Friday, January 30, 2026

यूजीसी के 'भेदभावपूर्ण' नियमों पर सुप्रीम कोर्ट का चाबुक: क्या अब झुकेगी सरकार?

उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता लाने के नाम पर मोदी सरकार द्वारा लाए गए यूजीसी के नए नियमों UGC Equity Regulations, 2026 को उच्चतम न्यायालय ने जो आईना दिखाया है, वह सरकार की अदूरदर्शिता और विभाजनकारी नीति-निर्माण का प्रमाण है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने केवल इन नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी है, बल्कि जो टिप्पणियां की हैं, वे केंद्र सरकार के लिए किसी फटकार से कम नहीं हैं।

विवाद की जड़ और सरकार की मंशा

यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को नए नियम अधिसूचित किए थे। इन नियमों की धारा 3(C) में 'जातिगत भेदभाव' की जो परिभाषा दी गई, उसने पूरे देश के छात्र समुदाय को आक्रोशित कर दिया। सरकार ने भेदभाव को केवल 'अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)' के खिलाफ होने वाले व्यवहार तक सीमित कर दिया। इसका सीधा अर्थ यह निकला कि यदि सामान्य वर्ग का कोई छात्र परिसर में किसी भी प्रकार के भेदभाव या उत्पीड़न का शिकार होता है, तो उसे इन नियमों के तहत 'पीड़ित' तक नहीं माना जाएगा।

यह कदम स्पष्ट रूप से सामाजिक ध्रुवीकरण की राजनीति से प्रेरित प्रतीत होता है। जब संविधान का अनुच्छेद 14 सबको समान अधिकार देता है, तो सरकार एक ऐसी 'सुरक्षा की श्रेणी' (Hierarchy of Protection) कैसे बना सकती है जिसमें एक बड़ा वर्ग न्याय की परिधि से ही बाहर हो जाए?

सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: "क्या हम पीछे जा रहे हैं?"

सुनवाई के दौरान अदालत ने जो सवाल उठाए, वे हर सजग नागरिक की चिंता को दर्शाते हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा कि ये नियम "अस्पष्ट" (Vague) हैं और इनका व्यापक "दुरुपयोग" हो सकता है।

अदालत की सबसे गंभीर चिंता 'सामाजिक विभाजन' को लेकर थी। सीजेआई ने पूछा, "75 साल की संवैधानिक यात्रा के बाद, जहाँ हम जाति-मुक्त समाज की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे थे, क्या अब हम पीछे की ओर (Regressive) जा रहे हैं?" अदालत ने यहाँ तक आगाह किया कि सरकार के ये नियम विश्वविद्यालयों को 'नस्लीय रूप से विभाजित' अमेरिकी स्कूलों की तरह बना देंगे, जहाँ एकता के बजाय अलगाव की बू आएगी।

विशेष रूप से, 'अलग हॉस्टल' या वार्ड बनाने जैसे सुझावों पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह संस्थानों की एकता को खंडित कर देगा।

मोदी सरकार की विफलता का विश्लेषण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार अक्सर 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा देती है, लेकिन धरातल पर उसकी एजेंसियां ऐसे नियम गढ़ रही हैं जो समावेशिता के बजाय वर्ग-संघर्ष को बढ़ावा देते हैं।

  1. सुरक्षा उपायों का अभाव: 2025 के मसौदे में झूठी शिकायतों के खिलाफ दंड का प्रावधान था, जिसे 2026 के अंतिम नियमों से हटा दिया गया। यह जानबूझकर दुरुपयोग का रास्ता खोलने जैसा है।
  2. संवैधानिक उल्लंघन: भेदभाव की परिभाषा को संकुचित करके सरकार ने योग्यता और समानता के सिद्धांत को दरकिनार कर दिया।
  3. संवाद की कमी: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आश्वासन दिया था कि कानून का दुरुपयोग नहीं होगा, लेकिन जब कानून की भाषा ही दोषपूर्ण हो, तो मौखिक आश्वासनों की कोई कीमत नहीं रह जाती।

क्या झुकेगी सरकार?

सुप्रीम कोर्ट ने अब 2012 के पुराने नियमों को बहाल कर दिया है और केंद्र को इन विवादास्पद नियमों की समीक्षा करने का निर्देश दिया है। यह सरकार के लिए एक नैतिक और कानूनी पराजय है। उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक छात्र सड़कों पर हैं, और भाजपा के अपने ही कुछ पदाधिकारियों ने इसे 'काला कानून' बताते हुए इस्तीफे दिए हैं।

सवाल यह है कि क्या सरकार अपनी ज़िद छोड़कर एक ऐसा समावेशी ढांचा तैयार करेगी जो जाति-धर्म से ऊपर उठकर हर छात्र को सुरक्षा दे, या फिर वह इसे 'प्रतिष्ठा का प्रश्न' बनाकर समाज को और बांटने का काम करेगी? फिलहाल, न्यायपालिका ने लोकतंत्र के प्रहरी की अपनी भूमिका बखूबी निभाई है। अब गेंद सरकार के पाले में है।

- Abhijit

30/01/2026

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