गुजरात विधानसभा में उपाध्यक्ष पद को लेकर एक बार फिर लोकतांत्रिक परंपराओं और राजनीतिक मर्यादाओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं। भारतीय संसदीय लोकतंत्र में लंबे समय से यह परंपरा रही है कि संसद अथवा किसी भी राज्य की विधानसभा में उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को दिया जाता है, ताकि सदन के संचालन में संतुलन, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक गरिमा बनी रहे। किंतु भारतीय जनता पार्टी ने पूर्णेश मोदी को उपाध्यक्ष पद के लिए मैदान में उतारकर इस परंपरा को एक बार फिर नज़रअंदाज़ किया है। कांग्रेस ने इसके मुकाबले शैलेश परमार को उम्मीदवार बनाया है, जिससे यह स्पष्ट है कि विपक्ष इस पद को अपने अधिकार और लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा मानता है।
सवाल यह है कि आखिर भाजपा इस पद को विपक्ष को देने से क्यों बचती रही है? क्या यह केवल राजनीतिक वर्चस्व का प्रदर्शन है, या इसके पीछे कोई गहरी रणनीति छिपी हुई है?
जब से नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तब से राज्य की राजनीति में एक स्पष्ट प्रवृत्ति देखी गई—सत्ता का केंद्रीकरण और संस्थाओं पर पूर्ण नियंत्रण। उसी प्रवृत्ति की निरंतरता आज भी दिखाई देती है। उपाध्यक्ष पद, जो कि सदन की निष्पक्षता का प्रतीक माना जाता है, उसे भी भाजपा अपने नियंत्रण में रखना चाहती है। यह कदम केवल एक पद की लड़ाई नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन को समाप्त करने की दिशा में उठाया गया कदम प्रतीत होता है।
भाजपा का यह तर्क हो सकता है कि उसे पूर्ण बहुमत प्राप्त है, इसलिए वह किसी भी पद पर अपना उम्मीदवार उतार सकती है। किंतु लोकतंत्र केवल बहुमत का खेल नहीं है; यह परंपराओं, सहमति और संस्थागत संतुलन का भी नाम है। जब बहुमत का उपयोग परंपराओं को तोड़ने और विपक्ष को हाशिए पर डालने के लिए किया जाता है, तब लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है।
पूर्णेश मोदी को उपाध्यक्ष पद पर लाने के पीछे एक और राजनीतिक आयाम भी चर्चा में है। पिछले कुछ समय से वे अपने ही सरकार के विरुद्ध पत्र लिखकर और मुद्दे उठाकर सुर्खियों में रहे हैं। उनके ‘लेटर बम’ ने भाजपा सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रश्न खड़े किए थे। ऐसे में यह आशंका स्वाभाविक है कि क्या उन्हें उपाध्यक्ष बनाकर उनकी सक्रियता को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है? उपाध्यक्ष का पद एक संवैधानिक मर्यादा और सीमाओं से बंधा होता है। उस पद पर बैठने के बाद कोई भी नेता खुलकर सरकार की आलोचना नहीं कर सकता। क्या यह नियुक्ति एक प्रकार से राजनीतिक ‘मैनेजमेंट’ का हिस्सा है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की राजनीतिक शैली पर यदि दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वे संगठन और सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण में विश्वास रखते हैं। गुजरात उनकी राजनीतिक प्रयोगशाला रही है। यहां उन्होंने संगठन को इस प्रकार संरचित किया कि आंतरिक असहमति की गुंजाइश न्यूनतम रह जाए। आज भी वही मॉडल राज्य में लागू होता दिखता है। जो नेता सवाल उठाता है, उसे या तो किनारे कर दिया जाता है या फिर किसी पद के माध्यम से ‘संतुष्ट’ कर दिया जाता है।
उपाध्यक्ष पद को विपक्ष को न देना केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि भाजपा किसी भी स्तर पर सत्ता साझा करने को तैयार नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि शासन में संतुलन बनाए रखना भी है। यदि विपक्ष को संवैधानिक पदों से वंचित किया जाता है, तो वह केवल दर्शक बनकर रह जाता है। इससे सदन की कार्यवाही एकतरफा हो जाती है।
गुजरात की राजनीति में भाजपा का लंबे समय से दबदबा रहा है। किंतु सत्ता का यह दीर्घकालिक नियंत्रण अब एक प्रकार की राजनीतिक असहिष्णुता में बदलता दिखाई दे रहा है। विपक्ष को कमजोर करना, संस्थाओं को नियंत्रित रखना और परंपराओं को तोड़ना - ये सब संकेत देते हैं कि सत्ता को चुनौती से डर लगने लगा है।
अमित शाह की रणनीतिक राजनीति भी इसी दिशा में संकेत करती है। वे संगठनात्मक अनुशासन और सत्ता की पकड़ को सर्वोपरि मानते हैं। ऐसे में यदि कोई नेता, चाहे वह अपनी ही पार्टी का क्यों न हो, सार्वजनिक रूप से सवाल उठाता है, तो उसे या तो समझा-बुझाकर चुप कराया जाता है या फिर ऐसी भूमिका में भेज दिया जाता है जहां उसकी स्वतंत्र आवाज़ सीमित हो जाए। पूर्णेश मोदी का उपाध्यक्ष पद पर चयन इसी दृष्टिकोण से देखा जा सकता है।
दूसरी ओर, कांग्रेस द्वारा शैलेश परमार को उम्मीदवार बनाना यह दर्शाता है कि विपक्ष अब भी परंपरा और लोकतांत्रिक संतुलन की बात कर रहा है। हालांकि कांग्रेस की अपनी राजनीतिक कमजोरियां हैं, लेकिन इस मुद्दे पर उसका रुख सिद्धांतपरक प्रतीत होता है। यदि उपाध्यक्ष पद विपक्ष को मिलता, तो यह एक सकारात्मक संकेत होता कि सदन में संवाद और संतुलन की गुंजाइश अब भी शेष है।
यह भी विचारणीय है कि जब केंद्र में भी लंबे समय तक उपाध्यक्ष का पद खाली रहा या विपक्ष को नहीं दिया गया, तब गुजरात में अलग व्यवहार की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यह एक व्यापक राजनीतिक सोच का हिस्सा है, जिसमें सत्ता को साझा करने की बजाय उसे समेटकर रखने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है।
लोकतंत्र में परंपराएं केवल औपचारिकता नहीं होतीं; वे विश्वास का आधार होती हैं। जब सत्तारूढ़ दल स्वयं ही उन परंपराओं को तोड़ता है, तो वह यह संदेश देता है कि उसे विपक्ष पर भरोसा नहीं है। यह अविश्वास ही अंततः लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि गुजरात की जनता इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करे। क्या लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम है? या फिर यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें विपक्ष को भी सम्मान और भूमिका मिलती है? यदि हर संवैधानिक पद पर केवल सत्तारूढ़ दल का ही अधिकार होगा, तो फिर विपक्ष की उपयोगिता क्या रह जाएगी?
पूर्णेश मोदी की नियुक्ति से भाजपा अल्पकालिक राजनीतिक लाभ अवश्य प्राप्त कर सकती है। संभव है कि आंतरिक असहमति पर नियंत्रण स्थापित हो जाए। किंतु दीर्घकाल में यह कदम लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण का कारण बन सकता है। सत्ता की यह एकांगी सोच अंततः जनता के विश्वास को ही कमजोर करती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह को यह समझना चाहिए कि लोकतंत्र में शक्ति का वास्तविक परीक्षण विपक्ष को स्थान देने में होता है। यदि सत्ता इतनी आश्वस्त है, तो उसे उपाध्यक्ष जैसे पद पर विपक्ष को बैठाने से डर क्यों है? क्या यह भय है कि सदन में निष्पक्षता की आवाज़ और बुलंद हो जाएगी?
गुजरात विधानसभा में उपाध्यक्ष पद को लेकर उठे इस विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता और लोकतंत्र के बीच संतुलन की लड़ाई जारी है। यह केवल एक पद का प्रश्न नहीं, बल्कि उस सोच का प्रश्न है जो लोकतांत्रिक संस्थाओं को या तो मजबूत करती है या फिर उन्हें केवल औपचारिक बना देती है।
समय आ गया है कि जनता, विपक्ष और जागरूक नागरिक समाज इस विषय पर खुलकर चर्चा करें। लोकतंत्र की रक्षा केवल चुनावों से नहीं होती, बल्कि उन परंपराओं और मूल्यों से होती है जो उसे जीवंत बनाए रखते हैं। यदि वे ही टूटने लगें, तो लोकतंत्र केवल नाम भर रह जाता है।
- Abhijit
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