Saturday, February 28, 2026

दलालों की गिरफ्त में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ

पिछले कुछ वर्षों में देश के मीडिया परिदृश्य पर यदि आप नजर डालें, तो एक बहुत ही भयानक और डरावना मंजर दिखाई देता है। देश के कोने-कोने में कुकुरमुत्तों या बाजरे की फसल की तरह क्षेत्रीय और राष्ट्रीय समाचार चैनल उग आए हैं। पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि सूचना का लोकतंत्रीकरण हो रहा है, लेकिन गहराई से देखने पर पता चलता है कि यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से 'दलाली' का नया व्यापारिक मॉडल है। इन चैनलों के पीछे वे चेहरे नहीं हैं जिन्होंने पत्रकारिता की जमीन पर पसीना बहाया है, बल्कि वे लोग हैं जो कल तक बिल्डर, सट्टेबाज या दलाल हुआ करते थे। आज न्यूज़ इंडिया 24X7 जैसे चैनलों के माध्यम से जो खेल खेला जा रहा है, उसने पत्रकारिता की शुचिता को गहरे जख्म दिए हैं।

न्यूज़ इंडिया 24X7: पत्रकारिता के नाम पर धोखाधड़ी

हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत के साथ जो कुछ भी न्यूज़ इंडिया 24X7 में हुआ, वह केवल खेदजनक है बल्कि इस उद्योग की सड़ांध को सार्वजनिक करने वाला है। राणा यशवंत, जिन्हें हिंदी टीवी पत्रकारिता में एक गंभीर और संवेदनशील पत्रकार माना जाता है, जब इस चैनल से जुड़े तो उम्मीद थी कि शायद यह संस्थान कुछ नया करेगा। लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट निकली।

चैनल के चेयरमैन शालू पंडित ने नए कर्मचारियों की नियुक्ति तो कर ली, लेकिन जब वेतन देने की बारी आई, तो उनके भीतर का 'बिल्डर' और 'दलाल' जाग उठा। उन्होंने यह सफेद झूठ फैलाना शुरू कर दिया कि नवनियुक्त कर्मचारियों ने आवश्यक दस्तावेज जमा नहीं किए हैं, इसलिए संस्था उन्हें वेतन देने के लिए बाध्य नहीं है। यह केवल एक प्रशासनिक बहाना नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी ताकि कर्मचारियों के हक का पैसा मारा जा सके। मालिक का यह कहना कि "राणा यशवंत खुद इन कर्मचारियों का वेतन देंगे क्योंकि संस्था ने इन्हें नियुक्त नहीं किया है," उनकी संकीर्ण मानसिकता और नैतिकता के पतन का चरम है।

शुक्रवार सुबह जब राणा यशवंत ने फेसबुक लाइव के जरिए अपनी पीड़ा और संस्थान की वास्तविकता साझा की, तो पूरे पत्रकार जगत में एक सन्नाटा पसर गया। एक वरिष्ठ संपादक को इस तरह अपमानित करना और कर्मचारियों के पेट पर लात मारना यह साबित करता है कि आज के दौर में मीडिया संस्थान 'स्लैव हाउस' (गुलामों के घर) बनते जा रहे हैं।

राणा यशवंत जी ने अपने फेसबुक लाइव में जो दर्द बयां किया, वह केवल उनका नहीं, बल्कि उन हजारों पत्रकारों का है जो इन 'गुलामखानों' में घुट-घुट कर काम कर रहे हैं। चेयरमैन शालू पंडित का न्यूज-रूम में व्यवहार अमर्यादित और अमानवीय था। पत्रकारों को एक झटके में निकाल देना केवल तानाशाही है, बल्कि श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ाना भी है।

सत्ता और बिचौलियों का अनैतिक गठबंधन

प्रश्न यह उठता है कि इन तथाकथित न्यूज़ चैनलों को पैसा कहाँ से मिलता है? इनका मुख्य स्रोत कोई पत्रकारिता की साख नहीं, बल्कि सरकारों के साथ किया गया अनैतिक गठबंधन है। ये चैनल जनता की समस्याओं को उठाने के लिए नहीं, बल्कि सरकार की दलाली करने और उनके भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए खोले जाते हैं। बदले में, राज्य सरकारें विज्ञापनों के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई का टैक्स रूपी पैसा इन दलाल मालिकों की तिजोरियों में भरती हैं।

गुजरात से लेकर देश के अन्य राज्यों तक, ऐसे दर्जनों चैनल चल रहे हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य 'सरकारी इवेंट मैनेजमेंट' है। ये बिल्डर और ब्रोकर मालिक पत्रकारिता की 'एबीसीडी' भी नहीं जानते, लेकिन वे जानते हैं कि किस मंत्री के पास जाकर कैसे 'डील' करनी है। यह सीधे तौर पर जनता के पैसे की लूट है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की रहस्यमयी चुप्पी

हैरानी की बात यह है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और केंद्र राज्यों की भाजपा सरकारें इन चैनलों के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं करतीं? जब किसी चैनल के पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने की क्षमता नहीं है, या जब वह खुलेआम श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ा रहा है, तो उसका लाइसेंस तुरंत रद्द क्यों नहीं किया जाता?

सच तो यह है कि यह 'मौन' सहमति का प्रतीक है। भाजपा सरकार को ऐसे चैनलों की जरूरत है जो उनके लिए 'ढाल' बन सकें और जनता के बीच भ्रम फैला सकें। यही कारण है कि न्यूज़ इंडिया 24X7 जैसे संस्थानों के मालिकों के हौसले बुलंद हैं। उन्हें पता है कि जब तक वे सत्ता की चाटुकारिता कर रहे हैं, उनका बाल भी बांका नहीं होगा।

पत्रकार अब पत्रकार नहीं, बंधुआ मजदूर हैं

आज गुजरात जैसे राज्यों में भी पत्रकारों की स्थिति दयनीय है। मालिकों का व्यवहार उनके साथ वैसा ही है जैसा किसी गुलाम के साथ होता है। बिना किसी सुरक्षा, बिना किसी बीमा और बिना किसी तय कार्य-समय के, ये पत्रकार दिन-रात दौड़ते हैं, लेकिन महीने के अंत में उन्हें दस्तावेज की कमी का बहाना बनाकर वेतन से वंचित कर दिया जाता है।

राणा यशवंत का मामला तो सिर्फ एक बानगी है क्योंकि उन्होंने आवाज उठाने की हिम्मत की। लेकिन उन हजारों गुमनाम पत्रकारों का क्या, जो हर दिन ऐसे चैनलों में अपमान का घूंट पीते हैं? यह पत्रकारिता का 'डार्क एज' है, जहाँ कलम की ताकत को बिल्डरों की 'ब्लैक मनी' से कुचला जा रहा है।

अब जागने का समय है

न्यूज़ इंडिया 24X7 के मालिक और उनके जैसे तमाम अन्य दलालों को यह समझ लेना चाहिए कि पत्रकारिता कोई रियल एस्टेट का धंधा नहीं है। यह लोगों के विश्वास की पूंजी है। और सरकारों को भी यह याद रखना चाहिए कि टैक्स का पैसा जनता की भलाई के लिए है, कि अपने चहेते दलालों की टीवी स्क्रीन चमकाने के लिए।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को तत्काल इस मामले का संज्ञान लेना चाहिए और ऐसे चैनलों के लाइसेंस रद्द करने चाहिए जो कर्मचारियों का शोषण करते हैं। यदि आज हम राणा यशवंत के पक्ष में और इन भ्रष्ट संस्थानों के खिलाफ नहीं बोले, तो कल हमारे पास 'खबर' देने वाला कोई नहीं बचेगा, सिर्फ 'प्रचार' करने वाले दलाल ही रह जाएंगे।

लोकतंत्र तभी बचेगा जब मीडिया आजाद होगा, और मीडिया तभी आजाद होगा जब वह दलालों के चंगुल से मुक्त होगा।

- Abhijit

28/02/2026

1 comment: