असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में चुनावी रणभेरी बज चुकी है। लोकतंत्र के इस उत्सव में नेताओं का जनता के बीच जाना एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन जब देश के प्रधानमंत्री हाथ में टोकरी लिए चाय की पत्तियां तोड़ते हुए कैमरे के सामने पोज देते हैं, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि यह 'जन-कनेक्ट' है या महज एक सधा हुआ 'इलेक्शन इवेंट'?
हाल ही में असम के डिब्रूगढ़ जिले के चाय बागानों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जो रूप दिखा, वह उनके पिछले दस सालों के शासन के ढर्रे से काफी मेल खाता है। चुनावी तारीखों के ऐलान के साथ ही प्रधानमंत्री को अचानक उन कामगारों और महिलाओं की याद आई, जिनकी सुध शायद उन्होंने पिछले पांच सालों में तब नहीं ली थी जब वे अपनी न्यूनतम मजदूरी और बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे।
चाय, चिप्स और जुमलों की राजनीति
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में एक नया नारा दिया - "पहले असम चाय के लिए जाना जाता था, अब चाय और चिप्स (Semiconductor
Chips) दोनों के लिए जाना जाएगा।" सुनने में यह विकास की एक बहुत ही आकर्षक तस्वीर पेश करता है। लेकिन क्या असम के उन लाखों चाय श्रमिकों के लिए, जो आज भी 250 रुपये की दैनिक मजदूरी के लिए जूझ रहे हैं, ये 'हाई-टेक चिप्स' उनके घर का चूल्हा जला पाएंगे?
विडंबना देखिए, प्रधानमंत्री कहते हैं कि टीवी, फ्रिज और मोबाइल अब 'असम चिप्स' से चलेंगे। लेकिन क्या उन्होंने उन श्रमिकों की आंखों में झाँक कर देखा जो आज भी एक अदद पक्के मकान, स्वच्छ पेयजल और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं? विकास की बड़ी-बड़ी बातें अक्सर उन बुनियादी समस्याओं को ढंक देती हैं जो ज़मीनी स्तर पर जनता झेल रही है। 'डिजिटल इंडिया' और 'सेमीकंडक्टर हब' के शोर में चाय बागानों की उन महिलाओं की सिसकियां दब जाती हैं, जिनके साथ प्रधानमंत्री आज सेल्फी ले रहे थे।
आलोचना बनाम संवाद: राहुल गांधी और मोदी का अंतर
अक्सर राजनीति में तुलना अपरिहार्य हो जाती है। हाल ही में हमने देखा कि हरियाणा के खेतों में राहुल गांधी ने किसानों के साथ धान की रोपाई की। विपक्ष इसे राहुल की 'ज़मीनी सादगी' कहता है, जबकि सत्ता पक्ष इसे 'पॉलिटिकल ड्रामा'। लेकिन यहाँ एक बुनियादी फर्क को समझना होगा।
राहुल गांधी जब लोगों से मिलते हैं, तो वे अक्सर सुनते ज्यादा हैं और बोलते कम हैं। वे समस्याओं को समझने और उन पर संवाद करने की कोशिश करते हैं। इसके विपरीत, प्रधानमंत्री मोदी जब भी जनता के बीच जाते हैं, तो वह संवाद कम और 'एकतरफा प्रवचन' ज्यादा होता है। असम के दौरे पर भी उन्होंने वही किया जो वे हमेशा करते आए हैं - विपक्ष पर हमला।
डिब्रूगढ़ के उन्हीं चाय बागानों की शांति के बीच, जहाँ श्रमिक अपनी चुप्पी में अपनी व्यथा समेटे हुए थे, प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को 'हार का शतक' बनाने की चुनौती दे डाली। सवाल यह है कि क्या चुनाव केवल एक-दूसरे को नीचा दिखाने और प्रतिद्वंद्वियों को चुनौती देने का मंच है? क्या असम के मतदाता
प्रधानमंत्री से यह सुनने नहीं आए थे कि उनके जीवन स्तर को सुधारने के लिए सरकार ने पिछले दस सालों में क्या ठोस कदम उठाए हैं?
'राजकुमार' और 'अहंकार' के बीच फंसी राजनीति
प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर निशाना साधते हुए उन्हें 'राजकुमार' कहा और उनके 'हार के शतक' की भविष्यवाणी की। यह भाषा एक प्रधानमंत्री की गरिमा के अनुकूल है या नहीं, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन यह निश्चित रूप से उनकी असुरक्षा को दर्शाता है।
जब मोदी जी कहते हैं कि "बीजेपी-एनडीए हैट्रिक लगाएगी", तो वे लोकतंत्र में जनता के फैसले को पहले से ही 'टेकन फॉर ग्रांटेड' मान लेते हैं। यह आत्मविश्वास है या सत्ता का अहंकार? दूसरी ओर, विपक्ष के नेताओं पर लगातार व्यक्तिगत हमले करना यह बताता है कि सरकार के पास शायद गिनाने के लिए उतने काम नहीं हैं, जितने विपक्ष को कोसने के लिए शब्द।
क्या सेल्फी से बदल जाएगी असम की तकदीर?
चाय की पत्तियां तोड़ती महिलाओं के साथ प्रधानमंत्री की सेल्फी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। उनके समर्थक इसे एक ऐतिहासिक क्षण बता रहे हैं। लेकिन याद रखिए, सेल्फी से पेट नहीं भरता और न ही खोखले नारों से भविष्य सुरक्षित होता है।
असम की जनता आज नागरिकता (NRC/CAA), भूमि अधिकार, बेरोजगारी और महंगाई जैसे गंभीर मुद्दों से जूझ रही है। चाय बागान के मजदूरों की स्थिति आज भी औपनिवेशिक काल जैसी ही बनी हुई है। उन्हें केवल 'वोट बैंक' के रूप में देखना और चुनाव के दिन उनके साथ फोटो खिंचवाना, उनके संघर्षों का अपमान है।
असम का चुनाव केवल एक 'हैट्रिक' या 'शतक' का खेल नहीं है। यह उन लाखों लोगों की उम्मीदों का सवाल है जो ब्रह्मपुत्र के किनारे बेहतर जीवन का सपना देख रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी को यह समझना होगा कि विकास केवल 'चिप्स' और 'सेमीकंडक्टर' की फैक्ट्री लगाने से नहीं आता,
बल्कि उन हाथों को मजबूत करने से आता है जो चाय की पत्तियां तोड़ते हैं।
विपक्ष की आलोचना करना और चुनावी रैलियों में हुंकार भरना आसान है, लेकिन मुश्किल है उस जनता के सवालों का सामना करना जो कैमरे की चकाचौंध के पीछे खड़ी है। असम इस बार केवल सेल्फी नहीं, बल्कि अपने अधिकारों का हिसाब माँगेगा।
- Abhijit