
भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में जब हम 'विश्वगुरु' बनने की आकांक्षा पालते हैं, तो उम्मीद की जाती है कि हमारे नेतृत्व के पास न केवल विजन होगा, बल्कि देश की संस्कृति, इतिहास और समकालीन वास्तविकताओं की गहरी समझ भी होगी। लेकिन पिछले कुछ दिनों में भारतीय जनता पार्टी के कुछ प्रमुख नेताओं— केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और सांसद निशिकांत दुबे— द्वारा दिए गए बयानों ने न केवल बौद्धिक स्तर पर निराशा पैदा की है, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भाजपा का 'विश्वगुरु' मॉडल तथ्यों की बलि देकर खड़ा किया जा रहा है?
मांडविया का 'अज्ञान' और खेल भावना का अपमान
हाल ही में केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने भारतीय फुटबॉल के दो सबसे प्रतिष्ठित क्लबों— 'मोहन बागान' और 'ईस्ट बंगाल' के नाम लेने में जो गलतियाँ कीं, वह केवल जुबान फिसलना नहीं था। यह उस राज्य (पश्चिम बंगाल) की सांस्कृतिक पहचान और उन क्लबों के गौरवशाली इतिहास के प्रति घोर अनभिज्ञता का प्रतीक है जिन्होंने आजादी की लड़ाई में भी फुटबॉल के जरिए योगदान दिया था। जब देश का खेल मंत्री ही देश के बुनियादी खेल प्रतीकों के नाम तक सही से नहीं पढ़ पाता, तो क्या हम वाकई खेल जगत में वैश्विक महाशक्ति बनने का सपना देख सकते हैं? यह चूक दिखाती है कि सत्ता के गलियारों में नियुक्तियां 'योग्यता' के बजाय 'अनुग्रह' पर टिकी हैं।
रेखा गुप्ता: इतिहास का नया 'अपडेटेड' संस्करण?
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने तो इतिहास के पन्नों को ही अपनी सुविधानुसार बदलने का दुस्साहस कर दिया। विधानसभा में उनके द्वारा शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान को लेकर दिया गया बयान— जिसमें उन्होंने कथित तौर पर बम कांड को ब्रिटिश हुकूमत के बजाय कांग्रेस सरकार के खिलाफ बताया— न केवल हास्यास्पद है, बल्कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का अपमान भी है। इतिहास को इस तरह 'पेंट' करना भाजपा की उस पुरानी रणनीति का हिस्सा लगता है जहाँ अपनी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता साधने के लिए तथ्यों को मरोड़ा जाता है। यदि मुख्यमंत्री स्तर का नेता तथ्यों की ऐसी भारी भूल करता है, तो आने वाली पीढ़ियां इतिहास के नाम पर क्या सीखेंगी?
निशिकांत दुबे और संवैधानिक संस्थाओं पर प्रहार
सांसद निशिकांत दुबे अक्सर अपने विवादित बयानों के लिए चर्चा में रहते हैं। न्यायपालिका और संवैधानिक प्रक्रिया पर उनके हालिया कटाक्ष लोकतंत्र की मर्यादा को तार-तार करते हैं। जब भाजपा के नेता संसद के भीतर और बाहर इतिहास और वर्तमान को गलत तरीके से पेश करते हैं, तो वे केवल अपनी अज्ञानता ही प्रदर्शित नहीं करते, बल्कि एक खतरनाक नैरेटिव गढ़ते हैं।
विश्वगुरु या 'भ्रमगुरु'?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर वैश्विक मंचों पर भारत को ज्ञान और सत्य का प्रतीक बताते हैं। लेकिन उनके ही दल के नेता जब सार्वजनिक रूप से गलत तथ्य पढ़ते हैं और इतिहास को विकृत करते हैं, तो प्रधानमंत्री की वह छवि धूमिल होती है।
क्या भाजपा वास्तव में ऐसे नेताओं के दम पर भारत को 'विश्वगुरु' बनाना चाहती है जिनके पास बुनियादी तथ्यों की भी समझ नहीं है? या फिर यह जानबूझकर किया गया 'बौद्धिक प्रदूषण' है ताकि जनता असली मुद्दों को छोड़कर इन्हीं विवादों में उलझी रहे?
सत्ता के मद में चूर इन नेताओं को यह समझना होगा कि किसी भी राष्ट्र का मस्तक इतिहास को झूठ से रंगने से ऊँचा नहीं होता, बल्कि उसे सहेजने और उससे सीखने से होता है। यदि सरकार के 'मुखर' चेहरे ही गलतियां करेंगे, तो उनकी जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। अन्यथा, यह 'विश्वगुरु' बनने का अभियान महज एक खोखला नारा बनकर रह जाएगा।
- Abhijit
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