
गुजरात का कच्छ जिला, जो अपनी भौगोलिक विशालता और सीमावर्ती संवेदनशीलता के लिए जाना जाता है, आज एक प्रशासनिक संकट के मुहाने पर खड़ा है। आरोप है कि मुख्य जिला स्वास्थ्य अधिकारी (CDHO) ने नियम-कायदों को ताक पर रखकर 500 से अधिक स्वास्थ्य कर्मचारियों के थोकबंद तबादले कर दिए हैं। यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ मानी जाने वाली 'कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर्स' (CHOs) के खिलाफ एक सोची-समझी साजिश प्रतीत होती है। इस पूरे प्रकरण में मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की चुप्पी और स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रफुल्ल पानशेरिया की निष्क्रियता शासन की संवेदनहीनता को उजागर करती है।
प्रशासनिक अदूरदर्शिता या राजनीतिक प्रतिशोध?
कच्छ जैसे कठिन भौगोलिक परिवेश वाले जिले में, जहां एक गांव से दूसरे गांव की दूरी मीलों में होती है, वहां एक साथ 500 कर्मचारियों का तबादला करना किसी आत्मघाती कदम से कम नहीं है। मुख्य जिला स्वास्थ्य अधिकारी पर आरोप है कि उन्होंने स्थानांतरण नीति के बुनियादी सिद्धांतों की अनदेखी की है।
सबसे अधिक अन्याय 'कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर्स' के साथ हुआ है। इस कैडर के कर्मचारियों का आरोप है कि उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया गया है। उनकी जायज मांगों और स्थानांतरण के आवेदनों को 'राजनीतिक द्वेष' के चलते कूड़ेदान में डाल दिया गया। आखिर क्यों एक विशिष्ट कैडर को निशाना बनाया जा रहा है? क्या यह शासन की विफलता नहीं है कि कर्मचारी अपने ही विभाग में सुरक्षित महसूस करने के बजाय 'मानसिक, आर्थिक और शारीरिक' प्रताड़ना झेलने को मजबूर हैं?
स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री की मौन स्वीकृति
गुजरात मॉडल का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा सरकार के मुखिया, मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को यह समझना होगा कि कच्छ के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं किसी वीआईपी अस्पताल के भरोसे नहीं, बल्कि इन जमीनी स्तर के कर्मचारियों के भरोसे चलती हैं। स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रफुल्ल पानशेरिया की भूमिका भी इस मामले में संदेहास्पद है। जब जिले के निर्वाचित प्रतिनिधियों और सत्तारूढ़ दल के शीर्ष पदाधिकारियों ने इन तबादलों पर पुनर्विचार करने की सिफारिश की, तो उसे गोलमोल जवाब देकर टाल दिया गया।
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या मुख्य जिला स्वास्थ्य अधिकारी इतने शक्तिशाली हो गए हैं कि वे मुख्यमंत्री और मंत्रियों के निर्देशों की भी अनदेखी कर रहे हैं? या फिर यह सब गांधीनगर के इशारे पर हो रहा है ताकि उन कर्मचारियों को 'सबक'
सिखाया जा सके जो राजनीतिक आकाओं की जी-हुजूरी नहीं करते?
CHOs: स्वास्थ्य सेवाओं का आधार स्तंभ और उनके साथ छल

कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर्स (CHOs) ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहली कड़ी होते हैं। वे न केवल बीमारियों के खिलाफ ढाल बनते हैं, बल्कि जन-जागरूकता फैलाने में भी अग्रणी भूमिका निभाते हैं। हैरानी की बात यह है कि उन CHOs को भी नहीं बख्शा गया जिन्हें उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए 'पुरस्कार' मिल चुके हैं।
एक तरफ सरकार 'सम्मान' देती है और दूसरी तरफ उन्हीं काबिल अधिकारियों का बिना किसी ठोस कारण के दूर-दराज के इलाकों में तबादला कर दिया जाता है। यह प्रशासन की दोहरी मानसिकता को दर्शाता है। इससे भी अधिक शर्मनाक बात यह है कि ये कर्मचारी पिछले तीन महीनों से बिना वेतन के काम कर रहे हैं। जिस कर्मचारी के घर में चूल्हा जलने के लाले पड़े हों, उससे आप निष्पक्ष सेवा की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? जिला स्वास्थ्य तंत्र की यह घोर लापरवाही मानवाधिकारों का भी उल्लंघन है।
राजनीतिक 'गुलामी' और प्रशासनिक अराजकता
आरोप है कि कनिष्ठ कर्मचारियों के तबादले बिना किसी मापदंड के 'अंधाधुंध' तरीके से किए गए हैं। पारदर्शी नीति के अभाव में भ्रष्टाचार की बू आती है। जब निर्वाचित प्रतिनिधियों की सिफारिशों को भी रद्दी का टुकड़ा समझा जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र में 'अधिकारी तंत्र' हावी हो चुका है।
अखिल भारतीय सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी संघ (AICHOA), गुजरात ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया है। संघ ने चेतावनी दी है कि यदि इन अन्यायी तबादलों को रद्द नहीं किया गया और वेतन का भुगतान तुरंत नहीं हुआ, तो वे कानूनी कार्रवाई और उग्र आंदोलन के लिए विवश होंगे।
कच्छ जिला स्वास्थ्य विभाग में जो कुछ भी हो रहा है, वह सुशासन के दावों पर एक बड़ा धब्बा है। मुख्य जिला स्वास्थ्य अधिकारी की मनमानी, स्वास्थ्य मंत्री की अनदेखी और मुख्यमंत्री की उदासीनता ने कच्छ की स्वास्थ्य व्यवस्था को वेंटिलेटर पर ला खड़ा किया है।
क्या भूपेंद्र पटेल सरकार इस 'राजनीतिक प्रतिशोध' की राजनीति को बंद करेगी? क्या प्रफुल्ल पानशेरिया अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए इन तबादलों की निष्पक्ष जांच कराएंगे? कच्छ की जनता और स्वास्थ्य कर्मचारी जवाब मांग रहे हैं। यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में स्वास्थ्य सेवाओं का जो पतन होगा, उसकी पूरी जिम्मेदारी वर्तमान सरकार और जिला स्वास्थ्य अधिकारी की होगी।
कठोर शब्द, लेकिन सत्य: स्वास्थ्य विभाग में 'सर्जरी' की जरूरत तबादलों की नहीं, बल्कि उस भ्रष्ट और अहंकारी मानसिकता की है जो कर्मचारियों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रही है।
- Abhijit