प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार जिस 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा देती है, यह नया कानून उसके बिल्कुल उलट प्रतीत होता है। आइए समझते हैं कि आखिर इस कानून में ऐसा क्या है, जिसे लेकर देश का एक बड़ा वर्ग इसे 'काला कानून' कह रहा है।
मोदी सरकार का दोहरा चरित्र
एक तरफ प्रधानमंत्री 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा बुलंद करते हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी सरकार ऐसे 'ड्रेकोनियन' कानून लाती है जो समाज में वैमनस्य पैदा करते हैं। नए यूजीसी नियमों में 'जातिगत भेदभाव' की परिभाषा को इतना व्यापक और अस्पष्ट बना दिया गया है कि अब कैंपस में सामान्य शैक्षणिक संवाद भी अपराध की श्रेणी में आ सकता है।
सबसे विवादास्पद बिंदु OBC को इस विशेष निगरानी सूची में शामिल करना और 'इक्विटी स्क्वॉड' जैसे निगरानी तंत्रों का गठन है। राजस्थान में करणी सेना और यूपी-बिहार में छात्र संगठनों का यह आरोप पूरी तरह तर्कसंगत लगता है कि यह कानून सवर्ण समाज के छात्रों को मानसिक दबाव में रखने और उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाने की एक सोची-समझी साजिश है।
1. भेदभाव की अस्पष्ट परिभाषा और दुरुपयोग का डर
इस नए कानून की सबसे विवादित बात यह है कि इसमें 'भेदभाव' की परिभाषा को इतना व्यापक और लचीला रखा गया है कि किसी भी सामान्य शैक्षणिक चर्चा या असहमति को 'जातिगत उत्पीड़न' का रूप दिया जा सकता है। सवर्ण संगठनों और छात्रों का डर जायज है कि इस कानून का इस्तेमाल निजी रंजिश निकालने या निर्दोष छात्रों और शिक्षकों को झूठे मुकदमों में फंसाने के लिए किया जाएगा।
2. 'दोषी होने तक निर्दोष' के सिद्धांत की बलि
लोकतंत्र और न्याय का बुनियादी सिद्धांत है कि जब तक दोष सिद्ध न हो जाए, व्यक्ति निर्दोष है। लेकिन इस कानून के प्रावधानों ने छात्रों के मन में यह भय पैदा कर दिया है कि केवल शिकायत मात्र से उनके करियर पर पूर्णविराम लग सकता है। बिना किसी ठोस जांच प्रक्रिया के सख्त दंड और निलंबन के प्रावधान छात्र राजनीति और शैक्षणिक माहौल को जहरीला बना देंगे।
3. दंड के कठोर प्रावधान और संस्थानों की स्वायत्तता पर हमला
मोदी सरकार ने इस कानून के जरिए विश्वविद्यालयों पर जो दबाव बनाया है, वह चिंताजनक है। यदि कोई संस्थान इन नियमों का पूरी तरह पालन नहीं करता, तो यूजीसी उसकी ग्रांट (अनुदान) रोकने या उसकी मान्यता रद्द करने तक की धमकी दे रही है। क्या हम अपने विश्वविद्यालयों को शिक्षा का केंद्र बनाना चाहते हैं या उन्हें पुलिस थानों में तब्दील करना चाहते हैं?
4. सवर्ण समाज की अनदेखी और राजनीतिक चुप्पी
यूपी, बिहार और राजस्थान में जो आक्रोश दिख रहा है, वह अकारण नहीं है। इन राज्यों के छात्र, जो पहले से ही पेपर लीक और बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं, अब इस नए कानूनी फंदे से डरे हुए हैं। विडंबना देखिए कि बीजेपी के अपने कोर वोटर (सामान्य वर्ग) इस कानून के खिलाफ सड़कों पर हैं, लेकिन सरकार के मंत्री और सांसद इस पर चुप्पी साधे बैठे हैं। क्या सत्ता के अहंकार में सरकार ने अपने ही नागरिकों की चिंताओं को सुनना बंद कर दिया है?
5. झूठी शिकायतों पर कार्रवाई का प्रावधान क्यों हटाया गया?
हैरानी की बात यह है कि इस कानून के शुरुआती ड्राफ्ट में 'झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों' पर दंड का प्रावधान था, लेकिन अंतिम नोटिफिकेशन में सरकार ने इसे हटा दिया। यह कदम साफ तौर पर इस ओर इशारा करता है कि सरकार खुद इस कानून के संभावित दुरुपयोग को बढ़ावा देना चाहती है, ताकि समाज में विभाजन की राजनीति चमकती रहे।
प्रधानमंत्री मोदी और सरकार से कड़े सवाल
- भेदभाव की एकतरफा परिभाषा क्यों? यदि समानता ही लक्ष्य है, तो कानून में सामान्य वर्ग के खिलाफ होने वाले 'रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन' का जिक्र क्यों नहीं है?
- झूठी शिकायतों को संरक्षण क्यों? दंड का प्रावधान हटाकर क्या सरकार ने प्रतिशोध की राजनीति के लिए शैक्षणिक परिसरों के द्वार नहीं खोल दिए हैं?
- संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: क्या यह कानून समानता के उस मौलिक अधिकार की धज्जियां नहीं उड़ाता,
जो कहता है कि कानून की नजर में हर नागरिक बराबर है?
क्या यह सिर्फ चुनाव जीतने का स्टंट है?
उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में, जहाँ जातिगत राजनीति हमेशा चरम पर रहती है, वहां इस कानून को लागू करना समाज को दो फाड़ करने की कोशिश है। मोदी सरकार अपनी विफलताओं—जैसे पेपर लीक (UGC-NET घोटाला), बेरोजगारी और गिरती शिक्षा गुणवत्ता—से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे भावनात्मक और विवादित कानून लाती है।
शिक्षा का मंदिर वह स्थान होना चाहिए जहाँ योग्यता का सम्मान हो और हर छात्र सुरक्षित महसूस करे। लेकिन मोदी सरकार की यह नई नीति परिसरों को 'अविश्वास' और 'डर' का केंद्र बना रही है। यूपी-बिहार से लेकर राजस्थान तक के छात्र सड़कों पर उतरकर यह पूछ रहे हैं कि क्या अब सामान्य वर्ग का होना ही एक अपराध बन गया है?
प्रधानमंत्री जी, देश को 'समानता' चाहिए, 'प्रतिशोध' नहीं। अगर समय रहते इस कानून में संशोधन नहीं किया गया या इसे वापस नहीं लिया गया, तो उच्च शिक्षा का ढांचा पूरी तरह चरमरा जाएगा और इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियां भुगतेंगी।
- Abhijit
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