आजकल दिल्ली और वाशिंगटन के गलियारों में जिस 'ऐतिहासिक' व्यापार समझौते का ढोल पीटा जा रहा है, वह वास्तव में भारत की दशकों पुरानी 'रणनीतिक स्वायत्तता' की अंत्येष्टि का दस्तावेज़ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच हुई यह तथाकथित 'डील', दोस्ती के नाम पर भारत के राष्ट्रीय हितों का वह सौदा है, जिसकी कीमत हमारी आने वाली पीढ़ियां चुकाएंगी।
ट्रम्प की 'व्यापारिक दादागिरी' और मोदी का मौन
डोनाल्ड ट्रम्प कभी 'मित्र' नहीं रहे, वे हमेशा एक 'कठोर सौदेबाज' रहे हैं। उन्होंने पहले भारतीय सामानों पर 50% तक का दमनकारी टैरिफ थोपा और फिर उसे 18% करने का 'एहसान' दिखाकर भारत से वह सब छीन लिया जो हमारी विदेश नीति की रीढ़ था। इस पूरी प्रक्रिया में प्रधानमंत्री मोदी का 'मजबूत नेतृत्व' कहीं दिखाई नहीं दिया। जिस 'मेक इन इंडिया' का नारा दिया गया था, वह अब 'बाय अमेरिकन' (Buy American) के चरणों में नतमस्तक है।
रूस से किनारा: एक रणनीतिक भूल
इस समझौते की सबसे आत्मघाती शर्त है—रूस से तेल की खरीद पूरी तरह बंद करना। रूस हमारा वह परखा हुआ मित्र है जिसने सबसे कठिन समय में भारत का साथ दिया। अमेरिका के दबाव में आकर अपने सबसे भरोसेमंद साथी को छोड़ना न केवल कूटनीतिक विश्वासघात है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ी भूल भी है। क्या हम भूल गए कि जब पश्चिम ने हमें ठेंगा दिखाया था, तब रूसी तेल ही हमारी अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहा था? अब हम $500 बिलियन के अमेरिकी ऊर्जा और कोयले के बंधक बन चुके हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर घातक प्रहार
सरकार इस सौदे को निर्यातकों के लिए राहत बता रही है, लेकिन हकीकत इसके उलट है:
- किसानों की बर्बादी: कृषि उत्पादों पर टैरिफ जीरो करने का मतलब है—अमेरिकी सब्सिडी वाले सस्ते उत्पादों से भारतीय बाजारों को पाट देना। इससे हमारे छोटे किसान पूरी तरह तबाह हो जाएंगे।
- उद्योगों पर संकट: स्टील और एल्युमिनियम जैसे क्षेत्रों पर अभी भी भारी शुल्क लगा हुआ है। सरकार ने कपड़ा और चमड़ा उद्योग को थोड़ी राहत देने के बदले भारत के विशाल बाजार की चाबी बिना किसी शर्त के अमेरिकी कॉर्पोरेट्स को सौंप दी है।
- संप्रभुता का हनन: क्या भारत अब अपनी विदेश नीति वाशिंगटन के 'ट्रुथ सोशल' (Truth Social) पोस्ट के आधार पर तय करेगा?
दुनिया की नजरों में भारत का गिरता कद
इस सौदे ने वैश्विक मंच पर भारत की छवि को एक 'पिछलग्गू राष्ट्र'
(Satellite State) जैसी बना दी है।
- ब्रिक्स
में अविश्वास: रूस और चीन के साथ हमारे संबंधों में जो दरार आएगी, उसे भरना नामुमकिन होगा।
- ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: भारत हमेशा विकासशील देशों की आवाज रहा है। लेकिन जब हम खुद अमेरिकी हितों के सामने घुटने टेक देंगे, तो दुनिया का कोई भी देश हम पर भरोसा नहीं करेगा।
यह समझौता 'लेन-देन' का नहीं, बल्कि 'एकतरफा समर्पण' का है। डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति को सफलतापूर्वक लागू किया, जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के हितों को 'फोटो-ऑप' और व्यक्तिगत केमिस्ट्री की वेदी पर चढ़ा दिया।
इतिहास गवाह है कि जो राष्ट्र अपनी स्वायत्तता का सौदा करते हैं, वे अंततः अपनी पहचान भी खो देते हैं। आज हम टैरिफ में 7% की कटौती पर जश्न मना रहे हैं, लेकिन हम यह नहीं देख पा रहे कि हमने अपनी विदेशी नीति की आत्मा और अपने किसानों का भविष्य दांव पर लगा दिया है।
सावधान भारत, यह दोस्ती नहीं, गुलामी की नई इबारत है!
- Abhijit