भारतीय लोकतंत्र के जिस 'मंदिर' में तर्कों की गूंज और जनता के सवालों का जवाब मिलना चाहिए था, वहाँ एक अजीबोगरीब खौफ का साया है। लोकसभा में जो हुआ, वह केवल संसदीय कार्यवाही का स्थगन नहीं था, बल्कि उस 'छप्पन इंच' के सीने वाले दावों की पोल खुलने जैसा था, जो दुनिया भर में अपनी बहादुरी के डंके पीटते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर जवाब देना था। पूरा देश इंतज़ार कर रहा था कि विपक्ष द्वारा उठाए गए ज्वलंत मुद्दों - चाहे वह सीमा पर चीन की हिमाकत हो या देश के भीतर बढ़ती तानाशाही - पर प्रधानमंत्री क्या कहेंगे। लेकिन जवाब देने के बजाय, हमने देखा एक डरपोक बचाव।
स्पीकर का 'सुरक्षा' वाला ढाल और हास्यास्पद तर्क
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आज जो तर्क दिया, वह गले नहीं उतरता। उन्होंने कहा कि उन्हें 'विश्वसनीय जानकारी' मिली थी कि कांग्रेस सांसद प्रधानमंत्री की सीट तक पहुँचकर किसी 'अप्रिय घटना' को अंजाम दे सकते थे। यह सुनकर हंसी आती है और दुख भी होता है। जिस संसद की सुरक्षा में हज़ारों सुरक्षाकर्मी तैनात हों, जहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता, वहाँ देश के सबसे सुरक्षित व्यक्ति को अपने ही सांसदों से 'जान का खतरा' बताया जा रहा है?
सच से भागते प्रधानमंत्री
विपक्ष की महिला सांसदों का विरोध और नारेबाजी क्या इतनी डरावनी हो गई कि प्रधानमंत्री ने सदन में कदम रखना भी मुनासिब नहीं समझा? इतिहास गवाह है कि इसी सदन में इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने भयंकर विरोध के बीच अपनी बात रखी थी। लेकिन आज के 'स्वघोषित विश्वगुरु' के पास विपक्ष के तीखे सवालों का सामना करने का साहस नहीं बचा है।
प्रियंका गांधी का यह कहना कि "प्रधानमंत्री डर गए और बुलेट ट्रेन की तरह भाग निकले", आज आम जनता की आवाज़ लग रही है। जब मणिपुर जलता है, तो प्रधानमंत्री चुप रहते हैं। जब लद्दाख की ज़मीन पर सवाल उठता है, तो वह गायब हो जाते हैं। और अब, जब संसद में जवाबदेही की बारी आई, तो 'स्पीकर की सलाह' का सहारा लेकर मैदान छोड़ दिया।
संसदीय मर्यादा की बलि
बिना प्रधानमंत्री के जवाब के 'धन्यवाद प्रस्ताव' को पारित कर देना संसदीय गरिमा पर एक काला धब्बा है। यह पहली बार नहीं है जब इस सरकार ने बहुमत के अहंकार में नियमों को कुचला है, लेकिन खुद को असुरक्षित बताकर सदन से नदारद रहना कायरता की पराकाष्ठा है।
देश देख रहा है कि कैसे एक मजबूत सरकार होने का ढोंग करने वाले लोग अंदर से कितने खोखले हो चुके हैं। यदि प्रधानमंत्री अपने ही लोकतंत्र के प्रतिनिधियों का सामना नहीं कर सकते, तो वह दुनिया के मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व कैसे करेंगे? यह 'सुरक्षा का संकट' नहीं, बल्कि 'नैतिकता का संकट' है। मोदी जी, लोकतंत्र में संवाद से भागा नहीं जाता, उसका सामना किया जाता है। पर शायद, अब आपके पास झूठ को ढंकने के लिए शब्दों का अकाल पड़ गया है।
- Abhijit
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