Friday, March 20, 2026

सत्ता का अहंकार या प्रशासनिक विफलता: मंत्रियों की नासमझी का ठीकरा अफसरों पर क्यों?

(फ़ाइल फ़ोटो)

गुजरात विधानसभा का बजट सत्र वर्तमान में चल रहा है, लेकिन सदन के भीतर जो दृश्य उभर कर रहे हैं, वे राज्य की शासन व्यवस्था पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करते हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल द्वारा अपने सचिवों और आईएएस अधिकारियों को दी गई 'फटकार' ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य का राजनीतिक नेतृत्व अपनी विफलता का ठीकरा प्रशासनिक अधिकारियों के सिर फोड़ने की पुरानी नीति पर चल पड़ा है।

मुख्यमंत्री का यह कहना कि सचिव मंत्रियों को उप-प्रश्नों के लिए पर्याप्त जानकारी और सांख्यिकीय डेटा प्रदान नहीं कर रहे हैं, हास्यास्पद से अधिक चिंताजनक है। यह तर्क केवल प्रशासनिक ढांचे को कमजोर करता है, बल्कि यह उन मंत्रियों की बौद्धिक और प्रशासनिक अक्षमता को भी उजागर करता है जो बिना 'पर्ची' के सदन में अपना मुंह खोलने की स्थिति में नहीं हैं।

मंत्रियों की 'पर्ची' वाली राजनीति

विधानसभा में जब विपक्ष कोई सवाल पूछता है, तो मंत्री का कर्तव्य होता है कि वह अपने विभाग की नीतियों और कार्यप्रणाली से पूरी तरह अवगत हो। लेकिन गुजरात के वर्तमान मंत्रिमंडल की स्थिति यह है कि मंत्री पूरी तरह से नौकरशाही के रहमों-करम पर टिके हैं। मुख्यमंत्री की नाराजगी का मुख्य कारण यह था कि अनुपूरक प्रश्नों के दौरान मंत्री 'कन्फ्यूज' नजर आए और सरकार का पक्ष कमजोर दिखा।

सवाल यह है कि क्या एक मंत्री को सदन में जाने से पहले होमवर्क करने की आवश्यकता नहीं है? क्या मंत्री केवल रिबन काटने और आधिकारिक सुविधाओं का आनंद लेने के लिए हैं? यदि मंत्री अपने विभाग के आंकड़ों से परिचित नहीं हैं, तो इसके लिए सचिव कैसे जिम्मेदार हो सकते हैं? सूचना प्रदान करना सचिव का काम है, लेकिन उस सूचना को समझना और उसे सदन में आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करना मंत्री का राजनीतिक दायित्व है।

विपक्ष की कम संख्या और सरकार का डर

यह विडंबना ही है कि गुजरात विधानसभा में विपक्ष के पास उंगलियों पर गिनने लायक विधायक हैं। इसके बावजूद, मुख्यमंत्री यह शिकायत कर रहे हैं कि सरकार की छवि 'कमजोर' दिख रही है। यदि मुट्ठी भर विपक्षी विधायक सरकार को पसीने ला रहे हैं, तो यह अधिकारियों की 'निष्क्रियता' नहीं, बल्कि मंत्रियों की 'बौद्धिक दरिद्रता' है।

मुख्यमंत्री का यह तर्क कि "मंत्रिमंडल में नए मंत्री हैं और यह उनका पहला बजट सत्र है," किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है। लोकतंत्र में जब आप मंत्री पद की शपथ लेते हैं, तो आप जवाबदेही की भी शपथ लेते हैं। 'नया होना' कोई योग्यता नहीं है और ही यह अक्षमता का लाइसेंस है। क्या इन मंत्रियों को कैबिनेट में शामिल करने से पहले उनकी योग्यता की जांच नहीं की गई थी? क्या जनसेवा और विधायी कार्य केवल 'सीखने-सिखाने' का खेल है?

नौकरशाही को बलि का बकरा बनाना

बुधवार को कैबिनेट बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने जिस तरह से सचिवों की क्लास ली, वह प्रशासनिक मनोबल को गिराने वाला कदम है। अधिकारियों की अनुपस्थिति पर नाराजगी जताना एक बात है, लेकिन मंत्रियों की अज्ञानता के लिए अधिकारियों को दोषी ठहराना सरासर गलत है।

एक आईएएस अधिकारी वर्षों की तपस्या और अनुभव के बाद उस पद तक पहुँचता है। वह नीतियों का मसौदा तैयार करता है, आंकड़े जुटाता है और शासन का पहिया चलाता है। लेकिन अगर राजनीतिक नेतृत्व में उन आंकड़ों को जनता और सदन के सामने रखने का साहस या क्षमता नहीं है, तो दोष सिस्टम का नहीं, बल्कि नेतृत्व का है। ऐसा लगता है कि भूपेंद्र पटेल सरकार ने 'अधिकारियों पर शासन' करने के बजाय 'अधिकारियों के पीछे छिपने' की कला सीख ली है।

शासन में 'अकर्मण्यता' का असली केंद्र

मुख्यमंत्री का कहना है कि अधिकारियों की अकर्मण्यता के कारण सरकार की छवि खराब हो रही है। लेकिन हकीकत इसके उलट है। जब मंत्रियों को पता होता है कि उनकी हर गलती का दोष किसी सचिव पर डाल दिया जाएगा, तो वे खुद को अपडेट रखने की जहमत क्यों उठाएंगे?

यह पहली बार नहीं है जब गुजरात में 'शक्तिशाली' मुख्यमंत्री के नीचे 'कमजोर' मंत्रियों की फौज खड़ी कर दी गई है। समस्या यह है कि जब सत्ता का केंद्रीकरण एक ही जगह होता है, तो बाकी मंत्री केवल रबर स्टैंप बनकर रह जाते हैं। आज स्थिति यह है कि मंत्रियों के पास तो अपने विभाग पर पकड़ है और ही उनमें विपक्ष के सवालों का सामना करने का साहस।

क्या यही है 'गुजरात मॉडल'?

सदन में सरकार का पक्ष कमजोर दिखना इस बात का प्रमाण है कि गुजरात मॉडल के चमकदार विज्ञापनों के पीछे की प्रशासनिक हकीकत खोखली होती जा रही है। यदि मुख्यमंत्री को लगता है कि उनके मंत्रियों को सचिवों द्वारा पर्याप्त जानकारी नहीं दी जा रही, तो उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि क्या उनके मंत्री उस जानकारी को ग्रहण करने की क्षमता रखते भी हैं या नहीं?

प्रेस में इस खबर को लीक करना कि मुख्यमंत्री ने सचिवों को फटकार लगाई, दरअसल एक 'पीआर स्टंट' है। इसके जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई है कि मुख्यमंत्री तो बहुत सक्रिय हैं, लेकिन नीचे के अधिकारी काम नहीं कर रहे। यह अपनी टीम की विफलता को छिपाने का सबसे पुराना और घिसा-पिटा तरीका है।

नेतृत्व को आईना देखने की जरूरत

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को यह समझना होगा कि एक कप्तान उतना ही अच्छा होता है जितनी उसकी टीम। यदि आपके मंत्री सदन में चुप हो जाते हैं या भ्रमित होते हैं, तो यह आपकी चयन प्रक्रिया और आपके नेतृत्व पर सवाल है। नौकरशाहों को डांटना आसान है क्योंकि वे पलटकर जवाब नहीं दे सकते, लेकिन अपनी राजनीतिक टीम की अक्षमता को स्वीकार करना कठिन है।

राज्य की जनता मंत्रियों के वेतन और भत्तों के लिए टैक्स देती है, कि उन्हें सदन में 'कन्फ्यूज' होने के लिए। यदि नए मंत्रियों को काम नहीं आता, तो उन्हें प्रशिक्षण दें या फिर सक्षम लोगों को जिम्मेदारी सौंपें। आईएएस अधिकारियों को अपनी ढाल बनाकर अपनी कमियों को छिपाना बंद करें। बजट सत्र में सरकार की 'कमजोरी' के लिए अधिकारी नहीं, बल्कि वे मंत्री जिम्मेदार हैं जिन्हें अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं है।

- Abhijit

20/03/2026