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| (फोटो और वीडियो सौजन्य: गुजरात कांग्रेस (@INCGujarat)) |
भारत का इतिहास गवाह है कि इस देश की मिट्टी, जल और जंगल के असली संरक्षक आदिवासी रहे हैं। लेकिन आज 21वीं सदी के भारत में, विशेषकर गुजरात की धरती पर, आदिवासियों के अस्तित्व और उनकी पहचान पर एक गहरा संकट मंडरा रहा है। वडोदरा में आयोजित 'आदिवासी अधिकार संविधान सम्मेलन' में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जिस प्रखरता से इस मुद्दे को उठाया, उसने भाजपा और आरएसएस के वैचारिक खोखलेपन को पूरी तरह उजागर कर दिया है।
'आदिवासी' और 'वनवासी': शब्दों का मायाजाल और पहचान की चोरी
राहुल गांधी ने बहुत सटीक ढंग से समझाया कि 'आदिवासी' शब्द का अर्थ है - वह जो इस देश का मूल मालिक है। अगर हम 5,000 साल पीछे मुड़कर देखें, तो यह पूरी ज़मीन, ये तमाम प्राकृतिक संसाधन आदिवासियों के थे। लेकिन आरएसएस और भाजपा ने सोची-समझी रणनीति के तहत इनके लिए 'वनवासी' शब्द गढ़ा है।
'वनवासी' का सीधा अर्थ है - वह जो केवल जंगल में रहता है। यह शब्द आदिवासियों के ऐतिहासिक अधिकारों को नकारने का एक षड्यंत्र है। जब आप किसी को वनवासी कहते हैं, तो आप उसे उसके मूल अधिकारों, उसकी ज़मीन की मिल्कियत और उसकी ऐतिहासिक विरासत से बेदखल कर देते हैं। भाजपा की विचारधारा के अनुसार, आदिवासी इस देश के मालिक नहीं, बल्कि महज़ एक ऐसे समूह हैं जिन्हें 'मुख्यधारा' में लाने के नाम पर उनके हक छीने जा सकते हैं। राहुल गांधी ने सही कहा, "वनवासी होने का मतलब है कि आप कुछ भी नहीं हैं।" यह आदिवासियों के आत्म-सम्मान पर सीधा प्रहार है।
नरेंद्र मोदी और गुजरात की 'डबल इंजन' सरकार की विफलता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर 'आदिवासी कल्याण' की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट है। गुजरात, जो मोदी जी का गृह राज्य है और जहाँ अब भूपेंद्र पटेल की सरकार है, वहाँ आदिवासियों की स्थिति दयनीय होती जा रही है। यह तथाकथित 'डबल इंजन' की सरकार वास्तव में आदिवासियों के अधिकारों को कुचलने वाला एक दमनकारी तंत्र बन गई है।
पिछले दो दशकों में गुजरात में विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी पैतृक ज़मीन से विस्थापित किया गया है। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी जैसी परियोजनाओं के इर्द-गिर्द बसे आदिवासी गांवों की स्थिति देखिए—वहाँ के स्थानीय लोगों को पर्यटन और सौंदर्यीकरण के नाम पर अपनी ज़मीन छोड़ने को मजबूर किया गया। क्या यही है मोदी जी का 'सबका साथ, सबका विकास'? हकीकत यह है कि यह सरकार केवल चंद उद्योगपति मित्रों के हितों को साधने के लिए आदिवासियों के जंगलों को कॉर्पोरेट घरानों को सौंप रही है।
जल-जंगल-ज़मीन पर कॉर्पोरेट का कब्ज़ा
राहुल गांधी के आरोपों ने भाजपा सरकार की उस दुखती रग पर हाथ रखा है, जिसे वे छिपाना चाहते हैं। गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में खनन परियोजनाओं और औद्योगिक गलियारों के लिए वनाधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। भूपेंद्र पटेल की सरकार ने ग्राम सभाओं की अनुमति के बिना ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रियाओं को तेज़ कर दिया है।
आदिवासी अधिकारों के लिए संवैधानिक सुरक्षा कवच होने के बावजूद, गुजरात में पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों को लागू करने में भारी उदासीनता दिखाई जाती है। 'डबल इंजन' की ताकत का इस्तेमाल आदिवासियों को सशक्त बनाने के बजाय उन्हें उनकी जड़ों से काटने के लिए किया जा रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के मोर्चे पर आदिवासी ज़िले आज भी राज्य के अन्य हिस्सों की तुलना में पिछड़े हुए हैं।
आरएसएस का एजेंडा और पहचान का संकट
आरएसएस हमेशा से आदिवासियों को उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान से वंचित कर उन्हें एक व्यापक धार्मिक ढांचे में समाहित करने की कोशिश करता रहा है। 'वनवासी कल्याण आश्रम' जैसे संगठनों के माध्यम से आदिवासियों की अपनी भाषा, अपनी पूजा पद्धति और अपनी परंपराओं को मिटाने का प्रयास किया जा रहा है। राहुल गांधी का यह कहना बिल्कुल तर्कसंगत है कि आरएसएस आदिवासियों को इस देश का मूल निवासी मानने को तैयार नहीं है, क्योंकि अगर वे मूल निवासी मान लिए गए, तो भाजपा का 'बाहरी और भीतरी' का राजनीतिक नैरेटिव ध्वस्त हो जाएगा।
अब जागने का समय है
वडोदरा की सभा में उठी आवाज़ महज़ एक राजनीतिक भाषण नहीं थी, बल्कि यह उन करोड़ों आदिवासियों की दबी हुई सिसकी और आक्रोश का प्रतिबिंब थी, जिन्हें भाजपा सरकार ने हाशिए पर धकेल दिया है। प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को यह समझना होगा कि आदिवासी इस देश के कर्जदाता हैं, याचक नहीं।
अगर हम आज भी चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। 'वनवासी' शब्द के पीछे छिपे अपमान को पहचानना होगा और अपने 'आदिवासी' होने के गौरव को पुनः स्थापित करना होगा। राहुल गांधी ने जो चिंगारी सुलगाई है, उसे अब एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन में बदलने की ज़रूरत है ताकि सत्ता के गलियारों में बैठे लोग आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के साथ खिलवाड़ करना बंद करें।
देश आदिवासियों का ऋणी है, और इस ऋण को चुकाने का एकमात्र तरीका उन्हें उनका मान-सम्मान और उनकी ज़मीन वापस लौटाना है, न कि उन्हें 'वनवासी' कहकर उनके अस्तित्व को मिटाना।
-Abhijit

