भारत के लोकतंत्र के उत्सव में 'वोट' सबसे पवित्र आहुति मानी जाती है, लेकिन जब यह उत्सव ही किसी एक दल की जागीर बन जाए और चुनाव आयोग एक निष्पक्ष निर्णायक के बजाय मूकदर्शक बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि नींव में दीमक लग चुकी है। गुजरात से आई ताजा खबर ने इस आशंका को और गहरा कर दिया है। राज्य अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी गई है, जिसमें कुल 4.40 करोड़ मतदाताओं के नाम दर्ज हैं। पहली नजर में यह आंकड़ा सामान्य लग सकता है, लेकिन इसकी गहराई में उतरते ही 'संवैधानिक धांधली' की एक डरावनी तस्वीर उभरती है।
आंकड़ों की बाजीगरी और गायब होते नाम
गुजरात में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) के नाम पर जो कवायद चली, उसका नतीजा यह है कि 3.95 लाख नाम मतदाता सूची से 'गायब' कर दिए गए हैं। यह कोई मामूली सुधार नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित रणनीतिक हमला है। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा सूरत से आता है, जहां अकेले 85,734 नाम रद्द कर दिए गए हैं। यह महज इत्तेफाक नहीं हो सकता कि जिस शहर में विपक्ष और जन-आंदोलनों की आवाजें समय-समय पर बुलंद होती रही हैं, वहीं सबसे अधिक 'काट-छांट' की गई है।
क्या यह वही 'गुजरात मॉडल' है जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पूरे देश में लागू करना चाहते हैं? एक ऐसा मॉडल जहां मतदाता को बूथ तक पहुंचने से पहले ही सिस्टम की फाइल में 'मृत' या 'प्रवासी' घोषित कर दिया जाए?
चुनाव आयोग: निष्पक्षता का मुखौटा या सरकार का औजार?
इस पूरी प्रक्रिया में भारत निर्वाचन आयोग की भूमिका सबसे अधिक संदिग्ध रही है। जिस आयोग का काम हर एक पात्र नागरिक को मतदान का अधिकार सुनिश्चित करना था, वह आज केवल 'नाम काटने' वाली मशीन बनकर रह गया है।
गुजरात में 73 लाख से अधिक नामों को ड्राफ्ट लिस्ट में हटाया गया था। विपक्ष ने आरोप लगाया कि ये नाम खास तौर पर उन क्षेत्रों से हटाए गए जो भाजपा के गढ़ नहीं हैं। फॉर्म-7, जो किसी का नाम हटाने के लिए भरा जाता है, उसका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हुआ। खबरें आईं कि भाजपा के बूथ लेवल एजेंटों ने थोक के भाव में फॉर्म भरकर लोगों के नाम कटवाए। क्या चुनाव आयोग ने इसकी गहन जांच की? क्या उन फर्जी हस्ताक्षरों की फॉरेंसिक जांच हुई? जवाब है—नहीं।
जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ जाए, तो जनता किससे गुहार लगाए? प्रधानमंत्री मोदी अक्सर 'मदर ऑफ डेमोक्रेसी' की बात करते हैं, लेकिन उनकी नाक के नीचे उनके अपने गृह राज्य में लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है। चुनाव आयोग की चुप्पी यह साबित करती है कि वह स्वायत्त संस्थान होने के बजाय केंद्र और राज्य सरकार के राजनीतिक विस्तार के रूप में काम कर रहा है।
भाजपा की चुनावी इंजीनियरिंग: 'वोट' नहीं तो 'वोटर' ही बदल दो
भाजपा की चुनावी मशीनरी को पता है कि जमीनी स्तर पर सत्ता विरोधी लहर और आर्थिक मोर्चे पर विफलता को केवल भाषणों से नहीं ढका जा सकता। इसलिए, उन्होंने एक नया तरीका निकाला है—'वोटर इंजीनियरिंग'। अगर आप जनता का दिल नहीं जीत सकते, तो उस जनता का नाम ही सूची से हटा दें जो आपको वोट नहीं देने वाली।

सूरत में 85 हजार से ज्यादा नामों का रद्द होना इसी 'माइक्रो-मैनेजमेंट' का हिस्सा है। शहरी क्षेत्रों में रहने वाले मजदूर, अल्पसंख्यक और गरीब तबका, जो अक्सर भाजपा की नीतियों का शिकार होता है, उसे 'प्रवासी' बताकर सूची से बाहर कर दिया गया। गुजरात सरकार और भाजपा का यह गठजोड़ संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ है। यह सीधे तौर पर उन नागरिकों के अधिकारों का हनन है जो इस व्यवस्था में अपनी आवाज उठाना चाहते हैं।
गुजरात सरकार की विफल जवाबदेही
गुजरात सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया को 'पारदर्शी' और 'तकनीकी' सुधार बताया है। लेकिन पारदर्शिता की असली परीक्षा तब होती है जब डेटा सार्वजनिक हो। आखिर क्यों इतने बड़े पैमाने पर केवल खास वर्गों के नाम कटे? क्यों प्रशासन ने उन लोगों को व्यक्तिगत नोटिस देने की जहमत नहीं उठाई जिनके नाम काटे जा रहे थे?
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व वाली सरकार केवल दिल्ली से मिलने वाले आदेशों का पालन कर रही है। राज्य प्रशासन ने जिला निर्वाचन अधिकारियों के माध्यम से वही किया जो सत्ताधारी दल की इच्छा थी। एक ऐसे राज्य में जहां विकास के दावों की पोल बेरोजगारी और महंगाई ने खोल दी है, वहां चुनाव जीतने का आखिरी रास्ता 'वोटर सप्रेशन' (Voter Suppression) ही बचा है।
प्रधानमंत्री मोदी की 'चुप्पी' और लोकतंत्र का क्षरण
नरेंद्र मोदी दुनिया भर में घूम-घूम कर भारतीय लोकतंत्र का डंका बजाते हैं। लेकिन क्या वह यह बताएंगे कि उनके 'साहब' और 'अमित शाह' के मार्गदर्शन में चल रहे गुजरात में मतदाता सूची के साथ यह खिलवाड़ क्यों हो रहा है?
यह केवल एक राज्य का मामला नहीं है। उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक, हर जगह 'SIR' और 'डिजिटलीकरण' के नाम पर विपक्ष समर्थित मतदाताओं को निशाना बनाने की खबरें आ रही हैं। गुजरात इस खतरनाक प्रयोग की प्रयोगशाला है। अगर आज हम चुप रहे,
तो आने वाले समय में मतदान केवल एक औपचारिकता रह जाएगा, जहां नतीजे पहले से तय होंगे क्योंकि मतदाता पहले ही बेदखल किए जा चुके होंगे।
क्या अब भी उम्मीद बाकी है?
4.40 करोड़ की यह मतदाता सूची महज एक फेहरिस्त नहीं है,
यह गुजरात के भविष्य का फैसला करने वाला दस्तावेज है। लेकिन जब इस दस्तावेज में 4 लाख लोगों की नागरिक पहचान को प्रशासनिक कलम से मिटा दिया जाए, तो यह पूरे राष्ट्र के लिए चेतावनी है।
लोकतंत्र केवल पांच साल में एक बार बटन दबाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र उस व्यवस्था का नाम है जहां सरकार को जनता से डरना चाहिए, न कि जनता को सरकार की मतदाता सूची से। चुनाव आयोग, गुजरात सरकार और भाजपा ने मिलकर जो खेल खेला है, वह इतिहास के काले पन्नों में दर्ज होगा।
अब समय आ गया है कि नागरिक जागें। अपनी मतदाता पहचान की जांच करें और इस 'वोट चोरी' के खिलाफ आवाज उठाएं। वरना, वह दिन दूर नहीं जब आपके हाथ में स्याही तो होगी, लेकिन सूची में आपका नाम नहीं होगा।
- Abhijit
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