
गुजरात की राजनीति इस समय उस चौराहे पर खड़ी है जहाँ नैतिकता और सिद्धांतों की बलि चढ़ाना एक आम परंपरा बन चुकी है। हाल ही में आम आदमी पार्टी (AAP) के किसान नेता राजू करपड़ा का इस्तीफा महज एक व्यक्ति का पार्टी छोड़ना नहीं है, बल्कि यह उस गहरे राजनीतिक संकट का संकेत है जो वर्तमान में गुजरात के विपक्षी खेमे को घेरे हुए है। बोटाद के 'कडदा कांड' में 100 से अधिक दिन जेल की सलाखों के पीछे गुजारने के बाद, जमानत पर बाहर आते ही करपड़ा का पार्टी से किनारा करना कई "विस्फोटक" सवाल खड़ा करता है।
क्या गोपाल इटालिया और मनोज सोराठिया भाजपा की 'बी टीम' हैं?
राजू करपड़ा ने राजकोट में जो बयान दिए, वे आम आदमी पार्टी के उन दावों की धज्जियाँ उड़ाते हैं जिनमें वे खुद को भाजपा के एकमात्र विकल्प के रूप में पेश करते हैं। करपड़ा ने सीधा आरोप लगाया कि गोपाल इटालिया और मनोज सोराठिया जैसे शीर्ष नेता वास्तव में भाजपा की 'बी टीम' के रूप में काम कर रहे हैं। उनके अनुसार,
"जब तक इटालिया जैसे लोग पार्टी में हैं, आप कभी आगे नहीं बढ़ पाएगी।"
यह आरोप गंभीर है क्योंकि यह उस 'सेटिंग' की ओर इशारा करता है जहाँ विपक्ष के नेता सरकार के खिलाफ लड़ने का ढोंग तो करते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे उनकी डोर सत्ताधारी दल के हाथों में होती है। क्या यह महज इत्तेफाक है कि जो नेता किसानों के हक के लिए जेल गया, उसे अपनी ही पार्टी के नेतृत्व से इतनी कड़वाहट मिली कि उसने बाहर आते ही इस्तीफा देना बेहतर समझा?
भाजपा का दबाव और सरकारी तंत्र का दुरुपयोग
इस्तीफे के पीछे भाजपा का हाथ होने की चर्चाएँ भी जोरों पर हैं। गुजरात में यह कोई नई बात नहीं है कि विपक्षी नेताओं को कानूनी पचड़ों, पुलिस केसों और जेल के डर से तोड़कर अपने पाले में लाया जाए। राजू करपड़ा हाल ही में बोटाद घटना के सिलसिले में जेल से छूटे हैं। सरकारी तंत्र और पुलिस का उपयोग जिस तरह से किसान आंदोलनों को कुचलने के लिए किया गया, वह गुजरात सरकार की दमनकारी नीति को दर्शाता है।
भाजपा पर आरोप है कि वह विपक्षी नेताओं को या तो 'साम' से या 'दंड' से खामोश कर देती है। करपड़ा के मामले में भी यही डर दिखाया गया कि अगर वे पार्टी नहीं छोड़ते हैं, तो उन्हें पुराने मामलों में दोबारा फँसाया जा सकता है। यह लोकतंत्र के लिए एक काला अध्याय है जहाँ सत्ता पक्ष विपक्ष का वजूद ही खत्म कर देना चाहता है।
आम आदमी पार्टी की भूमिका पर सवाल
आम आदमी पार्टी ने गुजरात में 'परिवर्तन' का वादा किया था, लेकिन करपड़ा के आरोपों ने पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। यदि जमीन पर काम करने वाले किसान नेता यह महसूस करते हैं कि उन्हें जेल में सड़ने के लिए अकेला छोड़ दिया गया और उनके नेतृत्व ने भाजपा के साथ गुप्त समझौता कर लिया है, तो आम जनता का भरोसा टूटना स्वाभाविक है। अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम को यह जवाब देना होगा कि क्यों उनके सबसे जुझारू चेहरे एक-एक कर पार्टी छोड़ रहे हैं। क्या गुजरात 'आप' वास्तव में भाजपा से लड़ रही है या सिर्फ कांग्रेस के वोट काटकर भाजपा की राह आसान कर रही है?
'ओपरेशन लोटस'
गुजरात की भाजपा सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से सत्ता का केंद्रीकरण किया है, उसने आलोचना की गुंजाइश ही खत्म कर दी है। बोटाद की घटना में किसानों पर जिस तरह की कार्रवाई हुई, वह यह बताती है कि सरकार संवाद के बजाय डंडे के जोर पर शासन करना चाहती है। गुजरात के भाजपा नेता, जो विकास के बड़े-बड़े दावे करते हैं, वे एक छोटे से किसान आंदोलन से इतने घबरा जाते हैं कि उन्हें विपक्ष के नेताओं को तोड़ने के लिए पूरी मशीनरी लगानी पड़ती है।
खतरे में लोकतंत्र
राजू करपड़ा का यह कहना कि "हम जेल में रहने की कोशिश करते रहे लेकिन अपनों ने ही साथ नहीं दिया,"
राजनीति की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है जहाँ वफादारी की कोई कीमत नहीं है। यह घटनाक्रम यह सिद्ध करता है कि गुजरात में भाजपा इतनी शक्तिशाली हो चुकी है कि वह विपक्ष के भीतर अपने मोहरे फिट कर चुकी है।
अगर विपक्ष के नेता ही सत्ता पक्ष के इशारे पर नाचेंगे, तो जनता की आवाज कौन उठाएगा? राजू करपड़ा का इस्तीफा महज एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि गुजरात के आम आदमी और किसान के साथ हुआ एक बड़ा विश्वासघात है। अब समय आ गया है कि गुजरात की जनता इन चेहरों के पीछे के असली नकाबों को पहचाने।
- Abhijit
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