रविवार, 22 फरवरी का दिन भारतीय क्रिकेट इतिहास के उन काले पन्नों में दर्ज हो गया है, जिसे कोई भी प्रशंसक याद नहीं रखना चाहेगा। अहमदाबाद के भव्य नरेंद्र मोदी स्टेडियम में, जहाँ एक लाख से अधिक दर्शकों का हुजूम टीम इंडिया के समर्थन में उमड़ा था, वहां टीम को दक्षिण अफ्रीका के हाथों 76 रनों की शर्मनाक शिकस्त झेलनी पड़ी। लेकिन यह हार केवल रनों का अंतर नहीं है, बल्कि यह कप्तान सूर्यकुमार यादव की रणनीतिक विफलता और मुख्य कोच गौतम गंभीर के 'मैच-अप' के प्रति पागलपन की एक दर्दनाक दास्तां है।
उप-कप्तान का अपमान: अक्षर पटेल को बाहर करने का क्या तुक था?
इस मैच की सबसे बड़ी और हैरान करने वाली बात टीम का चयन थी। अपने घरेलू मैदान पर खेल रहे टीम इंडिया के उप-कप्तान अक्षर पटेल को अंतिम एकादश (Playing XI) से बाहर रखना समझ से परे है। अक्षर पटेल केवल एक स्पिनर नहीं हैं, बल्कि वह इस समय दुनिया के बेहतरीन टी20 ऑलराउंडरों में से एक हैं। उनकी जगह वॉशिंगटन सुंदर को खिलाया गया। कप्तान सूर्यकुमार यादव ने टॉस के समय इसे एक 'सामरिक फैसला' (Tactical Decision) बताया, लेकिन मैदान पर यह फैसला पूरी तरह से बैकफायर कर गया।
गंभीर और सूर्या का तर्क था कि दक्षिण अफ्रीकी टीम में बाएं हाथ के बल्लेबाज (क्विंटन डी कॉक और डेविड मिलर) हैं, इसलिए ऑफ-स्पिनर सुंदर बेहतर विकल्प होंगे। लेकिन क्रिकेट केवल कागज पर 'मैच-अप' देखकर नहीं खेला जाता। अक्षर पटेल का हालिया फॉर्म और घरेलू परिस्थितियों का उनका ज्ञान किसी भी मैच-अप से ऊपर था। नतीजा यह हुआ कि सुंदर ने न तो गेंद से कोई प्रभाव छोड़ा (2 ओवर में 17 रन) और न ही बल्ले से (11 रन)। क्या एक उप-कप्तान के साथ ऐसा व्यवहार टीम के संतुलन और मनोबल के लिए सही है?
गौतम गंभीर का रणनीतिक अहंकार
गौतम गंभीर को जब कोच बनाया गया था, तब उनकी आक्रामकता को उनकी ताकत बताया गया था। लेकिन अहमदाबाद में यह आक्रामकता 'अहंकार' में बदली हुई नजर आई। कुलदीप यादव जैसे विकेट लेने वाले गेंदबाज को बेंच पर बिठाकर वरुण चक्रवर्ती पर भरोसा जताना और बार-बार सुंदर जैसे प्रयोग करना यह दर्शाता है कि टीम प्रबंधन जमीनी हकीकत से दूर आंकड़ों की दुनिया में जी रहा है।
जब डेविड मिलर और डेवाल्ड ब्रेविस खेल रहे थे, तब भारतीय गेंदबाज दिशाहीन नजर आए। मिलर ने 63 रनों की पारी खेलकर भारतीय गेंदबाजी की धज्जियां उड़ा दीं। यहाँ गंभीर की रणनीति यह थी कि हम 'बैटिंग डेप्थ' बढ़ाएंगे, लेकिन जब लक्ष्य 188 रनों का हो, तो आपको गहराई नहीं, बल्कि एक ठोस शुरुआत और विकेट लेने वाले गेंदबाजों की जरूरत होती है।
सूर्यकुमार यादव: कप्तानी में 'जीरो' साबित हुए 'मिस्टर 360'
बल्लेबाज के तौर पर सूर्या शानदार हो सकते हैं, लेकिन कप्तान के रूप में उनकी रणनीतियां औसत दर्जे की रहीं। 188 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारतीय टीम महज 111 रनों पर ढेर हो गई। सूर्या खुद जिम्मेदारी लेने में विफल रहे और केवल 18 रन बनाकर पवेलियन लौट गए।
उनकी कप्तानी की सबसे बड़ी खामी गेंदबाजों का रोटेशन था। जब दक्षिण अफ्रीका के विकेट गिर रहे थे, तब उन्होंने दबाव बनाने के बजाय रक्षात्मक फील्डिंग लगाई। सुंदर को चुनने के बाद भी उन्होंने उनसे पूरे ओवर नहीं फिंकवाए, जिससे साबित होता है कि उन्हें खुद अपनी पसंद पर भरोसा नहीं था। अर्शदीप और बुमराह ने शुरुआती सफलता दिलाई थी, लेकिन बीच के ओवरों में सूर्या और गंभीर की जोड़ी ने मैच दक्षिण अफ्रीका की झोली में डाल दिया।
'मैच-अप' बनाम 'मैच-विनर'
आधुनिक क्रिकेट में 'मैच-अप' एक अहम हिस्सा है, लेकिन यह कभी भी 'मैच-विनर' खिलाड़ियों की कीमत पर नहीं होना चाहिए। अक्षर पटेल एक मैच-विनर हैं, जो मुश्किल परिस्थितियों में मैच का रुख पलट सकते हैं। उन्हें उनके घर में ही बाहर बिठाना न केवल रणनीतिक भूल थी, बल्कि यह उन पर अविश्वास की पराकाष्ठा थी। पूर्व खिलाड़ियों ने भी इस फैसले की कड़ी आलोचना की है।
अहमदाबाद की यह हार टीम इंडिया के लिए एक 'वेक-अप कॉल' होनी चाहिए। अगर गौतम गंभीर और सूर्यकुमार यादव अपनी गलतियों से नहीं सीखते और व्यक्तिगत पसंद-नापसंद या किताबी आंकड़ों के आधार पर टीम चुनते रहे, तो टी20 विश्व कप का यह सफर सुपर-8 में ही खत्म हो सकता है। भारतीय प्रशंसकों को जीत चाहिए, प्रयोग नहीं। अक्षर पटेल जैसे खिलाड़ियों का अपमान और सुंदर जैसे खिलाड़ियों पर अनावश्यक भरोसा टीम को विनाश की ओर ले जा रहा है।
अब समय आ गया है कि बीसीसीआई और टीम प्रबंधन इस हार की समीक्षा करे और 'अति-चतुराई' छोड़कर सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध खिलाड़ियों को मैदान पर उतारे।
- Abhijit