Thursday, February 12, 2026

भारत की संप्रभुता का सौदा: मोदी सरकार का 'सरेंडर'

संसद के गलियारों से लेकर देश की चौपालों तक आज एक ही चर्चा है - क्या भारत की संप्रभुता को विदेशी ताकतों के आगे गिरवी रख दिया गया है? लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बजट चर्चा के दौरान जो मुद्दे उठाए हैं, उन्होंने केवल सत्तापक्ष की चूलें हिला दी हैं, बल्कि हर उस भारतीय को सोचने पर मजबूर कर दिया है जिसे अपनी मातृभूमि की स्वायत्तता से प्रेम है। राहुल गांधी का सीधा आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के साथ जिस व्यापार समझौते (India-US Trade Deal) पर हस्ताक्षर किए हैं, वह समझौता नहीं, बल्कि देश का 'पूर्ण आत्मसमर्पण' है।

मार्शल आर्ट्स और 'चोकहोल्ड': एक कड़वी हकीकत

राहुल गांधी ने अपने भाषण की शुरुआत मार्शल आर्ट्स के एक रूपक से की। उन्होंने समझाया कि कैसे किसी विरोधी को पहले 'ग्रिप' में लिया जाता है और फिर 'चोकहोल्ड' (गला घोंटना) के जरिए उसे हार मानने पर मजबूर किया जाता है। उनका आरोप है कि अमेरिकी प्रशासन ने प्रधानमंत्री मोदी की गर्दन पर यही 'चोकहोल्ड' बना रखा है। सवाल यह उठता है कि आखिर वह क्या मजबूरी है जिसने एक तथाकथित 'मजबूत नेता' को ऐसे समझौते पर दस्तखत करने के लिए विवश कर दिया, जो भारत के हितों की बलि चढ़ा रहा है?

राहुल गांधी ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया कि अडानी पर अमेरिका में चल रहे कानूनी मामले और 'एपस्टीन फाइल्स' जैसी संवेदनशील जानकारियां सरकार के लिए 'प्रेशर पॉइंट' बन गई हैं। क्या व्यक्तिगत छवि बचाने के लिए देश के भविष्य का सौदा किया जा रहा है?

डेटा: 21वीं सदी का नया तेल और हमारा 'सरेंडर'

आज की दुनिया में डेटा ही सबसे बड़ी शक्ति है। राहुल गांधी ने सही कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और भविष्य की तकनीक के दौर में भारतीय जनता का डेटा हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। लेकिन इस समझौते में मोदी सरकार ने 'डेटा लोकलाइजेशन' की शर्त को त्याग दिया है।

अगर हम अपने डेटा पर नियंत्रण खो देते हैं, तो हम अपनी डिजिटल संप्रभुता खो देते हैं। बिना डेटा स्थानीयकरण के, भारतीय नागरिकों की गोपनीय जानकारियां विदेशी सर्वरों पर होंगी और विदेशी कंपनियां उन पर राज करेंगी। यह उस डिजिटल इंडिया के दावे पर करारा तमाचा है जिसका ढिंढोरा यह सरकार पिछले एक दशक से पीट रही है। हम अपनी सबसे बड़ी ताकत को कौड़ियों के भाव अमेरिका को सौंप रहे हैं।

किसानों के पसीने पर विदेशी कब्ज़ा

राहुल गांधी के संबोधन का सबसे दुखद हिस्सा हमारे अन्नदाताओं से जुड़ा था। व्यापार समझौते के तहत मक्का, सोयाबीन और कपास जैसे उत्पादों के लिए भारतीय बाजार को अमेरिकी कॉर्पोरेट खेती के लिए खोल दिया गया है। अमेरिका में कृषि अत्यधिक मशीनीकृत और भारी सब्सिडी वाली है। क्या हमारा छोटा किसान उन विशाल अमेरिकी फार्मों का मुकाबला कर पाएगा?

राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि "मोदी जी ने किसानों का खून और पसीना बेच दिया है।" जब अमेरिकी कृषि उत्पाद शून्य या न्यूनतम शुल्क पर भारत में बाढ़ की तरह आएंगे, तो स्थानीय किसान बर्बाद हो जाएगा। यह उस सरकार की असलियत है जिसने किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था, लेकिन अब उन्हें विदेशी प्रतिस्पर्धा की आग में झोंक रही है।

टेक्सटाइल और व्यापार घाटा: एकतरफा खेल


आंकड़े गवाह हैं कि इस समझौते के बाद अमेरिका ने भारत पर आयात शुल्क 3% से बढ़ाकर 18% कर दिया है, जबकि भारत ने कई अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क घटाकर शून्य कर दिया है। यह कैसी 'बराबरी' की डील है? राहुल गांधी ने बताया कि कैसे भारत का टेक्सटाइल उद्योग, जो लाखों लोगों को रोजगार देता है, अब बांग्लादेश जैसे देशों की तुलना में पिछड़ जाएगा क्योंकि उन्हें छूट मिल रही है और हम पर भारी टैक्स थोपा जा रहा है। क्या यह 'मेक इन इंडिया' का अंत नहीं है?

ऊर्जा सुरक्षा और तेल की राजनीति


राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि अब भारत की ऊर्जा नीति नई दिल्ली में नहीं, बल्कि वाशिंगटन में तय होगी। रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत की स्वायत्तता खतरे में है। प्रधानमंत्री मोदी जो कल तक रणनीतिक स्वायत्तता की बात करते थे, आज उसी अमेरिका के सामने नतमस्तक नजर रहे हैं जिसने भारत पर व्यापारिक प्रतिबंधों की तलवार लटका रखी है।

यह सिर्फ राजनीति नहीं, राष्ट्र का अस्तित्व है

यह युद्ध केवल सत्ता और विपक्ष के बीच शब्दों की जंग नहीं है। यह भारत के आर्थिक भविष्य और उसकी संप्रभुता को बचाने की लड़ाई है। राहुल गांधी ने जो फ्रंट खोला है, वह जनता को यह बताने के लिए है कि "देश बिक रहा है।"

क्या हम एक ऐसे भारत की कल्पना कर सकते हैं जहां हमारे नीतिगत फैसले विदेशी दबाव में लिए जाएं? क्या हम अपने किसानों, अपने डेटा और अपनी सीमाओं का सौदा बर्दाश्त करेंगे? प्रधान मंत्री को इन सवालों के जवाब देने होंगे। चुप्पी साधना अब कोई विकल्प नहीं है। भारत माता की जय का नारा लगाने वाली सरकार को यह बताना होगा कि उसने 'भारत माता' के हितों को विदेशी मेज पर क्यों परोस दिया?

जैसा कि राहुल गांधी ने कहा—"अगर इंडिया गठबंधन की सरकार होती, तो हम बराबरी की आंखों में आंखें डालकर बात करते। हम नौकर बनकर नहीं, एक सुपरपावर की तरह मेज पर बैठते।" आज वक्त गया है कि देश के नागरिक जागें और अपनी संप्रभुता के इस 'सरेंडर' के खिलाफ आवाज उठाएं।

- Abhijit

12/02/2026

No comments:

Post a Comment