Sunday, November 30, 2025

विकास का गड्ढा: अहमदाबाद में तरक्की के नाम पर बढ़ती जनता की परेशानी

अहमदाबाद... एक ऐसा शहर जो लगातार 'स्मार्ट' बनने की होड़ में दौड़ रहा है। हर कोने में नई ऊँची इमारतें, मेट्रो की रेलगाड़ियाँ और चौड़ी होती सड़कें। तरक्की की यह तस्वीर बाहर से तो बहुत लुभावनी लगती है, लेकिन अगर आप इस शहर के रोज़मर्रा के यात्री हैं, तो आप जानते होंगे कि यह विकास की गाथा धूल, जाम और अंतहीन गड्ढों से भरी हुई है। अहमदाबाद में विकास का नारा अब जनता के लिए एक ऐसी सज़ा बन गया है, जहाँ हर सुबह एक नई चुनौती लेकर आती है।

तरक्की का तर्क बनाम सड़क की हकीकत

अहमदाबाद नगर निगम (AMC) और अन्य विकास प्राधिकरणों के पास अपनी कार्रवाई का स्पष्ट तर्क है: शहर को भविष्य के लिए तैयार करना। सरदार पटेल (SP) रिंग रोड को छह लेन में चौड़ा करने, 9 ‘आइकॉनिक’ सड़कें बनाने, और गड्ढों को ख़त्म करने के दावे के साथ 'व्हाइट टॉपिंग' सड़कों के निर्माण जैसी परियोजनाएँ इसी दृष्टिकोण का परिणाम हैं। दावा है कि यह जर्मन तकनीक वाली सड़कें 10 साल तक गड्ढों और जलभराव से मुक्ति दिलाएंगी।

लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है। जहाँ विकास की योजनाएँ कागज़ पर चिकनी और सीधी दिखती हैं, वहीं उनका कार्यान्वयन सड़कों को एक अस्थिर, युद्धग्रस्त मैदान में बदल देता है शहर का शायद ही कोई प्रमुख चौराहा या सड़क ऐसी बची हो, जहाँ इस समय खुदाई न चल रही हो।

तालमेल की कमी: एक ही सड़क को बार-बार खोदना

जनता की परेशानी का सबसे बड़ा कारण यह नहीं है कि सड़कें बन रही हैं, बल्कि यह है कि एक ही सड़क को बार-बार, बिना किसी समन्वय के, खोदा जाता है। यह दुखद सच्चाई अहमदाबाद के प्रशासन की सबसे बड़ी विफलता को दर्शाती है।

उदाहरण के लिएनारणपुरा जैसे घनी आबादी वाले और पुराने इलाकों में, जहाँ ड्रेनेज या पानी की पुरानी लाइनों की समस्या आम है, वहाँ एक समस्या को ठीक करने के लिए सड़क खोदी जाती है, और कुछ ही महीनों में किसी और यूटिलिटी के लिए उसे फिर से तोड़ दिया जाता है। इसी तरहगुरुकुल जैसे क्षेत्रों में, जहाँ व्हाइट टॉपिंग का महँगा काम चल रहा है, सड़क पूरी होने के तुरंत बाद उसे सीवर या गैस पाइपलाइन के लिए खोद दिया जाता है। ऐसा लगता है जैसे नगर निगम के विभिन्न विभागों के बीच कोई संवाद ही नहीं है। एक विभाग सड़क बनाता है, और दूसरा विभाग उसे तुरंत तोड़कर अपनी लाइन बिछाता है। यह न केवल जनता के पैसे की बर्बादी है, बल्कि नागरिकों के धैर्य की भी परीक्षा है।

स्वास्थ्य और समय की कीमत: न्यू गोता का हाल

सड़क की लगातार खुदाई ने अहमदाबाद को धूल का चैंबर बना दिया है। वाहनों के लगातार आवागमन से उड़ने वाली धूल श्वसन संबंधी बीमारियों को बढ़ा रही है। मास्क अब केवल कोविड से बचाव का साधन नहीं रहा, बल्कि यह रोज़मर्रा के वायु प्रदूषण से लड़ने का एक अनिवार्य उपकरण बन गया है।

न्यू गोता जैसे तेजी से विकसित हो रहे पश्चिमी क्षेत्र में यह समस्या सबसे विकट है। एक ओर विकास की असीमित संभावनाएँ हैं, तो दूसरी ओर SP रिंग रोड और साणंद-खोराज लिंक जैसी परियोजनाओं के कारण चल रहे चौड़ीकरण के काम ने पूरे इलाके को धूल और डायवर्जन के जाल में फंसा दिया है। 15 मिनट का सफर अब 45 मिनट में पूरा होता है। हर जगह ट्रैफिक जाम है। यह देरी न केवल कामकाजी लोगों के उत्पादन पर असर डालती है, बल्कि छात्रों और आपातकालीन सेवाओं के लिए भी गंभीर चुनौती पैदा करती है। विकास के नाम पर हर नागरिक अपने जीवन के कीमती घंटे सड़कों पर लगे जाम में खो रहा है।

विकास का मानवीय पहलू

जब प्रशासन अवैध अतिक्रमण हटाने या सड़कों को चौड़ा करने का अभियान चलाता है, तो उसका मानवीय पहलू अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। चारोड़ा जैसे क्षेत्रों में, जब अचानक ढाँचे गिराए जाते हैं, तो लोगों को पानी और बिजली जैसी बुनियादी ज़रूरतों से वंचित कर दिया जाता है। बच्चों की बोर्ड परीक्षाओं के दौरान बिजली कट जाना दिखाता है कि विकास की गति में नागरिकों के जीवन और शिक्षा की प्राथमिकता कितनी नीचे चली गई है।

क्या यह विकास टिकाऊ है?

विकास आवश्यक है, लेकिन अव्यवस्थित और दोहराव वाला विकास केवल विनाश कहलाता है। अहमदाबाद को अपनी "स्मार्ट सिटी" की महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए अपनी कार्यप्रणाली को 'स्मार्ट' बनाना होगा।

ज़रूरत है इन कड़े कदमों की:

  1. विभागों में अनिवार्य समन्वय: सड़क निर्माण से पहले सभी एजेंसियों (जल बोर्ड, गैस, बिजली, दूरसंचार) को अपनी सभी लाइनें बिछाने के लिए एक 'कॉमन कट' विंडो दी जाए।
  2. भारी जुर्माना: अगर कोई एजेंसी या बिल्डर बिना अनुमति या खराब समन्वय के नई बनी सड़क को खोदता है, तो उस पर सड़क निर्माण की लागत से कई गुना अधिक जुर्माना लगाया जाए।
  3. सार्वजनिक जवाबदेही: परियोजनाओं की समय-सीमा और खुदाई के कारणों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाए।

जब तक अहमदाबाद का प्रशासन विकास के नाम पर सड़कों पर गड्ढे खोदना बंद नहीं करेगा और एक सुसंगत योजना के साथ काम नहीं करेगा, तब तक यह शहर 'स्मार्ट' नहीं, बल्कि 'अशांत' ही बना रहेगा। नागरिकों का दर्द सड़क की धूल में दबने के बजाय, व्यवस्था में बदलाव की माँग बनकर गूंजना चाहिए।

- Abhijit

30/11/2025

Saturday, November 29, 2025

जनप्रतिनिधि या शासक? सीएम की Vande Bharat यात्रा पर सामंती सोच का साया

गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने अपने मंत्रिमंडल और शीर्ष अधिकारियों के साथ वलसाड में आयोजित ‘चिंतन शिविर’ के लिए ‘वंदे भारत’ ट्रेन से यात्रा की। यह प्रतीकात्मक कदम देखने में अच्छा लगा—सत्ता के शीर्ष लोगों का सामान्य ट्रेन यात्रा चुनना, यह दर्शाता है कि प्रशासन आम नागरिक के करीब है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह यात्रा सिर्फ एक महंगा ‘दिखावा’ थी, या सचमुच ‘जन-केंद्रित’ शासन की शुरुआत?

अहमदाबाद रेलवे स्टेशन पर जो घटनाक्रम सामने आया, वह इस पूरी प्रतीकात्मकता पर एक स्याह धब्बा लगाता है।

लोकतंत्र में VIP कल्चर का नया संस्करण

खबरों के अनुसार, मुख्यमंत्री और उनके लाव-लश्कर के स्टेशन पहुंचने और ट्रेन में सवार होने के दौरान, अहमदाबाद रेलवे स्टेशन (जो पहले से ही नवीनीकरण के काम के कारण अस्त-व्यस्त है) पर सामान्य यात्रियों को रोक दिया गया। उन्हें प्लेटफार्म पर जाने से मना किया गया, जिससे आम जनता को भारी असुविधा और परेशानी का सामना करना पड़ा।

यह कृत्य घोर निंदनीय है, और सीधे तौर पर उस लोकतांत्रिक भावना का उल्लंघन है जिसके तहत हमारे नेता ‘जन-सेवक’ कहलाते हैं।

सबसे बड़ी विसंगति यह है कि सुबह मुंबई जाने वाली वंदे भारत ट्रेन का वलसाड में नियमित स्टॉपेज नहीं है। वंदे भारत एक प्रीमियम, समयबद्ध और हाई-स्पीड सेवा है, जिसकी पहचान ही उसकी गति और निश्चित समय-सारणी है। यदि किसी नियमित स्टॉपेज वाली ट्रेन को भी प्रोटोकॉल के चलते रोका या धीमा किया जाता है, तो यह सीधा-सीधा रेलवे के नियमों और हजारों यात्रियों के समय का उल्लंघन है। लेकिन यहाँ तो पूरी व्यवस्था को झुका दिया गया।

सिर्फ एक राजनीतिक कार्यक्रम (चिंतन शिविर, जिसका उद्देश्य ‘विकसित गुजरात’ का रोडमैप तैयार करना है) में शामिल होने के लिए एक ट्रेन के शेड्यूल में बड़ा बदलाव किया गया, उसे एक गैर-नियमित स्टॉप पर रोका गया। यह कार्रवाई उन सैकड़ों यात्रियों के लिए सरासर अन्याय है जिन्होंने इस प्रीमियम सेवा को उसकी गति और समय की पाबंदी के लिए चुना था। उनका समय, उनकी योजनाएँ, सब कुछ एक झटके में 'सरकारी सुविधा' के नाम पर दरकिनार कर दिया गया।

जब एक जन-प्रतिनिधि, जो स्वयं को आम आदमी के बीच दिखाने के लिए ‘वंदे भारत’ जैसी ट्रेन चुनता है, तो उसी समय उसके सुरक्षा प्रोटोकॉल के नाम पर सैकड़ों यात्रियों को उनके मूलभूत अधिकार—बिना रुकावट यात्रा करने के अधिकार—से वंचित कर दिया जाता है, तो यह स्पष्ट विरोधाभास है। यह प्रतीकात्मकता नहीं, बल्कि पाखंड है।

चिंतन शिविर या ‘सामंती सोच’ का प्रदर्शन?

सीएम जिस यात्रा को ‘सामूहिक चिंतन से सामूहिक विकास’ की थीम से जोड़कर वलसाड जा रहे थे, उस चिंतन शिविर की नींव ही अहमदाबाद स्टेशन पर आम जनता को परेशान करके रखी गई। क्या यह प्रशासन यह ‘चिंतन’ कर रहा था कि आम यात्री स्टेशन पर कितनी देर तक असुविधा झेल सकता है?

यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों की मानसिकता आज भी नहीं बदली है। भले ही वे सरकारी गाड़ी छोड़कर ट्रेन में बैठ जाएं, लेकिन उनकी ‘सामंती सोच’ – जहाँ उनका समय और सुविधा आम जनता से कहीं अधिक मूल्यवान है – उन्हें मजबूर करती है कि वे अपने लिए रास्ते साफ कराएं और प्लेटफार्म खाली कराएं। यह ‘जन-सेवक’ का नहीं, बल्कि ‘शासक’ का रवैया है।

आज जब देश डिजिटलाइज़ेशन और सुगम शासन की ओर बढ़ रहा है, तब भी हमारे प्रतिनिधियों को यह वीआईपी प्रोटोकॉल क्यों चाहिए? क्या उन्हें यह डर है कि एक आम यात्री उनसे कोई सवाल पूछ लेगा, या उनकी सुरक्षा इतनी कमज़ोर है कि स्टेशन पर मौजूद यात्रियों के बीच से निकल नहीं सकते?

नैतिक और कानूनी प्रश्न

यह घटना केवल असुविधा का मामला नहीं है, यह नैतिक और कानूनी दोनों तरह के प्रश्न खड़े करती है:

  1. नैतिकता: एक जन-प्रतिनिधि होने के नाते, आपकी प्राथमिकता आम जनता की सुविधा होनी चाहिए। आपका आगमन उनके लिए समस्या क्यों बना?
  2. कानून: सार्वजनिक परिवहन के उपयोग के दौरान वीआईपी प्रोटोकॉल के नाम पर ट्रेन को अनावश्यक रूप से रोकना या यात्रियों के आवागमन को बाधित करना, क्या यह अपने पद का दुरुपयोग नहीं है?

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल जी, ‘चिंतन शिविर’ में जाने से पहले आपको इस बात पर ‘आत्म-चिंतन’ करना चाहिए था कि आपका एक मिनट का राजनीतिक प्रदर्शन, स्टेशन पर खड़े हज़ारों यात्रियों के लिए कितनी परेशानी लेकर आया। जब आपकी यात्रा ही आम आदमी की कीमत पर शुरू हो, तो आपके ‘सामूहिक विकास’ के संकल्प पर भरोसा कैसे किया जा सकता है?

अब समय आ गया है कि ‘वीआईपी कल्चर’ के नाम पर आम नागरिक को मिलने वाली हर असुविधा पर कड़ा रुख अपनाया जाए। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को यह समझना होगा: वे मालिक नहीं, बल्कि वेतनभोगी सेवक हैं। और सेवक की सुविधा के लिए मालिक को इंतजार नहीं करना पड़ता। यह प्रथा बंद होनी चाहिए। तुरंत।

- Abhijit

29/11/2025

Friday, November 28, 2025

‘ड्राई स्टेट’ का सूखा ढोंग: गुजरात में शराब और ड्रग्स माफिया का राज और राजनीतिक आडंबर

गुजरात, जिसे महात्मा गांधी की जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है, पिछले कई दशकों से 'ड्राई स्टेट' यानी सूखा राज्य बना हुआ है। सिद्धांत रूप में यह एक आदर्शवादी संकल्पना है, लेकिन हकीकत यह है कि यह 'शराबबंदी' आज एक मज़ाक बनकर रह गई है। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि कैसे एक सख्त कानून भ्रष्ट तंत्र के लिए कमाई का जरिया बन जाता है, और जब विपक्ष इस विफलता पर सवाल उठाता है, तो सत्ता पक्ष केवल "बयानबाजी और चरित्र हनन" की राजनीति पर उतर आता है।

1. सख्त कानून, कमज़ोर इरादे: शराबबंदी एक दिखावा

गुजरात निषेध अधिनियम, 1949 (Gujarat Prohibition Act, 1949) राज्य में शराब के निर्माण, बिक्री और उपभोग पर कड़ा प्रतिबंध लगाता है, जिसके उल्लंघन पर 10 साल तक की सज़ा का प्रावधान है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि यह कानून केवल कागज़ों पर सख्त है।

गुजरात निषेध अधिनियम मुख्य रूप से 1949 में बॉम्बे निषेध अधिनियम के रूप में लागू किया गया था, जो शराब के निर्माण, बिक्री और खपत पर प्रतिबंध लगाता है। इस अधिनियम को 2011 में गुजरात मद्य निषेध अधिनियम नाम दिया गया, और 2017 में इसमें संशोधन किया गया, जिसके तहत उल्लंघन करने वालों के लिए 10 साल तक की जेल हो सकती है। इस अधिनियम के तहत, शराब की खरीद और सेवन के लिए परमिट अनिवार्य है और गैर-परमिट वाले व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता है।

राज्य की सीमाओं पर करोड़ों रुपये की अवैध शराब की खेप नियमित रूप से पकड़ी जाती है, जिसे पुलिस और प्रशासन बुलडोजर या रोड रोलर से नष्ट करने के बड़े-बड़े 'शो' आयोजित करते हैं। विडंबना यह है कि यह ज़ब्ती इस बात का सबूत नहीं है कि कानून सफल है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि अवैध कारोबार कितने बड़े पैमाने पर फला-फूला है। हर ज़ब्ती एक खुली स्वीकारोक्ति है कि राज्य में 'अंडरग्राउंड इकॉनमी' चल रही है, जिसकी धुरी पुलिस और तस्करों का गठजोड़ है।

2. पुलिस-बूटलेगर नेक्सस: कानून जिसने भ्रष्टाचार को जन्म दिया

पुलिस और बूटलेगर (शराब तस्करों) के बीच साँठगाँठ की बात अब कोई रहस्य नहीं रही है, बल्कि यह एक खुली सच्चाई है। यह 'नेक्सस' इतना मजबूत है कि यह पूरे राज्य में शराब की होम डिलीवरी सुनिश्चित करता है।

दिलचस्प बात यह है कि सरकार खुद इस गठजोड़ को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार कर चुकी है। जब पहले सख्त कानून के तहत छोटी मात्रा में शराब पकड़े जाने पर भी वाहन जब्ती और गिरफ्तारी की जाती थी, तो आरोप लगे थे कि पुलिस इसी सख्ती का इस्तेमाल आम लोगों और छोटे तस्करों से पैसे ऐंठने के लिए कर रही है। इसी के चलते सरकार को 20 लीटर से कम शराब के साथ पकड़े जाने पर गिरफ्तारी और वाहन जब्ती के नियमों में ढील देनी पड़ी थी। यह दिखाता है कि कानून की विफलता के मूल में नियत का नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का स्थान है।

3. ड्रग्स का बढ़ता जाल: जब बड़ा ख़तरा छोटे मुद्दे को निगल जाता है

शराबबंदी की विफलता के साथ-साथ, गुजरात आज ड्रग्स के बढ़ते जाल का सामना कर रहा है। एनसीआरबी (NCRB) के आँकड़े बताते हैं कि निषेध और एनडीपीएस (NDPS) अधिनियम के तहत दर्ज होने वाले मामलों की संख्या में गुजरात शीर्ष राज्यों में से एक है। तटीय राज्य होने के कारण, यह अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स तस्करी का एक बड़ा प्रवेश द्वार बन गया है।

हजारों करोड़ रुपये के मादक पदार्थ, चाहे वह मुंद्रा पोर्ट से हों या ज़मीन के रास्ते, लगातार पकड़े जा रहे हैं। जब विपक्ष इस गंभीर समस्या पर चर्चा की माँग करता है, तो सरकार की प्रतिक्रिया भ्रामक और बचाव वाली होती है।

4. राजनैतिक विमर्श की कला: 'बयानबाजी बनाम ज़मीनी कार्य'

गुजरात के उप-मुख्यमंत्री और गृह मंत्रीहर्ष संघवी अक्सर 'जीरो टॉलरेंस' (Zero Tolerance) की बात करते हैं और बड़े ड्रग्स ज़ब्ती को पुलिस की सक्रियता और सफलता के रूप में पेश करते हैं। उनका यह कहना कि "अगर आप कानून के दायरे में रहेंगे तो आपको फायदा होगा," उस समय खोखला लगता है जब:

  1. कानून लागू करने वाली मशीनरी (पुलिस) ही खुद अवैध कारोबारियों के साथ नेक्सस में शामिल होने के आरोपों से घिरी हो।
  2. ड्रग्स का कारोबार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहा हो, और राज्य की एजेंसियाँ केवल तस्करों को पकड़ने के बजाय मूल नेटवर्क को तोड़ने में विफल रही हों।

जब विपक्ष इन गंभीर विसंगतियों, पुलिस-तस्करों के गठजोड़, और ड्रग्स के बढ़ते कारोबार पर सवाल उठाता है, तो भाजपा सरकार और उसके आईटी सेल की तरफ से तर्कपूर्ण जवाब के बजाय सीधे-सीधे विपक्ष के नेताओं के चरित्र पर हमला किया जाता है। यह एक खतरनाक राजनैतिक चलन है, जहाँ समस्या पर चर्चा करने के बजाय, समस्या उठाने वाले को ही राष्ट्र-विरोधी या विकास-विरोधी घोषित कर दिया जाता है।

यह ज़रूरी है कि गुजरात सरकार, बयानबाजी और 'आई टी सेल' की आलोचना की आड़ लेने के बजाय, यह स्वीकार करे कि शराबबंदी का प्रयोग विफल हो चुका है और अवैध कारोबार के खिलाफ ज़मीनी स्तर पर सख्त कार्रवाई करे, जहाँ राजनैतिक संरक्षण और पुलिस की मिलीभगत पर सीधी चोट हो। गुजरात के युवाओं का भविष्य सुरक्षित कानून और ईमानदार क्रियान्वयन पर निर्भर करता है, कि केवल आकर्षक नारों और दोषारोपण की राजनीति पर।

- Abhijit

28/11/2025