
लोकतंत्र में जब सवाल पूछने वाली ज़ुबान को नियमों की बेड़ियों से बांधा जाए और देश के पूर्व सेना प्रमुख की कलम पर सरकारी सेंसरशिप का पहरा बिठा दिया जाए, तो समझ लेना चाहिए कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
हाल ही में लोकसभा में जो हुआ, वह केवल एक किताब पर विवाद नहीं था; वह इस देश की सुरक्षा, पारदर्शिता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली पर उठे उन सवालों का गला घोंटने की कोशिश थी, जिनका जवाब देने की हिम्मत इस सरकार में नहीं है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जब पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की पुस्तक 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' (Four Stars of Destiny) के अंश पढ़ने खड़े हुए, तो सत्तापक्ष में ऐसी खलबली मची मानो किसी ने उनकी सबसे कमजोर नस पर हाथ रख दिया हो।

क्या छिपा रही है मोदी सरकार?
जनरल नरवणे की यह किताब कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। यह उस दौर का दस्तावेज़ है जब लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर हमारे जवान चीन की पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी (PLA) की आँखों में आँखें डालकर खड़े थे। राहुल गांधी ने जिस घटना का ज़िक्र किया - 31 अगस्त 2020 की रात - वह भारतीय सैन्य इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। जब चीनी टैंक कैलाश रिज की ओर बढ़ रहे थे, तब हमारे सेना प्रमुख ने सरकार से दिशा-निर्देश मांगे थे।
लेकिन राहुल गांधी का आरोप और किताब के कथित अंश एक भयावह सच्चाई की ओर इशारा करते हैं: प्रधानमंत्री ने जिम्मेदारी लेने के बजाय गेंद सेना के पाले में डाल दी और कहा - "जो उचित समझो वो करो।"
एक तरफ़ 'मजबूत नेता' की छवि गढ़ने के लिए करोड़ों का पीआर (PR) खर्च किया जाता है, और दूसरी तरफ़ संकट की घड़ी में निर्णय लेने की जिम्मेदारी से हाथ खींच लिया जाता है? क्या यही वह '56 इंच' का सीना है जिसकी चर्चा रैलियों में होती है?
भारत में प्रतिबंध, विदेश में प्रकाशन?
राहुल गांधी ने संसद परिसर में पेंगुइन द्वारा प्रकाशित उस किताब को लहराते हुए एक वाजिब सवाल पूछा - "अगर यह किताब विदेशों में मिल सकती है, वहां प्रकाशित हो सकती है, तो भारत में इस पर पाबंदी क्यों?" यह विडंबना नहीं तो और क्या है? जिस देश की सुरक्षा के लिए जनरल नरवणे ने अपना पूरा जीवन खपा दिया, उसी देश की जनता को यह जानने का हक नहीं है कि संकट के समय उनकी सरकार का रवैया क्या था? रक्षा मंत्रालय एक साल से अधिक समय से इस किताब को 'रिव्यू' के नाम पर दबाकर बैठा है। यह रिव्यू है या सच्चाई को दफन करने की साजिश?

डर का असली कारण: अग्निपथ और चीन
कहा जा रहा है कि इस किताब में न केवल चीन के साथ हुए सीमा विवाद, बल्कि 'अग्निपथ योजना' को लेकर भी चौंकाने वाले खुलासे हैं। क्या सरकार को डर है कि अगर पूर्व सेना प्रमुख की बातें सार्वजनिक हुईं, तो उनकी 'शॉर्ट-कट' वाली सैन्य भर्ती योजना की पोल खुल जाएगी? क्या सरकार को डर है कि "कोई घुसा नहीं है" वाला नैरेटिव ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा?
संसद में शोर मचाकर, राहुल गांधी को रोककर या सदन की कार्यवाही से शब्दों को हटवाकर आप शोर तो कम कर सकते हैं, लेकिन इतिहास को नहीं बदल सकते। जनरल नरवणे ने खुद कहा था कि उनकी किताब "पुरानी शराब की तरह मैच्योर हो रही है।" सरकार जितना इसे दबाएगी, इसकी सच्चाई उतनी ही तीखी होकर बाहर आएगी।
नरेंद्र मोदी सरकार को समझना चाहिए कि लोकतंत्र में सूचना पर ताला लगाकर राज नहीं किया जा सकता। अगर प्रधानमंत्री में वाकई हिम्मत है, तो जैसा कि राहुल गांधी ने कहा, उन्हें लोकसभा में आकर वह किताब स्वीकार करनी चाहिए और देश को बताना चाहिए कि आखिर उस रात की पूरी सच्चाई क्या थी।
जब रक्षक ही तथ्यों के भक्षक बन जाएं, तो विपक्ष का धर्म है कि वह आईना दिखाता रहे। राहुल गांधी ने वही आईना दिखाया है, और शायद इसीलिए सत्ता के गलियारों में आज इतनी बेचैनी है।
सच्चाई को कब तक कैद रखोगे साहब? पंख तो वह फैला चुकी है।
- Abhijit