Friday, February 20, 2026

हाशिये पर कांग्रेस और 'राहुलवाद' का अहंकार: क्या पार्टी अपनी जड़ों से कट चुकी है?

भारतीय राजनीति के फलक पर दशकों तक राज करने वाली देश की सबसे पुरानी पार्टी, कांग्रेस, आज अपने ही अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। लेकिन यह लड़ाई बाहरी शत्रुओं से अधिक आंतरिक अंतर्विरोधों की है। कांग्रेस के भीतर का 'अंतर्कलह' अब महज़ ड्राइंग रूम की चर्चा नहीं रह गया है, बल्कि यह सार्वजनिक मंचों पर चुका है। पार्टी के पुराने निष्ठावान नेता अब नेतृत्व की कार्यशैली पर केवल सवाल उठा रहे हैं, बल्कि उसे सीधे तौर पर खारिज भी कर रहे हैं।

'गांधीवादी' बनाम 'राहुलवादी': मणिशंकर अय्यर का साफ़ संदेश

हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर के बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। अय्यर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह "गांधीवादी, नेहरूवादी और राजीववादी" हैं, लेकिन "राहुलवादी" नहीं हैं। यह बयान सामान्य नहीं है। यह उस व्यक्ति की ओर से आया है जो दशकों तक गांधी परिवार का वफादार रहा है।

अय्यर का यह कहना कि राहुल गांधी उनसे 30 साल छोटे हैं और उन्हें उनके साथ काम करने का अवसर नहीं मिला, केवल उम्र का फासला नहीं दर्शाता। यह वास्तव में उस 'अनुभवहीनता' की ओर इशारा है जो आज की कांग्रेस के केंद्र में है। जब पार्टी का एक दिग्गज नेता यह कहता है कि वह राहुल के विचारों से इत्तेफाक नहीं रखता, तो यह संदेश साफ है कि राहुल गांधी ने अपनी ही पार्टी के पुराने और अनुभवी नेतृत्व का विश्वास खो दिया है। अय्यर ने यहाँ तक कह दिया कि 4000 किलोमीटर की पदयात्रा के बाद भी राहुल में वह परिपक्वता नहीं आई जिसकी पार्टी को दरकार थी। उन्होंने कांग्रेस की वर्तमान स्थिति की तुलना एक 'लाश' (शव) से की, जहाँ विचारों की जीवंतता समाप्त हो चुकी है।

शकील अहमद के तीखे प्रहार: 'डरपोक' नेतृत्व का आरोप

मणिशंकर अय्यर तो अभी भी पार्टी के भीतर रहकर संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन जो नेता कांग्रेस छोड़ चुके हैं, उनके स्वर और भी अधिक कड़वे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कद्दावर नेता शकील अहमद ने राहुल गांधी पर जो प्रहार किए हैं, वे कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हो सकते हैं। शकील अहमद ने राहुल गांधी को एक "असुरक्षित और डरपोक" नेता करार दिया। उनका आरोप है कि कांग्रेस में मल्लिकार्जुन खड़गे केवल 'चेहरा' हैं, जबकि पर्दे के पीछे से तानाशाही पूर्ण निर्णय राहुल गांधी ही लेते हैं।

शकील अहमद का यह दावा कि राहुल गांधी पुराने और जनाधार वाले नेताओं को पसंद नहीं करते और उन्हें दरकिनार कर केवल 'चाटुकार' युवाओं की फौज खड़ी करना चाहते हैं, पार्टी की सड़न को उजागर करता है। जब आंतरिक असहमति को दबाने के लिए नेताओं के घरों पर हमले की धमकियां दी जाने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि पार्टी का लोकतांत्रिक ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है।

चाटुकारिता का नया दौर और वरिष्ठों की उपेक्षा

राहुल गांधी की राजनीति का सबसे बड़ा दोष यह रहा है कि उन्होंने अनुभव को 'बोझ' मान लिया है। पार्टी के वे नेता जिन्होंने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के साथ जमीन पर काम किया था, आज खुद को अवांछित महसूस कर रहे हैं। मणिशंकर अय्यर का यह दर्द कि "कोई उनसे बात तक नहीं करता", असल में उन सैकड़ों कांग्रेसियों का दर्द है जो सालों से 'दरबार' में अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं।

कांग्रेस आज दो गुटों में बंटती दिख रही हैएक वह जो राहुल गांधी के इर्द-गिर्द 'यस-मैन' की भूमिका निभा रहे हैं, और दूसरे वे जो पार्टी के मूल सिद्धांतों (गांधी-नेहरू-राजीव की विचारधारा) को तो मानते हैं, लेकिन राहुल की 'अपरिपक्व राजनीति' के साथ चलने को तैयार नहीं हैं। भाजपा ने अक्सर "नामदार बनाम कामदार" का जुमला इस्तेमाल किया है, लेकिन आज कांग्रेस के भीतर ही "अनुभव बनाम अपरिपक्वता" का युद्ध छिड़ गया है।

राहुल गांधी की कार्यशैली: एक गंभीर विफलता

राहुल गांधी की कार्यशैली पर हमेशा से यह आरोप लगता रहा है कि वे 'पार्ट-टाइम' राजनेता हैं। संसद के सत्रों के दौरान विदेश यात्राएं, प्रक्रियाओं की अनदेखी और गंभीर विमर्श के बजाय सतही बयानबाजी ने उनकी छवि को नुकसान पहुँचाया है। अय्यर जैसे नेताओं का यह मानना कि राहुल की कार्यशैली में वह गंभीरता नहीं है जो एक राष्ट्रीय पार्टी के मुखिया में होनी चाहिए, पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ने वाला है।

विडंबना यह है कि राहुल गांधी स्वयं को एक 'क्रांतिकारी' के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ उन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। पार्टी के भीतर असहमति के स्वरों को 'गद्दारी' का नाम देकर दबाना किसी भी जीवंत संगठन के लिए विनाशकारी होता है।

क्या कांग्रेस का पुनरुद्धार संभव है?

मणिशंकर अय्यर और शकील अहमद के बयानों ने कांग्रेस की उस कड़वी हकीकत को सामने ला दिया है जिसे अब तक 'अनुशासन' के पर्दे के पीछे छिपाया गया था। कांग्रेस आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ उसे यह तय करना होगा कि वह एक परिवार की 'प्राइवेट लिमिटेड कंपनी' बनकर रहेगी या फिर एक ऐसा राष्ट्रीय मंच बनेगी जहाँ अनुभव का सम्मान हो और वैचारिक स्पष्टता हो।

यदि कांग्रेस को जीवित रहना है, तो उसे 'राहुलवाद' के उस संकीर्ण दायरे से बाहर निकलना होगा जिसने अनुभवी नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया है। राजनीति केवल पदयात्राओं और नारों से नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने के सामर्थ्य और नेतृत्व की स्वीकार्यता से चलती है। राहुल गांधी के लिए यह 'अंतिम चेतावनी' हैयदि उन्होंने पुराने दिग्गजों के अनुभवों और उनकी शिकायतों को अनसुना करना जारी रखा, तो कांग्रेस का वह 'शव' जिसे अय्यर ने देखा है, जल्द ही इतिहास का हिस्सा बन जाएगा।

- Abhijit

20/02/2026

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