(फ़ाइल फ़ोटो)
भारत की सड़कों पर 'परिवर्तन के पैगंबर' कहे जाने वाले नितिन गडकरी और 'अमृत काल' के स्वप्नद्रष्टा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे (National Expressway 4) को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करते हैं। दावा किया गया कि यह 1,386 किलोमीटर लंबा गलियारा भारत की लॉजिस्टिक्स रीढ़ बनेगा और व्यापार की गति को दोगुना कर देगा। लेकिन जब आप अपनी गाड़ी के साथ इस सड़कीली जादुई कालीन पर उतरते हैं,
तो हकीकत किसी डरावने सपने जैसी होती है।
हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बाद देश को जो मिला है, वह एक विश्वस्तरीय सड़क नहीं, बल्कि एक 'अनइवन' (असमान) और खतरनाक ट्रैक है, जहाँ गाड़ियाँ सड़क पर दौड़ने के बजाय 'बाउंस' करती हैं।
जल्दबाजी की कीमत: गुणवत्ता के साथ खिलवाड़
राजनीतिक लाभ और चुनावों से पहले फीता काटने की होड़ में इस एक्सप्रेसवे का निर्माण इतनी जल्दबाजी में किया गया कि बुनियादी इंजीनियरिंग और सावधानियों को ताक पर रख दिया गया। सड़कों का निर्माण करते समय 'राइडिंग क्वालिटी' (सवारी की गुणवत्ता) सबसे महत्वपूर्ण होती है, लेकिन एनई-4 पर यह शून्य नजर आती है। गाड़ी की रफ्तार जैसे ही 100 किमी/घंटा को छूती है, सड़क की लहरदार बनावट (undulations)
गाड़ी को उछालने लगती है।
क्या यह वही ‘जापानी तकनीक’ या ‘विश्वस्तरीय मानक’ हैं जिसका ढिंढोरा पीटा गया था? एक सामान्य नागरिक के लिए यह समझना मुश्किल है कि कैसे एक आधुनिक एक्सप्रेसवे इतना उबड़-खाबड़ हो सकता है कि यात्रियों को पीठ दर्द और वाहनों को सस्पेंशन की खराबी का उपहार मिले।
वाहनों का नुकसान और यात्रियों का बढ़ता खतरा
यह सड़क केवल असुविधाजनक ही नहीं, बल्कि जानलेवा भी साबित हो रही है। एक्सप्रेसवे पर अनियंत्रित 'बाउंसिंग' के कारण तेज रफ्तार गाड़ियों का संतुलन बिगड़ना आम हो गया है। हाल की रिपोर्टें बताती हैं कि टायर फटने और सस्पेंशन टूटने की वजह से यहाँ लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं। जब सड़क की सतह एकसमान नहीं होती, तो वाहन के टायरों पर पड़ने वाला दबाव असमान हो जाता है, जिससे हीट बढ़ती है और टायर फट जाते हैं।
मोदी सरकार का दावा है कि उन्होंने 'बहुत सावधानी' बरती है, लेकिन क्या वह सावधानी सिर्फ फाइलों तक सीमित थी? यदि सावधानी बरती गई होती, तो आईआईटी खड़गपुर जैसी संस्थाओं को निर्माण दोषों की जांच के लिए क्यों बुलाया जाता? क्यों संसद में यह स्वीकार करना पड़ा कि कई हिस्सों में सड़क धंस गई है?
गडकरी का 'विजन' और धरातल की हकीकत
नितिन गडकरी को अक्सर एक 'परफॉर्मर' मंत्री माना जाता है। लेकिन दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे उनकी छवि पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। जब आप ₹1 लाख करोड़ से अधिक का निवेश करते हैं, तो जनता एक ऐसी सड़क की उम्मीद करती है जहाँ वह बिना किसी डर के यात्रा कर सके। यहाँ तो स्थिति यह है कि नई चमचमाती गाड़ियाँ भी कुछ ही महीनों में खटारा होने लगती हैं।
सड़क की सतह पर 'वेव' (लहरें) होना यह दर्शाता है कि बेस और सब-बेस की कुटाई (compaction)
सही ढंग से नहीं की गई। यह सीधे तौर पर ठेकेदारों की लापरवाही और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। क्या मंत्री जी ने कभी खुद एक साधारण कार में बैठकर इस सड़क की 'बाउंसिंग' का अनुभव किया है? या फिर 'अमृत काल' के चश्मे से उन्हें सब कुछ समतल ही दिखाई देता है?
जवाबदेही का अभाव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर 'इंफ्रास्ट्रक्चर' को अपनी सरकार की पहचान बताते हैं। लेकिन क्या इंफ्रास्ट्रक्चर का मतलब सिर्फ कंक्रीट का बिछाना है, चाहे उसकी गुणवत्ता कैसी भी हो? क्या ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट करना ही पर्याप्त है? जनता के टैक्स के पैसे का जो नुकसान हुआ और जो गाड़ियाँ इस खराब सड़क की बलि चढ़ रही हैं, उसका हर्जाना कौन भरेगा?
इस एक्सप्रेसवे के निर्माण में तकनीकी सावधानियों का अभाव साफ झलकता है। ड्रेनेज सिस्टम से लेकर एक्सपेंशन जॉइंट्स तक, हर जगह काम में 'शॉर्टकट' नजर आता है। यह एक ऐसी सड़क है जिसे देखकर लगता है कि इसे इंजीनियरों ने नहीं, बल्कि इवेंट मैनेजरों ने समय सीमा पूरी करने के दबाव में बनवाया है।
दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे भारत की प्रगति का प्रतीक होना चाहिए था, लेकिन वर्तमान में यह सरकारी लापरवाही और जल्दबाजी का जीता-जागता स्मारक बन गया है। यदि सरकार वास्तव में 'सावधानी' बरतने का दावा करती है, तो उसे यह बताना होगा कि आखिर क्यों एक नया-नवेला एक्सप्रेसवे एक 'राइडिंग नाइटमेयर' में तब्दील हो गया है।
प्रधानमंत्री और परिवहन मंत्री को विज्ञापन और पीआर (PR) से बाहर निकलकर इस सड़क की मरम्मत और सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए। भारत की जनता को ऐसी सड़कों की जरूरत है जो उनके वाहनों को सुरक्षित मंजिल तक पहुँचाएं, न कि उनके पुर्जे-पुर्जे ढीले कर दें। यह 'बाउंस-वे' विकास नहीं, बल्कि एक विफलता है जिसे सुधारना अनिवार्य है।
- Abhijit
💯💯
ReplyDelete