जब प्रशासन
अवैध अतिक्रमण हटाने या सड़कों को चौड़ा करने का अभियान चलाता है, तो उसका मानवीय पहलू अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। चारोड़ा जैसे क्षेत्रों
में, जब अचानक ढाँचे गिराए जाते हैं, तो लोगों को पानी और बिजली जैसी बुनियादी ज़रूरतों से वंचित कर दिया जाता है।
बच्चों की बोर्ड परीक्षाओं के दौरान बिजली कट जाना दिखाता है कि विकास की गति में
नागरिकों के जीवन और शिक्षा की प्राथमिकता कितनी नीचे चली गई है।
क्या यह विकास टिकाऊ है?
विकास आवश्यक
है, लेकिन अव्यवस्थित और दोहराव वाला विकास केवल विनाश कहलाता
है। अहमदाबाद को अपनी "स्मार्ट सिटी" की महत्वाकांक्षा को पूरा करने के
लिए अपनी कार्यप्रणाली को 'स्मार्ट' बनाना होगा।
ज़रूरत है इन कड़े कदमों की:
- विभागों में अनिवार्य
समन्वय: सड़क निर्माण से पहले सभी एजेंसियों (जल बोर्ड, गैस, बिजली, दूरसंचार) को अपनी सभी लाइनें बिछाने के लिए एक 'कॉमन कट' विंडो दी
जाए।
- भारी जुर्माना: अगर कोई एजेंसी या बिल्डर बिना अनुमति या खराब समन्वय
के नई बनी सड़क को खोदता है, तो उस पर सड़क निर्माण
की लागत से कई गुना अधिक जुर्माना लगाया जाए।
- सार्वजनिक जवाबदेही: परियोजनाओं की समय-सीमा और खुदाई के कारणों को
सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाए।
जब तक अहमदाबाद
का प्रशासन विकास के नाम पर सड़कों पर गड्ढे खोदना बंद नहीं करेगा और एक सुसंगत
योजना के साथ काम नहीं करेगा, तब तक यह शहर 'स्मार्ट' नहीं, बल्कि 'अशांत' ही बना रहेगा। नागरिकों का दर्द सड़क की धूल में दबने के
बजाय, व्यवस्था में बदलाव की माँग बनकर गूंजना चाहिए।
- Abhijit
30/11/2025

