Saturday, February 21, 2026

सड़कों पर मौत बनकर दौड़ रही 'सफेद रोशनी': मोदी सरकार की लापरवाही और जनता की जान

भारत की सड़कों पर आज एक नई तरह की 'चकाचौंध' फैली हुई है, लेकिन यह विकास की चमक नहीं बल्कि मौत का बुलावा है। यदि आप रात के समय हाईवे या शहरों की सड़कों पर वाहन चलाते हैं, तो आपने महसूस किया होगा कि सामने से आने वाली गाड़ियों की सफेद LED हेडलाइट्स आपकी आँखों को इस कदर चंधिया (Dazzle) देती हैं कि कुछ सेकंड के लिए सड़क दिखना बंद हो जाती है। ये 'कुछ सेकंड' ही सड़क हादसों के लिए काफी होते हैं। विडंबना यह है कि जहाँ पूरी दुनिया सुरक्षा मानकों को कड़ा कर रही है, वहीं भारत सरकार और केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय इस गंभीर खतरे को नजरअंदाज कर रहा है।

प्रश्न यह है कि जब यह समस्या आम नागरिकों के अनुभव का हिस्सा बन चुकी है, तब भी केंद्र सरकार और विशेष रूप से सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय क्यों मौन है? क्या सरकार को यह दिखाई नहीं देता कि अत्यधिक तीव्र सफेद रोशनी रात में वाहन चलाने वालों के लिए कितना बड़ा खतरा बन चुकी है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार अक्सर सड़क सुरक्षा के नाम पर बड़े-बड़े अभियान चलाती है, हेलमेट और सीट बेल्ट पर कड़े नियम लागू करती है, भारी जुर्माने तय करती है। परंतु जब बात तकनीकी मानकों की आती है, जहां नीति निर्माण की वास्तविक जिम्मेदारी होती है, वहां सरकार की चुप्पी समझ से परे है। सफेद एलईडी हेडलाइटों की तीव्रता और उनका अनुचित कोण केवल सामने से आने वाले चालक को अस्थायी रूप से अंधा कर देता है, बल्कि पैदल यात्रियों और दोपहिया चालकों के लिए भी जानलेवा स्थिति पैदा करता है।

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी अक्सर अपने बयानों में आधुनिक तकनीक और नवाचार की बात करते हैं। वे भारत को विश्वस्तरीय सड़कों और यातायात प्रणाली से जोड़ने का दावा करते हैं। परंतु क्या आधुनिकता का अर्थ केवल चमकदार तकनीक है? यदि तकनीक सुरक्षा के मूल सिद्धांत को ही कमजोर कर दे, तो उसे आंख मूंदकर स्वीकार करना किस प्रकार की प्रगति है?

सफेद एलईडी हेडलाइटों की समस्या केवल उनकी रोशनी के रंग तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी तीव्रता, बीम एंगल और अनियंत्रित उपयोग से जुड़ी है। अधिकांश वाहन निर्माता अधिक चमकदार रोशनी को एक विशेषता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उपभोक्ता भी इसेप्रीमियमसुविधा मानकर खरीदते हैं। परंतु इस प्रतिस्पर्धा में सुरक्षा मानकों की अनदेखी हो रही है। रात में हाईवे पर चलते समय सामने से आती तेज सफेद रोशनी के कारण कुछ सेकंड के लिए दृष्टि बाधित होना सामान्य अनुभव बन चुका है। यही कुछ सेकंड किसी भी वाहन को डिवाइडर से टकराने, गलत दिशा में मुड़ने या सामने वाले वाहन से भिड़ने के लिए पर्याप्त होते हैं।

सरकार यदि चाहे तो मोटर वाहन नियमों में संशोधन कर सकती है। हेडलाइट की अधिकतम लुमेन क्षमता, रंग तापमान (कलर टेम्परेचर) और बीम की ऊंचाई को सख्ती से नियंत्रित किया जा सकता है। कई देशों में यह मानक स्पष्ट रूप से निर्धारित हैं। परंतु भारत में इस विषय पर गंभीर बहस तक नहीं होती। जब नागरिक शिकायत करते हैं, तो उन्हें सलाह दी जाती है कि वेलो बीमका उपयोग करें। परंतु क्या यह पर्याप्त समाधान है? यदि अधिकांश चालक नियमों का पालन ही करें, तो सरकार का दायित्व क्या केवल सलाह देने तक सीमित रह जाता है?

यह भी ध्यान देने योग्य है कि सफेद एलईडी हेडलाइटें धुंध, वर्षा या कोहरे की स्थिति में अधिक परावर्तन पैदा करती हैं। पीली रोशनी की तरंग लंबाई ऐसी परिस्थितियों में बेहतर दृश्यता देती है। यही कारण था कि पहले पीली रोशनी को प्राथमिकता दी जाती थी। परंतु आज तकनीकी आकर्षण ने व्यावहारिकता को पीछे छोड़ दिया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने मोटर वाहन अधिनियम में संशोधन कर भारी जुर्माने लागू किए। तर्क यह दिया गया कि इससे दुर्घटनाएं कम होंगी। परंतु क्या केवल दंड से दुर्घटनाएं रुकती हैं? यदि सड़क पर चलने वाले वाहनों की मूलभूत संरचना ही असुरक्षित हो, तो चालकों पर सारा दोष मढ़ना कहां तक उचित है?

मंत्री नितिन गडकरी ने कई बार सड़क दुर्घटनाओं को राष्ट्रीय चिंता बताया है। परंतु जब दुर्घटनाओं के तकनीकी कारणों की पहचान करने और उन्हें दूर करने की बात आती है, तो मंत्रालय की सक्रियता दिखाई नहीं देती। क्या वाहन कंपनियों पर कठोर मानक लागू करने में कोई बाधा है? क्या उद्योग जगत के दबाव के कारण नियमों में ढील दी जा रही है? यह प्रश्न आज आम नागरिक पूछ रहा है।

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी अक्सर अपनी बड़ी-बड़ी सड़क परियोजनाओं और हाईवे के जाल बिछाने का बखान करते नहीं थकते। लेकिन क्या उन्हें यह नहीं पता कि उन्हीं चमचमाती सड़कों पर ये सफेद LED लाइट्स 'साइलेंट किलर' का काम कर रही हैं?

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में होने वाले कुल हादसों में से 50% से अधिक शाम 6 बजे से सुबह 6 बजे के बीच होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इनमें से एक बड़ी संख्या उन हादसों की है जो हेडलाइट की चकाचौंध के कारण होते हैं। इसके बावजूद, मंत्रालय ने अब तक सफेद LED लाइट्स की तीव्रता या उनके रंग (Color Temperature) को लेकर कोई सख्त गाइडलाइन जारी नहीं की है। क्या सरकार को कॉर्पोरेट कंपनियों का मुनाफा ज्यादा प्यारा है या आम आदमी की जान?रात में वाहन चलाने वाले ट्रक ड्राइवर, बस चालक और टैक्सी चालक लगातार इस समस्या की शिकायत करते हैं। दोपहिया चालक तो विशेष रूप से प्रभावित होते हैं, क्योंकि उनकी आंखें सीधे सामने से आने वाली रोशनी के संपर्क में आती हैं। ग्रामीण सड़कों पर जहां स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था नहीं है, वहां यह समस्या और गंभीर हो जाती है।

सरकार यदि वास्तव में सड़क सुरक्षा के प्रति गंभीर है, तो उसे यह कदम उठाने चाहिएपहला, हेडलाइट के रंग तापमान की अधिकतम सीमा निर्धारित की जाए और पीली या वार्म व्हाइट रोशनी को प्राथमिकता दी जाएदूसरा, बीम एलाइनमेंट की नियमित जांच अनिवार्य की जाए। तीसरा, आफ्टरमार्केट एलईडी किट पर सख्त नियंत्रण लगाया जाए। चौथा, जनजागरूकता अभियान चलाया जाए कि हाई बीम का अनावश्यक उपयोग दंडनीय हो।

परंतु दुर्भाग्य से वर्तमान व्यवस्था में प्राथमिकता प्रचार को मिलती है, नीति सुधार को नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे करती है, परंतु यदि विकास का परिणाम नागरिकों की आंखों की रोशनी छीनने लगे, तो उस पर पुनर्विचार आवश्यक है।

यह समय है जब सड़क परिवहन मंत्रालय को तकनीकी विशेषज्ञों, यातायात सुरक्षा विशेषज्ञों और नागरिक संगठनों के साथ मिलकर व्यापक समीक्षा करनी चाहिए। यदि पीली हेडलाइटें अधिक सुरक्षित सिद्ध होती हैं, तो उन्हें पुनः अनिवार्य बनाने में हिचक क्यों?

सड़क सुरक्षा केवल हेलमेट जांच या चालान काटने तक सीमित नहीं हो सकती। यह समग्र दृष्टिकोण की मांग करती है। जब तक सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लेगी, तब तक रात का सफर भय का पर्याय बना रहेगा।

आज आवश्यकता है कि सरकार जनता की आवाज सुने, उद्योग के दबाव से ऊपर उठे और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर निर्णय ले। अन्यथा सफेद रोशनी की यह चकाचौंध आने वाले समय में और अधिक जानलेवा सिद्ध हो सकती है।

- Abhijit

21/02/2026