केंद्र सरकार ने सोमवार को देश की पहली राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति जारी की। इस नीति का नाम ‘प्रहार’ (PRAHAAR) रखा गया है। आठ पृष्ठों की इस संक्षिप्त लेकिन स्पष्ट नीति में आतंकवादी हमलों की रोकथाम, खतरे के अनुरूप त्वरित और संतुलित कार्रवाई, तथा संस्थागत समन्वय पर विशेष बल दिया गया है। प्रस्तावना में यह उल्लेख किया गया है कि कुछ पड़ोसी देशों ने आतंकवाद को अपनी सरकारी नीति का औजार बनाया है, किंतु भारत आतंकवाद को किसी विशेष धर्म, जाति, देश या सभ्यता से नहीं जोड़ता। यह वाक्य अपने आप में नीति की वैचारिक दिशा और केंद्र सरकार की मंशा को स्पष्ट करता है।
नीति की पृष्ठभूमि और आवश्यकता
भारत दशकों से आतंकवाद की चुनौती का सामना करता आया है—चाहे वह सीमापार प्रायोजित आतंकवाद हो, उग्रवाद हो या शहरी मॉड्यूल के माध्यम से संचालित नेटवर्क। 26/11 के बाद से लेकर हाल के वर्षों तक सुरक्षा तंत्र में अनेक सुधार हुए, परंतु एक समग्र, औपचारिक और राष्ट्रीय स्तर की स्पष्ट आतंकवाद-रोधी नीति का अभाव महसूस किया जा रहा था। ‘प्रहार’ इसी शून्य को भरने का प्रयास है।
यह पहल सीधे तौर पर केंद्र में सत्तारूढ़ सरकार की प्राथमिकताओं को दर्शाती है। प्रधानमंत्री
Narendra
Modi ने अपने विभिन्न भाषणों में बार-बार यह कहा है कि आतंकवाद के प्रति शून्य-सहिष्णुता ही भारत की नीति है। वहीं, गृह मंत्री
Amit
Shah ने आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए राज्यों के साथ समन्वय, एजेंसियों के आधुनिकीकरण और कठोर कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया है। ‘प्रहार’ को इसी दीर्घकालिक दृष्टि का संस्थागत रूप कहा जा सकता है।
‘प्रहार’ का वैचारिक संदेश
नीति की प्रस्तावना में दो महत्वपूर्ण बातें उभरकर सामने आती हैं। पहली, यह स्वीकारोक्ति कि कुछ पड़ोसी देश आतंकवाद को राज्य-नीति के औजार के रूप में प्रयोग करते रहे हैं। यह संकेत स्पष्ट रूप से भारत की सुरक्षा चुनौतियों की भौगोलिक वास्तविकता की ओर इशारा करता है। दूसरी, भारत का यह घोषित रुख कि वह आतंकवाद को किसी धर्म, जाति या सभ्यता से नहीं जोड़ता।
यह कथन न केवल अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की साख को मजबूत करता है, बल्कि देश के भीतर सामाजिक समरसता का संदेश भी देता है। केंद्र सरकार की मंशा यह प्रतीत होती है कि आतंकवाद के विरुद्ध कठोर कार्रवाई और सामाजिक सौहार्द—दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाया जाए। इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार सुरक्षा को राजनीतिक या सांप्रदायिक चश्मे से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर देखना चाहती है।
त्वरित और संतुलित कार्रवाई का संकेत
‘प्रहार’ में खतरे के अनुरूप त्वरित और संतुलित कार्रवाई की बात कही गई है। इसका आशय यह है कि आतंकवादी गतिविधियों के प्रति प्रतिक्रिया केवल कठोर ही नहीं, बल्कि रणनीतिक भी होगी। हाल के वर्षों में सर्जिकल स्ट्राइक और सीमा पार जवाबी कार्रवाई जैसी घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि भारत अब रक्षात्मक नहीं, बल्कि सक्रिय रणनीति अपनाने को तैयार है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने सुरक्षा मामलों में निर्णायक छवि बनाई है। गृह मंत्री अमित शाह ने भी आंतरिक सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और अन्य संस्थाओं को अधिक अधिकार और संसाधन प्रदान किए हैं। ‘प्रहार’ नीति इसी सशक्तिकरण की अगली कड़ी है, जिसमें रोकथाम, खुफिया समन्वय, तकनीकी निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया को संस्थागत रूप दिया गया है।
रोकथाम पर विशेष बल
इस नीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें हमले के बाद की कार्रवाई के बजाय हमले की रोकथाम पर अधिक जोर दिया गया है। आधुनिक आतंकवाद केवल बंदूक और बम तक सीमित नहीं है; यह साइबर माध्यमों, सोशल मीडिया प्रचार, फंडिंग नेटवर्क और ‘लोन वुल्फ’ हमलों के रूप में भी सामने आता है। ‘प्रहार’ में इन उभरती चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाने का संकेत है।
यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि केंद्र सरकार केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि पूर्व-सक्रिय रणनीति अपनाना चाहती है। प्रधानमंत्री मोदी की ‘न्यू इंडिया’ की अवधारणा में सुरक्षा को विकास की आधारशिला माना गया है। यदि निवेश, उद्योग और सामाजिक स्थिरता को बनाए रखना है, तो आतंकवाद के खतरे को जड़ से समाप्त करना आवश्यक है। ‘प्रहार’ इसी व्यापक सोच का हिस्सा है।
केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय
भारत की संघीय संरचना में कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा केंद्र की जिम्मेदारी है। ऐसे में एक राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति का प्रभाव तभी होगा, जब केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल हो। गृह मंत्री अमित शाह बार-बार यह कहते रहे हैं कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई राजनीति से ऊपर उठकर लड़ी जानी चाहिए।
‘प्रहार’ के माध्यम से केंद्र सरकार संभवतः एक साझा ढांचा तैयार करना चाहती है,
जिससे राज्यों की पुलिस, केंद्रीय एजेंसियां और खुफिया तंत्र एकीकृत रूप से कार्य कर सकें। इससे सूचना-साझाकरण की प्रक्रिया तेज होगी और संभावित हमलों को समय रहते रोका जा सकेगा।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और कूटनीतिक संदेश
नीति में यह उल्लेख कि कुछ पड़ोसी देश आतंकवाद को राज्य-नीति के रूप में प्रयोग करते हैं, एक कूटनीतिक संकेत भी है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत लगातार आतंकवाद के मुद्दे को उठाता रहा है और वैश्विक सहयोग की मांग करता रहा है। ‘प्रहार’ नीति इस दिशा में भारत की प्रतिबद्धता को औपचारिक रूप देती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सहित विभिन्न वैश्विक मंचों पर आतंकवाद के विरुद्ध साझा मोर्चा बनाने की अपील की है। इस नीति के माध्यम से केंद्र सरकार यह संदेश देना चाहती है कि भारत न केवल अपने भीतर कठोर है, बल्कि वैश्विक आतंकवाद-रोधी प्रयासों में भी अग्रणी भूमिका निभाने को तैयार है।
राजनीतिक और सामाजिक आयाम
किसी भी सुरक्षा नीति का राजनीतिक प्रभाव भी होता है। ‘प्रहार’ को सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। आलोचक इसे राजनीतिक दृष्टि से भी परखेंगे, किंतु सरकार का दावा है कि यह नीति पूरी तरह राष्ट्रीय हित में है।
साथ ही, आतंकवाद को किसी धर्म या समुदाय से न जोड़ने का स्पष्ट उल्लेख सामाजिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास है। इससे यह संकेत मिलता है कि केंद्र सरकार कठोरता और समावेशिता—दोनों के संतुलन को साधना चाहती है।
‘प्रहार’ केवल आठ पृष्ठों का दस्तावेज नहीं,
बल्कि केंद्र सरकार की सुरक्षा-नीति का औपचारिक घोषणापत्र है। इसमें रोकथाम, त्वरित कार्रवाई, संतुलित प्रतिक्रिया और सामाजिक समरसता का समन्वय दिखाई देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की नेतृत्व शैली—निर्णायक, कठोर और स्पष्ट—इस नीति में प्रतिबिंबित होती है।
आतंकवाद के विरुद्ध भारत की लड़ाई लंबी और जटिल है। किंतु ‘प्रहार’ यह संकेत देता है कि केंद्र सरकार इस चुनौती का सामना केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि संगठित, रणनीतिक और दूरदर्शी दृष्टिकोण से करना चाहती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस नीति का क्रियान्वयन किस प्रकार होता है और यह देश की आंतरिक सुरक्षा को कितनी मजबूती प्रदान करता है।
- Abhijit
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