सनातन धर्म की ध्वजा और ज्ञान के सर्वोच्च शिखर 'शंकराचार्य' का पद आज राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की वेदी पर चढ़ाया जा रहा है। प्रयागराज की पावन धरती, जहाँ कभी शास्त्रार्थ से धर्म की दिशा तय होती थी, आज वहाँ खाकी वर्दी के जरिए धर्मगुरुओं को अपमानित करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में हम एक ऐसे दौर में पहुँच गए हैं, जहाँ धर्म सत्ता के अधीन होने को विवश किया जा रहा है।
सत्ता का अहंकार और संतों का अपमान
प्रयागराज माघ मेले में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ जो व्यवहार किया गया, वह न केवल निंदनीय है बल्कि लोकतांत्रिक और धार्मिक मर्यादाओं का चीरहरण है। एक ओर सरकार 'सनातन' के नाम पर वोट बटोरती है, और दूसरी ओर जब वही सनातन परंपरा के संरक्षक सत्ता के 'अशास्त्रोक्त' कार्यों पर उंगली उठाते हैं,
तो उन्हें 'कालनेमि' जैसे विशेषणों से नवाजा जाता है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह बयान कि "संन्यासी के लिए राष्ट्र सर्वोपरि है" सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि जो भी संत सरकार की नीतियों या उनकी कार्यशैली से असहमत हो, उसे धर्मद्रोही घोषित कर दिया जाए? शंकराचार्य की पदवी पर सवाल उठाना और प्रशासन द्वारा उन्हें नोटिस जारी करना यह दर्शाता है कि यह सरकार खुद को धर्मशास्त्रों से ऊपर समझने लगी है।
मोदी सरकार और 'इवेंट' बनती आस्था
यह विवाद केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ें दिल्ली के गलियारों तक जाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जिस तरह से 'प्राण-प्रतिष्ठा' जैसे गंभीर धार्मिक अनुष्ठानों को एक राजनीतिक 'मेगा-इवेंट' में बदला गया, उस पर शंकराचार्यों की आपत्ति शास्त्र सम्मत थी। जब देश के सर्वोच्च गुरुओं ने कहा कि "अर्ध-निर्मित मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा शास्त्रों के विरुद्ध है", तो उन्हें हाशिए पर धकेलने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी और आईटी सेल को लगा दिया गया।
आज सत्ता के गलियारों में बैठे लोग तय करना चाहते हैं कि शंकराचार्य कौन होगा। क्या अब संतों को अपनी भक्ति और पद का प्रमाण पत्र लखनऊ या दिल्ली के सचिवालय से लेना होगा?
तानाशाही का नया चेहरा
प्रयागराज में पुलिस द्वारा शंकराचार्य के शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की और उनके रथ को रोकना यह बताता है कि सरकार अब संवाद नहीं, दमन की भाषा बोलती है। जो सरकार औरंगजेब के अत्याचारों की दुहाई देकर राजनीति करती है, वही सरकार आज संतों के प्रति वैसा ही कठोर और अपमानजनक रवैया अपना रही है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में जब धर्मगुरुओं को अपनी बात रखने के लिए धरने पर बैठना पड़े, तो समझ लेना चाहिए कि शासन में बैठे लोगों का मानसिक पतन हो चुका है।
धर्म की रक्षा या वोट की राजनीति?
योगी सरकार और मोदी सरकार को यह समझना होगा कि सनातन धर्म किसी राजनीतिक दल की बपौती नहीं है। शंकराचार्य का पद हज़ारों साल पुरानी उस परंपरा का प्रतीक है जिसने भारत की सांस्कृतिक एकता को अक्षुण्ण रखा है। यदि सत्ता अपने अहंकार में आकर इन स्तंभों को गिराने की कोशिश करेगी, तो वह स्वयं के पतन का मार्ग प्रशस्त करेगी।
जनता देख रही है कि कैसे एक संन्यासी मुख्यमंत्री के राज में संतों का अपमान हो रहा है और कैसे 'सबका साथ' का नारा देने वाली केंद्र सरकार केवल 'सत्ता के साथ' खड़े होने वालों का सम्मान करना जानती है। यह समय चुप रहने का नहीं, बल्कि सत्ता के इस अधार्मिक कृत्य के विरुद्ध खड़े होने का है।
- Abhijit
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