
ऐतिहासिक नगरी पाटन की पावन धरा, जो कभी अपनी अस्मिता और गौरव के लिए जानी जाती थी, हाल ही में कांग्रेस की गंदी अंतर्कलह और निचले स्तर की राजनीति का गवाह बनी। अवसर था 'वीर मेघमाया सातम' के पावन पर्व का, लेकिन इसे जिस तरह से राजनीतिक द्वेष और धमकी भरी बयानबाजी में तब्दील कर दिया गया, वह गुजरात कांग्रेस के पतन की एक नई कहानी कहता है।
जिग्नेश मेवानी: नेतृत्व या अराजकता?
कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवानी ने मंच से जिस तरह 'हुंकार' भरी और अनुसूचित जाति के नेता हितेंद्र पिथड़िया को जान से मारने की धमकी के कथित मामले को तूल दिया, वह किसी जननेता का नहीं बल्कि एक अराजक तत्व का आचरण अधिक प्रतीत होता है। मेवानी ने अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ विधायक किरीट पटेल और प्रदेश सरकार को जिस अपमानजनक और विवादास्पद शब्दावली में चुनौती दी, उसने यह साबित कर दिया है कि कांग्रेस में अनुशासन नाम की कोई वस्तु शेष नहीं बची है।
क्या यह वही कांग्रेस है जो गांधी और पटेल के मूल्यों की बात करती है? जहाँ एक विधायक सार्वजनिक मंच से अपनी ही पार्टी के दूसरे विधायक को राजनीतिक रूप से बर्बाद करने की धमकी देता है। यह केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि गुजरात कांग्रेस के भीतर सुलग रही उस आग का धुआं था, जो पार्टी को अंदर ही अंदर राख कर रही है।
गुजरात कांग्रेस: गुटबाजी का नया केंद्र
पाटन की इस घटना ने गुजरात कांग्रेस के उन घावों को फिर से हरा कर दिया है, जिन्हें ढकने की कोशिशें अक्सर प्रदेश नेतृत्व करता रहा है। किरीट पटेल द्वारा इस्तीफे की धमकी और फिर अमित चावड़ा द्वारा उन्हें शांत कराने का नाटक यह दर्शाता है कि यहाँ कोई भी नेता किसी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। नियुक्तियों में मनमानी और स्थानीय नेताओं को दरकिनार कर 'पैराशूट' नेताओं को तरजीह देना कांग्रेस की पुरानी बीमारी रही है, जो अब कैंसर का रूप ले चुकी है।
जिग्नेश मेवानी और हितेंद्र पिथड़िया की जोड़ी जिस तरह से पाटन और आसपास के जिलों में कांग्रेस के संगठन पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रही है, उससे निष्ठावान और पुराने कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष है। पाटन जिला कार्यालय पर ताला लगाना और कार्यकर्ताओं का अपनी ही पार्टी के नेताओं के खिलाफ नारेबाजी करना इस बात का प्रमाण है कि कांग्रेस का आधार अब दरक चुका है।
राहुल गांधी की चुप्पी और विफल नेतृत्व
सबसे बड़ा प्रश्न दिल्ली में बैठे राहुल गांधी और उनके आलाकमान पर उठता है। राहुल गांधी अक्सर गुजरात आकर 'मोहब्बत की दुकान' खोलने की बात करते हैं, लेकिन क्या उन्हें अपनी पार्टी के भीतर लगी 'नफरत की आग' दिखाई नहीं देती? जब उनके विधायक एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हों, तब राहुल गांधी की चुप्पी उनकी नेतृत्व क्षमता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
सच्चाई तो यह है कि गुजरात कांग्रेस में जो कुछ भी हो रहा है, वह राहुल गांधी की 'अप्रयोगधर्मी' राजनीति का ही परिणाम है। बिना जनाधार वाले नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां सौंपना और धरातल पर काम करने वाले स्थानीय नेताओं का अपमान करना ही आज गुजरात कांग्रेस की नियति बन गई है। राहुल गांधी शायद यह भूल गए हैं कि केवल रैलियों और हवाई दौरों से भाजपा जैसी मजबूत शक्ति को नहीं हराया जा सकता,
उसके लिए एक अनुशासित संगठन की आवश्यकता होती है, जो कांग्रेस के पास अब दूर-दूर तक नहीं है।
पाटन की इस घटना ने जनता के सामने कांग्रेस का असली चेहरा उजागर कर दिया है। एक ऐसी पार्टी जो अपनी आंतरिक कलह को नहीं संभाल सकती, वह प्रदेश की सुरक्षा और विकास को क्या संभालेगी? जिग्नेश मेवानी का विवादास्पद रुख और पार्टी का बिखराव यह संकेत दे रहा है कि आगामी चुनावों में कांग्रेस को अपनी बची-खुची साख बचाना भी भारी पड़ेगा।
गुजरात की जनता शांति और गरिमापूर्ण राजनीति की पक्षधर रही है। कांग्रेस के नेताओं द्वारा मंच से दी गई धमकियां और असंसदीय भाषा का खामियाजा पार्टी को आने वाले समय में भुगतना ही होगा। अब समय आ गया है कि गुजरात कांग्रेस के नेता यह समझ लें कि 'राजा' बनने की इस होड़ में वे अपनी रियासत पहले ही खो चुके हैं।
- Abhijit
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