भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में संसद को 'लोकतंत्र का मंदिर' कहा जाता है, लेकिन आज इसी मंदिर की मर्यादा को सत्ता के गलियारों से आने वाले झूठ के बवंडर ने तार-तार कर दिया है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू जिस प्रकार एक वीडियो को हथियार बनाकर विपक्षी महिला सांसदों पर हमले कर रहे हैं, वह न केवल राजनीतिक मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि देश की जनता की आंखों में धूल झोंकने का एक भद्दा प्रयास भी है।
झूठ के पैर नहीं होते: रिजिजू के दावों की हकीकत
गुरुवार को केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने एक वीडियो साझा किया और दावा किया कि विपक्षी महिला सांसद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कक्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'धमकी' देने गई थीं। लेकिन रिजिजू साहब शायद यह भूल गए कि आज का दौर सूचनाओं के बंद कमरों का दौर नहीं है। जिस वीडियो को वे आज प्रधानमंत्री की सुरक्षा और सम्मान के लिए 'खतरा' बता रहे हैं, वही वीडियो 4 फरवरी को सोशल मीडिया पर कई विश्वसनीय चैनलों ने प्रसारित कर दिया था।

उस समय की सच्चाई कुछ और ही थी। असलियत यह थी कि वे महिला सांसद लोकसभा अध्यक्ष के पास एक गंभीर मुद्दे पर अपनी बात रखने गई थीं। मुद्दा था—बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे द्वारा सदन के भीतर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी करना और एक विवादित किताब का हवाला देकर सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाना। विपक्षी सांसदों का दोष सिर्फ इतना था कि वे संसदीय मर्यादाओं के उल्लंघन के खिलाफ अध्यक्ष से न्याय मांगने गई थीं।
डरे हुए प्रधानमंत्री और 'सुरक्षा' का ढोंग
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्हें उनकी पार्टी के नेता 'विश्वगुरु' और 'अजेय' बताते हैं, क्या वे वाकई मुट्ठी भर महिला सांसदों से इतने डरे हुए हैं कि उन्हें संसद में अपना भाषण देने से रोकने के लिए 'हमले' की साजिश का नैरेटिव गढ़ना पड़ा? अध्यक्ष ओम बिरला का यह कहना कि उन्होंने प्रधानमंत्री को सदन में न आने की सलाह दी क्योंकि विपक्षी सांसद 'अप्रिय घटना' कर सकते थे, लोकतंत्र के लिए एक काला अध्याय है।
क्या अब सदन के भीतर अपनी बात रखना, बैनर दिखाना या अध्यक्ष के चेंबर में जाकर विरोध दर्ज कराना 'शारीरिक हमला' और 'धमकी' की श्रेणी में आता है? अगर ऐसा है, तो भाजपा को अपने उन दिनों के इतिहास को पलटकर देखना चाहिए जब वे विपक्ष में रहकर सदन के वेल में उतरते थे। आज जब विपक्ष सवाल पूछ रहा है, जब जनरल नरवणे की किताब और चीन के मुद्दे पर प्रधानमंत्री को घेरा जा रहा है, तो सत्ता पक्ष 'सुरक्षा' का कार्ड खेलकर चर्चा से भागने का रास्ता ढूंढ रहा है।
महिला सांसदों का अपमान: भाजपा का दोहरा चेहरा
एक तरफ भाजपा 'नारी शक्ति' और 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' का नारा देती है, और दूसरी तरफ उनकी कैबिनेट के वरिष्ठ मंत्री विपक्षी महिला सांसदों को 'हिंसक' और 'धमकाने वाला' बताकर उनके चरित्र हनन की कोशिश करते हैं। यह वही भाजपा है जिसके सांसद निशिकांत दुबे सदन के भीतर देश के नायकों पर कीचड़ उछालते हैं और उन्हें संरक्षण दिया जाता है। लेकिन जब महिला सांसद शांतिपूर्वक अपनी बात रखने जाती हैं, तो उनके खिलाफ 'इललीगल वीडियो' और 'धमकी' जैसे भारी-भरकम शब्दों का जाल बुना जाता है।
प्रियंका गांधी और अन्य महिला सांसदों ने स्पष्ट किया है कि वे वहां केवल अपनी पीड़ा और संसदीय परंपराओं की दुहाई देने गई थीं। क्या एक सांसद को यह हक भी नहीं कि वह अपने अध्यक्ष के सामने अपनी बात रख सके?
अंतहीन झूठ की राजनीति
किरेन रिजिजू द्वारा साझा किया गया वीडियो सत्ता के हताशा का प्रतीक है। जब सरकार के पास चीन के अतिक्रमण, जनरल नरवणे के खुलासों और निशिकांत दुबे की बदजुबानी का कोई जवाब नहीं होता, तो वे एक नया 'विवाद' पैदा कर देते हैं। प्रधानमंत्री का सदन से नदारद रहना और उसका दोष महिलाओं के सर मढ़ना, कायरता और कुटिल राजनीति का मिश्रण है।
देश देख रहा है कि कैसे लोकतांत्रिक संस्थाओं को निजी स्वार्थों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। सदन के भीतर नियमों की व्याख्या केवल विपक्ष को चुप कराने के लिए की जाती है, जबकि सत्ता पक्ष को 'प्रतिबंधित किताबों' और 'झूठे दावों' को पेश करने की खुली छूट है।
राजनीतिक नैरेटिव बनाम सत्य
सत्ता का मद इतना गहरा नहीं होना चाहिए कि वह सत्य को पहचानना ही छोड़ दे। किरेन रिजिजू और भाजपा का यह 'वीडियो प्रोपेगेंडा' जनता के सामने बेनकाब हो चुका है। प्रधानमंत्री मोदी को याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र 'धमकियों' के काल्पनिक डर से नहीं, बल्कि सवालों के जवाब देने और विपक्ष के सम्मान से चलता है। महिला सांसदों को ढाल बनाकर अपनी जवाबदेही से बचना न केवल संसदीय इतिहास की एक शर्मनाक घटना है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि मौजूदा सरकार सत्य से कितनी डरी हुई है।
सच्चाई को कितना भी दबाया जाए, वह 4 फरवरी के वीडियो की तरह किसी न किसी मोड़ पर सामने आ ही जाती है। अब समय आ गया है कि जनता इस 'झूठ की फैक्ट्री' को बंद करने की दिशा में सोचना शुरू करे।
- Abhijit
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