(फ़ाइल फ़ोटो)
17 फरवरी 2026 को पेश होने वाला गुजरात का बजट केवल आर्थिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भाजपा सरकार की नीयत, प्राथमिकताओं और जनता के प्रति उसकी ईमानदारी की कठोर परीक्षा है। पिछले कई वर्षों से गुजरात का बजट आम जनता के लिए कम और कॉर्पोरेट, उद्योगपतियों व राजनीतिक प्रचार के लिए अधिक दिखाई देता रहा है। इस बार सवाल और भी तीखा है—क्या यह बजट जनता की तकलीफ समझेगा, या फिर विकास के नाम पर एक और छलावा साबित होगा?
रोजगार: ‘वाइब्रेंट गुजरात’ की खोखली चमक
भाजपा सरकार गुजरात को औद्योगिक विकास और निवेश का मॉडल बताती रही है, लेकिन बेरोज़गार युवाओं की हकीकत इस दावे को खोखला साबित करती है। बड़े-बड़े निवेश सम्मेलन होते हैं, मगर ज़मीनी स्तर पर युवाओं को स्थायी और सम्मानजनक रोजगार नहीं मिलता। इस बजट से जनता को आशंका है कि रोजगार के नाम पर फिर पुराने वादों को नए शब्दों में दोहराया जाएगा, जबकि वास्तविक समाधान की कोई ठोस योजना नहीं होगी।
किसान: आत्मनिर्भरता के नारे, कर्ज़ की मार
गुजरात का किसान आज भी पानी, फसल लागत, MSP, बीमा और कर्ज़ के बोझ से जूझ रहा है। सरकार मंचों पर आत्मनिर्भर किसान की बातें करती है,
लेकिन खेतों में किसान की हालत लगातार बदतर होती जा रही है। डर यह है कि इस बजट में भी किसानों की वास्तविक समस्याओं के बजाय कॉर्पोरेट कृषि और बड़े व्यापारिक हितों को प्राथमिकता दी जाएगी।
महंगाई और मध्यम वर्ग: सबसे बड़ा शिकार
महंगाई ने मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों की कमर तोड़ दी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, ईंधन, बिजली और किराए की बढ़ती कीमतें आम आदमी के जीवन को संकट में डाल चुकी हैं। लेकिन भाजपा सरकार की आर्थिक नीतियां बार-बार आम नागरिक पर बोझ बढ़ाती नजर आई हैं। जनता को आशंका है कि इस बजट में भी टैक्स राहत और जीवन-यापन की लागत कम करने के बजाय प्रतीकात्मक घोषणाओं से काम चलाया जाएगा।
शिक्षा और स्वास्थ्य: भाषणों में प्राथमिकता, हकीकत में उपेक्षा
सरकारी स्कूलों की गिरती गुणवत्ता, महंगी उच्च शिक्षा और बदहाल सरकारी अस्पताल गुजरात की कड़वी सच्चाई हैं। सरकार की प्राथमिकताएं अब तक शिक्षा और स्वास्थ्य से अधिक इवेंट, विज्ञापन और हाई-प्रोफाइल परियोजनाओं पर केंद्रित रही हैं। इस बजट से डर है कि इन बुनियादी क्षेत्रों को फिर सीमित धन देकर केवल औपचारिकता निभाई जाएगी।
शहरी विकास: स्मार्ट सिटी का झूठा सपना
स्मार्ट सिटी, हाईवे, फ्लाईओवर और मेट्रो की चमक के पीछे झुग्गी-बस्तियों, जल संकट, ट्रैफिक और किफायती आवास की गंभीर समस्याएं छिपी हुई हैं। सरकार शहरी विकास को केवल दिखावटी परियोजनाओं तक सीमित रख रही है, जबकि आम नागरिक की बुनियादी जरूरतें अनदेखी हो रही हैं।
सामाजिक न्याय: सिर्फ़ भाषणों की सजावट
दलित, आदिवासी, महिलाएं और अल्पसंख्यक आज भी आर्थिक और सामाजिक असमानता का सामना कर रहे हैं। योजनाओं की घोषणाएं होती हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनके लाभ सीमित और असमान रहते हैं। इस बजट से आशंका है कि सामाजिक न्याय एक बार फिर केवल बजट भाषण की शोभा बनकर रह जाएगा।
कॉर्पोरेट प्रेम बनाम जनता की उपेक्षा
भाजपा सरकार की आर्थिक नीति का रुझान साफ़ है—कॉर्पोरेट घरानों को टैक्स छूट, जमीन और सब्सिडी, जबकि आम जनता को महंगाई, बेरोज़गारी और शुल्क का बोझ। गुजरात का बजट बार-बार यह संकेत देता रहा है कि सरकार की प्राथमिकता जनता नहीं, बल्कि बड़े उद्योग और राजनीतिक छवि निर्माण है।
जनता की उम्मीदें, सरकार की असली परीक्षा
गुजरात बजट 2026-27 सरकार के लिए एक निर्णायक मोड़ है—या तो यह बजट आम जनता की जिंदगी में वास्तविक राहत लाएगा, या फिर भाजपा सरकार के खोखले विकास मॉडल को और उजागर करेगा। अब जनता को नारों, पोस्टरों और प्रचार की नहीं, बल्कि ईमानदार नीति, ठोस फैसलों और वास्तविक बदलाव की जरूरत है। अगर यह बजट भी दिखावे और कॉर्पोरेट-हितैषी नीतियों तक सीमित रहा, तो यह जनता के साथ एक और विश्वासघात साबित होगा।
- Abhijit
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