गुजरात की धरती संतों और लोक-साहित्य की धरती रही है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से इस पवित्र धरा पर जो हो रहा है, वह न केवल सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है, बल्कि राज्य की न्याय व्यवस्था और सरकार की मंशा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। प्रसिद्ध लोक कलाकार मायाभाई आहीर और उनके पुत्र जयराज आहीर से जुड़ा हालिया विवाद अब केवल एक व्यक्तिगत संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह सत्ता, अहंकार और एक पूरे समुदाय के अपमान की कहानी बन चुका है।
विवाद की जड़ और सत्ता का अहंकार
मामला बगदाणा धाम के अपमान और उसके बाद कोली समाज के एक सेवक, नवनीतभाई बलधिया पर हुए जानलेवा हमले से जुड़ा है। आरोप है कि मायाभाई आहीर के पुत्र जयराज आहीर ने अपने गुंडों के साथ मिलकर उस व्यक्ति को निशाना बनाया जिसने केवल सच बोलने का साहस किया था। लेकिन यहाँ सवाल माया भाई के 'कलाकार' होने का नहीं है, सवाल उस 'सत्ता' का है जो पर्दे के पीछे से इस अहंकार को खाद-पानी दे रही है।
एक कलाकार का काम समाज को जोड़ना होता है, लेकिन जब कलाकार का परिवार ही लाठी-डंडों के जोर पर समाज के एक बड़े हिस्से (कोली समुदाय) को डराने-धमकाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है।
सरकार की भूमिका: मौन या मूक सहमति?
इस पूरे प्रकरण में गुजरात सरकार की भूमिका सबसे अधिक संदिग्ध और निंदनीय रही है।
- पुलिस की सुस्ती: जब कोली समाज के युवक पर हमला हुआ, तब पुलिस की कार्रवाई की कछुआ गति ने यह साफ कर दिया कि अपराधियों को 'ऊपर' से संरक्षण प्राप्त है। क्या राज्य में न्याय केवल रसूखदारों के लिए है?
- वोट बैंक की राजनीति: कोली समुदाय गुजरात का एक सशक्त और मेहनतकश समुदाय है। उनके साथ हुए इस अन्याय पर सरकार का 'वेट एंड वॉच' (Wait and Watch) वाला रवैया शर्मनाक है। क्या सरकार को डर है कि एक रसूखदार कलाकार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने से उनका कोई खास वर्ग नाराज हो जाएगा?
- गृह विभाग की विफलता: राज्य के गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी 'जीरो टॉलरेंस' की बातें तो बहुत करते हैं, लेकिन जब सत्ता के करीबियों पर आंच आती है, तो यह 'जीरो टॉलरेंस' कहाँ गायब हो जाता है? बगदाणा जैसी पवित्र जगह के सेवक को सरेआम पीटा जाता है और सरकार केवल आश्वासन का झुनझुना थमा रही है।
कोली समाज का आक्रोश और सवाल
हीरा भाई सोलंकी जैसे नेताओं का सड़कों पर उतरना यह बताता है कि समाज के भीतर कितना गहरा घाव लगा है। यह लड़ाई अब मायाभाई आहीर बनाम कोली समाज नहीं है; यह लड़ाई 'अहंकारी रसूख' बनाम 'आम आदमी के सम्मान' की है।
सरकार से सीधा सवाल है:
- क्या मायाभाई
आहीर के रसूख के आगे गुजरात की पुलिस बौनी हो गई है?
- जयराज आहीर को अब तक वह 'सबक' क्यों नहीं मिला जो एक आम अपराधी को मिलता है?
- क्या मुख्यमंत्री कार्यालय केवल उत्सवों के लिए है,
या पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए भी?
सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन जब सरकारें किसी एक वर्ग या व्यक्ति को बचाने के लिए पूरे समुदाय की भावनाओं को कुचलने लगती हैं, तो वह पतन की शुरुआत होती है। कोली समाज आज न्याय मांग रहा है, और अगर राज्य सरकार ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी और दोषियों को सलाखों के पीछे नहीं भेजा, तो यह आग केवल एक जिले तक सीमित नहीं रहेगी।
मायाभाई
आहीर अपनी कला के लिए जाने जाते हैं,
लेकिन उनके पुत्र के कृत्य ने उस कला पर कालिख पोत दी है। और इस कालिख को धोने की जिम्मेदारी सरकार की थी, लेकिन अफ़सोस, सरकार खुद उस कालिख को छिपाने में व्यस्त दिख रही है।
न्याय में देरी, न्याय की हत्या है। गुजरात देख रहा है!
- Abhijit
No comments:
Post a Comment