Monday, January 12, 2026

'विकास' की चकाचौंध के नीचे दबता आम आदमी: वीवीआईपी दौरों और अधूरी प्लानिंग का शिकार अहमदाबाद

अहमदाबादवो शहर जिसे कभी 'मैनचेस्टर ऑफ ईस्ट' कहा जाता था, आज 'खोदने और बंद करने' का पर्याय बन चुका है। आज सोमवार को हमारे शहर के लिए एक 'बड़ा' दिन है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ गांधी आश्रम का दौरा करेंगे और उसके बाद साबरमती रिवरफ्रंट पर अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव का उद्घाटन करेंगे। सरकार और अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन इस आयोजन को वैश्विक स्तर पर गुजरात की अस्मिता के रूप में पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। लेकिन इस 'अस्मिता' और 'चकाचौंध' के पीछे छिपी है एक कड़वी हकीकतवो हकीकत जो आज अहमदाबाद के आम नागरिक की कमर तोड़ने वाली है।

जब वीवीआईपी सुरक्षा बन जाए जनता की सजा

प्रधानमंत्री का अपने गृह राज्य में आना हमेशा एक उत्सव की तरह पेश किया जाता है, लेकिन शहर के ट्रैफिक पुलिस द्वारा जारी किए गए हालिया नोटिफिकेशन ने मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा और आम नागरिकों की रातों की नींद उड़ा दी है। साबरमती रिवरफ्रंट (वेस्ट) रोड को सुरक्षा कारणों से सुबह से ही बंद कर दिया गया है। आश्रम रोड, जो पहले से ही जगह-जगह हो रही खुदाई और आधे-अधूरे पुलों के निर्माण के कारण 'ट्रैफिक ट्रैप' बना हुआ है, अब इस वीवीआईपी मूवमेंट का भार कैसे सहेगा?

सरकार और प्रशासन के लिए ये महज एक 'रूट डायवर्जन' है, लेकिन एक बीमार बुजुर्ग जिसे अस्पताल ले जाना है, एक कर्मचारी जिसे समय पर दफ्तर पहुंचना है, या एक छात्र जिसकी परीक्षा हैउनके लिए यह किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है।

पुल टूटे हैं, रास्ते बंद हैं, और जवाबदेही शून्य है

अहमदाबाद की वर्तमान स्थिति की आलोचना करना अब केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का विषय है। शहर के दो महत्वपूर्ण लाइफलाइनसुभाष ब्रिज और शाहीबाग अंडरब्रिजवर्तमान में पूरी तरह बंद हैं।

  1. सुभाष ब्रिज: जर्जर हालत और मेंटेनेंस के नाम पर बंद किया गया यह पुल उत्तरी और पश्चिमी अहमदाबाद को जोड़ता था। इसके बंद होने से आरटीओ और साबरमती इलाके का पूरा ट्रैफिक अब चिमनभाई पटेल ब्रिज या अन्य संकरी गलियों में फंसने को मजबूर है।
  2. शाहीबाग अंडरब्रिज: बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के काम के चलते यह रास्ता भी बंद कर दिया गया है।
  3. आश्रम रोड की दुर्दशा: पश्चिमी अहमदाबाद की मुख्य सड़क 'आश्रम रोड' पर वाडज सर्कल से लेकर पालडी तक स्थिति ऐसी है कि हर 500 मीटर पर आपको बैरिकेड्स और जेसीबी मशीनें मिलेंगी। वाडज फ्लाईओवर का काम कछुआ गति से चल रहा है, वहीं इनकम टैक्स फ्लाईओवर पर भी आए दिन मेंटेनेंस के पैचवर्क चलते रहते हैं।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब शहर के मुख्य मार्ग और पुल पहले से ही बंद हैं, तो प्रशासन ने इस मेगा-इवेंट की योजना बनाते समय आम जनता के वैकल्पिक रास्तों के बारे में क्यों नहीं सोचा? क्या विकास का मतलब केवल रिवरफ्रंट पर रंगीन पतंगें उड़ाना है, जबकि शहर की आंतरिक सड़कें धूल और जाम से कराह रही हैं?

म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन: मिसमैनेजमेंट का मास्टर

अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन का नियोजन देख कर लगता है कि विभाग के बीच कोई तालमेल ही नहीं है। एक विभाग सड़क बनाता है, दूसरा उसे पाइपलाइन डालने के लिए खोद देता है। अब तो बुलेट ट्रेन, मेट्रो और फ्लाईओवर के काम एक साथ शुरू कर दिए गए हैं। विकास जरूरी है, लेकिन क्या विकास की यह गति जनता का गला घोंटकर होनी चाहिए?

आज जब प्रधानमंत्री और जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ गांधी आश्रम में शांति और सादगी का संदेश दे रहे होंगे, ठीक उसी समय आश्रम के बाहर की सड़कों पर हजारों एंबुलेंस और गाड़ियां जाम में फंसी होंगी। क्या यह विडंबना नहीं है कि साबरमती आश्रम, जो कभी गांधी जी की सादगी का प्रतीक था, आज उसी के नाम पर होने वाले वीवीआईपी दौरों के कारण आम आदमी के लिए सबसे बड़ा अवरोध बन गया है?

जनता की आवाज़: विकास या विनाश?

राज्य सरकार और नगर निगम को यह समझने की जरूरत है कि अहमदाबाद केवल साबरमती रिवरफ्रंट नहीं है। रिवरफ्रंट की चमक के पीछे अंधेरी गलियां हैं, टूटे हुए फुटपाथ हैं और ऐसे पुल हैं जो बनने से पहले ही दरकने लगते हैं (हाटकेश्वर ब्रिज का उदाहरण हम भूले नहीं हैं)

प्रधानमंत्री का दौरा निश्चित रूप से अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या इसे थोड़ा और बेहतर नियोजित नहीं किया जा सकता था? क्या मेट्रो का उपयोग केवल फोटो खिंचवाने के लिए होना चाहिए, या वास्तव में ऐसे बड़े दौरों के दौरान वीवीआईपी काफिले को मेट्रो के जरिए ले जाकर सड़कों को जनता के लिए खुला नहीं रखा जा सकता?

मैं प्रशासन से बस इतना पूछना चाहता हूँ: किसकी कीमत पर यह उत्सव?

जब सरकार अंतरराष्ट्रीय मेहमानों को शहर की धरोहर दिखा रही होगी, तब प्रशासन यह सुनिश्चित करे कि शहर का आम नागरिक भी सम्मान के साथ अपने गंतव्य तक पहुंच सके। विकास तभी सार्थक है जब वह समावेशी हो, कि वह जो वीवीआईपी के आने पर आम आदमी को उसके घर में कैद कर दे या उसे घंटों धुएं और जाम में खड़ा रखे।

अहमदाबाद के नागरिकों का धैर्य अब जवाब दे रहा है। विज्ञापन और इवेंट मैनेजमेंट से परे हटकर, अगर प्रशासन बुनियादी ढांचे और ट्रैफिक प्रबंधन पर ध्यान नहीं देता, तो यह 'स्मार्ट सिटी' केवल कागजों पर ही सिमट कर रह जाएगी। आज का दिन अहमदाबाद के लिए केवल एक विदेशी दौरे का दिन नहीं है, बल्कि यह प्रशासन की विफलता का एक और प्रमाण होगा जो अपनी जनता की असुविधा की कीमत पर उत्सव मनाने का शौकीन है।

- Abhijit

12/01/2026

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