भारतीय लोकतंत्र के मंदिर, संसद में इन दिनों एक अजीबोगरीब खेल चल रहा है। यहाँ तथ्य नहीं, बल्कि 'झूठ' का सिक्का चलता है। हाल ही में भाजपा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे ने लोकसभा में एक ऐसा बयान दिया, जो न केवल ऐतिहासिक रूप से गलत है, बल्कि भारतीय संसदीय प्रणाली के इतिहास को धूमिल करने की एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है। डॉ. दुबे ने दावा किया कि 2014 से पहले विपक्ष और 'नेता प्रतिपक्ष' जैसी कोई अवधारणा ही नहीं थी और यह सब भाजपा के सत्ता में आने के बाद शुरू हुआ।
यह वक्तव्य उस 'इतिहास-भंजन' की फैक्ट्री का नवीनतम उत्पाद है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सिपहसालारों ने पिछले एक दशक में भारत पर थोपा है।
तथ्यों का गला घोंटना: डॉ. दुबे का सफेद झूठ
डॉ. निशिकांत दुबे ने दावा किया कि 1977 तक लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का कोई पद ही नहीं था। यह सच है कि 'नेता प्रतिपक्ष' पद को सांविधिक (Statutory) मान्यता 'संसद में विपक्ष के नेताओं के वेतन और भत्ते अधिनियम, 1977' के जरिए मिली। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि उससे पहले विपक्ष का अस्तित्व ही नहीं था?
तथ्य यह है कि 1969 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ, तब राम सुभग सिंह लोकसभा के पहले आधिकारिक 'नेता प्रतिपक्ष' बने थे। वे कांग्रेस (ओ) के सदस्य थे। उनसे पहले भी, भले ही किसी दल के पास नियमानुसार 10% सीटें न रही हों, लेकिन विपक्ष की आवाज हमेशा मुखर रही। डॉ. दुबे जैसे नेता अर्ध-सत्य को पूर्ण-सत्य बनाकर पेश करने में माहिर हैं। वे यह भूल जाते हैं कि लोकतंत्र केवल बहुमत से नहीं, बल्कि विपक्ष के सम्मान से चलता है—एक ऐसी परंपरा जिसे नेहरू से लेकर शास्त्री तक ने निभाया, लेकिन मोदी युग में जिसे 'विपक्ष-मुक्त भारत' के नारे के नीचे दबा दिया गया है।
इतिहास के साथ खिलवाड़: भाजपा का पुराना हथियार
निशिकांत दुबे कोई पहले भाजपा नेता नहीं हैं जो इतिहास को अपनी सुविधा के अनुसार मरोड़ रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी खुद कई बार सार्वजनिक मंचों से ऐतिहासिक भूलें कर चुके हैं—चाहे वह तक्षशिला को बिहार में बताना हो या सिकंदर के गंगा तट तक पहुँचने का दावा। समस्या केवल 'याददाश्त' की नहीं है, समस्या उस विचारधारा की है जो मानती है कि भारत का वास्तविक इतिहास 2014 में ही शुरू हुआ है।
भाजपा के लिए इतिहास एक ऐसा मैदान है जहाँ वे अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए अतीत के नायकों को खलनायक और वास्तविक तथ्यों को 'विदेशी साजिश' करार देते हैं। नेहरू से लेकर गांधी तक, हर उस व्यक्ति के योगदान को छोटा दिखाने की कोशिश की जाती है जिसने एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत की नींव रखी। दुबे का बयान इसी कड़ी का हिस्सा है, जिसका मकसद यह जताना है कि कांग्रेस के शासनकाल में लोकतंत्र जैसी कोई चीज ही नहीं थी।
प्रधानमंत्री मोदी का मौन समर्थन
संसद में जब निशिकांत दुबे जैसे नेता इस तरह के बेतुके बयान देते हैं, तो प्रधानमंत्री की चुप्पी उन्हें मौन स्वीकृति प्रदान करती है। प्रधानमंत्री मोदी अक्सर 'मदर ऑफ डेमोक्रेसी' (लोकतंत्र की जननी) होने का गौरव गान करते हैं, लेकिन उनकी अपनी पार्टी के सांसद उसी लोकतंत्र की ऐतिहासिक जड़ों को उखाड़ने में लगे हैं।
जब सत्ता पक्ष का कोई सांसद विपक्ष के नेता (राहुल गांधी) के बारे में यह कहता है कि "भाजपा ने विपक्ष को पद दान में दिया है", तो वह न केवल संविधान का अपमान करता है, बल्कि उन करोड़ों मतदाताओं का भी अपमान करता है जिन्होंने विपक्ष को चुना है। यह अहंकार ही भाजपा की नई पहचान बन चुका है।
'विशेषज्ञता' के नाम पर भ्रम
डॉ. निशिकांत दुबे को अक्सर भाजपा के 'इतिहास और डेटा विशेषज्ञ' के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में उनके कई बयान पूरी तरह से निराधार पाए गए हैं। चाहे वह अर्थव्यवस्था के आंकड़े हों या सामाजिक मुद्दे, वे अक्सर ऐसे दावे करते हैं जो किसी भी प्रमाणिक स्रोत से मेल नहीं खाते।
लोकसभा में उनकी हालिया टिप्पणी कि "कांग्रेस के पास कोई इतिहास नहीं है", न केवल हास्यास्पद है बल्कि उनकी अपनी बौद्धिक कंगाली को दर्शाती है। एक ऐसी पार्टी जिसने आजादी की लड़ाई लड़ी, उसके इतिहास को नकारना वैसा ही है जैसे सूरज को दीपक दिखाना। लेकिन भाजपा का तंत्र जानता है कि यदि किसी झूठ को हजार बार दोहराया जाए, तो वह कम से कम उनके अंध-भक्तों के लिए सच बन जाता है।
लोकतंत्र के लिए खतरा
भारत का इतिहास किसी एक पार्टी की जागीर नहीं है। यह उन संघर्षों, बहसों और संसदीय परंपराओं से बना है जिन्होंने 75 वर्षों तक इस देश को एकजुट रखा है। जब निशिकांत दुबे जैसे नेता यह कहते हैं कि "नेता प्रतिपक्ष भाजपा की देन है", तो वे उस स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा पर कालिख पोतते हैं जिसमें विपक्ष को 'छाया प्रधानमंत्री' (Shadow PM) माना जाता रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा को यह समझना होगा कि सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन जो इतिहास वे आज 'बना' रहे हैं या 'बिगाड़' रहे हैं, कल की पीढ़ी उन्हें उसी के आधार पर आंकेगी। झूठे बयानों और इतिहास से छेड़छाड़ कर आप जनता को कुछ समय के लिए गुमराह तो कर सकते हैं, लेकिन सत्य को हमेशा के लिए कैद नहीं कर सकते।
निशिकांत दुबे का बयान भारतीय लोकतंत्र के प्रति उनकी और उनकी पार्टी की तुच्छ सोच का प्रमाण है। यह समय है कि देश के प्रबुद्ध नागरिक इन 'इतिहास-भंजकों' के खिलाफ खड़े हों और अपनी विरासत की रक्षा करें।
- Abhijit
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