
आज गुजरात की विकास गाथा के दो अलग-अलग चित्र सामने आए हैं, जो चीख-चीख कर राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही की कहानी बयां कर रहे हैं। एक ओर ७५ साल पुराना इतिहास है जो झुकने को तैयार नहीं, और दूसरी ओर आधुनिक इंजीनियरिंग के नाम पर २१ करोड़ की वह 'धोखाधड़ी' है जो अपनी पहली परीक्षा में ही धराशायी हो गई।
पहली तस्वीर: मजबूती का प्रमाण (सारंगपुर, अहमदाबाद)
अहमदाबाद के सारंगपुर सर्कल के पास खड़ी १० मंजिला इमारत जितनी ऊँची पानी की टंकी को गिराने के लिए प्रशासन को पसीने आ गए। यह टंकी ७५ साल पहले बनी थी। आश्चर्य की बात यह है कि इसे तोड़ने के लिए ८ टन की जेसीबी मशीन को क्रेन से ऊपर चढ़ाना पड़ा, फिर भी वह टस से मस नहीं हुई। यह उस दौर की ईमानदारी और गुणवत्ता का जीता-जागता प्रमाण है जब 'कमीशन' की संस्कृति विकास पर हावी नहीं थी।
दूसरी तस्वीर: भ्रष्टाचार का 'जल समाधि' (गायापगला, सूरत)
दूसरी ओर, सूरत के कामरेज तालुका के गायापगला (तडाकेश्वर) गाँव में २१ करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से बनी एक नई जल परियोजना की टंकी अपनी पहली टेस्टिंग भी नहीं झेल सकी। जैसे ही इसमें पानी भरा गया, यह ताश के पत्तों की तरह ढह गई। २१ करोड़ रुपये का जनता का पैसा पल भर में कीचड़ और मलबे में तब्दील हो गया।
सरकार से कुछ तीखे सवाल
यह घटना केवल एक तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि एक संस्थागत अपराध है। यहाँ कुछ प्रश्न हैं जो सरकार की कार्यप्रणाली पर गहरा प्रहार करते हैं:
१. ठेकेदारी और कमीशन का खेल: २१ करोड़ की लागत वाली इस टंकी के निर्माण में किस स्तर की सामग्री का उपयोग किया गया था?
क्या यह स्पष्ट नहीं है कि गुणवत्ता की बलि चढ़ाकर अधिकारियों और ठेकेदारों की जेबें भरी गईं?
२. निरीक्षण में ढिलाई: निर्माण के दौरान सरकारी इंजीनियरों और गुणवत्ता निरीक्षकों ने क्या आँखें मूंद रखी थीं?
३. पुराना बनाम नया: यदि ७५ साल पहले बिना आधुनिक तकनीक के ऐसी मजबूत संरचनाएं बन सकती थीं जो आज की जेसीबी का भी डटकर मुकाबला कर रही हैं,
तो आज की 'स्मार्ट' तकनीक जनता का पैसा पानी में क्यों बहा रही है?
४. जवाबदेही किसकी?: कैबिनेट में इस मुद्दे की गूँज सुनाई देना काफी नहीं है। क्या दोषी अधिकारियों और उस ब्लैकलिस्टेड होने योग्य ठेकेदार पर कड़ी कार्रवाई होगी, या यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा?
आज गुजरात का आम नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। एक तरफ विकास का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, और दूसरी तरफ भ्रष्टाचार की दीमक हमारे बुनियादी ढांचे को अंदर से खोखला कर रही है। सूरत की वह गिरती हुई टंकी केवल ईंट-पत्थर का ढेर नहीं थी, बल्कि वह राज्य सरकार के 'जीरो टॉलरेंस' के दावों की पोल खोलती एक शर्मनाक तस्वीर थी।
जब तक निर्माण की गुणवत्ता से समझौता करने वालों को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, तब तक २१ करोड़ क्या, २१०० करोड़ भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ते रहेंगे। जनता जाग रही है, और यह 'कागज के महल' अब और नहीं चलेंगे।
-Abhijit
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