
भारत के लोकतंत्र की आत्मा अगर कहीं सबसे ज़्यादा आहत हो रही है, तो वह चुनावी प्रक्रिया और नागरिक पहचान के साथ हो रहे खेल में है। शाहबुद्दीन राठौड़ के बाद अब हाजी कासम राठौड़ उर्फ़ हाजी रमकड़ू—जिन्हें देश ने 26 तारीख़ को पद्मश्री के लिए नाम घोषित किया—उन्हीं के नाम को मतदाता सूची से हटाने की कोशिश, इस सड़ी हुई राजनीति का ताज़ा और शर्मनाक उदाहरण है। यह केवल एक कलाकार का अपमान नहीं, बल्कि एक पूरे समुदाय की नागरिकता को संदेहास्पद ठहराने की साज़िश है।
दो दिन पहले देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, और दो दिन बाद वही नाम “संदिग्ध”! यह कैसा विरोधाभास है? यह कैसा लोकतंत्र है, जहाँ सरकार एक हाथ से सम्मान देती है और दूसरे हाथ से पहचान छीनने की कोशिश होने देती है? सवाल सिर्फ़ हाजी रमकड़ू का नहीं है—सवाल चुनाव आयोग की निष्पक्षता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की राजनीतिक नीयत पर है।
बीजेपी के एक नगरसेवक द्वारा यह कहकर आपत्ति दर्ज कराना कि “आधार में उपनाम ‘मीर’ है, राठौड़ संदिग्ध लगता है”—यह बयान कानूनी अज्ञानता नहीं,
बल्कि वैचारिक ज़हर को उजागर करता है। भारत में नाम,
उपनाम और पहचान की बहुलता कोई अपराध नहीं। यह देश की सांस्कृतिक विरासत है। मगर सत्ता के संरक्षण में पनप रही राजनीति इसे “संदेह” में बदल देती है—ख़ासकर तब, जब नाम के साथ “मुस्लिम” जुड़ा हो।
चुनाव आयोग—जिसे संविधान ने स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रहरी बनाया—आज सवालों के घेरे में है। क्या मतदाता सूची से नाम हटाने जैसी गंभीर प्रक्रिया इतनी हल्की आपत्तियों पर आगे बढ़ सकती है? क्या किसी पद्मश्री सम्मानित कलाकार को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कटघरे में खड़ा किया जाएगा? अगर जवाब “हाँ” है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, लोकतांत्रिक पतन है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार “सबका साथ, सबका विकास” का नारा देते हैं। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? कलाकारों को सम्मानित करना कैमरों के सामने अच्छा लगता है, मगर उनकी पहचान की रक्षा करना सरकार की ज़िम्मेदारी भी है। जब सत्ता पक्ष के नेता खुलेआम नाम और उपनाम के आधार पर नागरिकता पर सवाल उठाते हैं और सरकार चुप रहती है, तो यह चुप्पी सहमति बन जाती है।

यह कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं कि ऐसे विवाद बार-बार मुस्लिम कलाकारों के साथ ही सामने आते हैं। शाहबुद्दीन राठौड़ हों या हाजी रमकड़ू—जिन्होंने अपनी कला से सौराष्ट्र, गुजरात और भारत को देश-विदेश में गौरवान्वित किया—उन्हीं को शक की नज़र से देखा जाता है। यह कला का अपमान है, मेहनत का अपमान है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का सीधा उल्लंघन है।
मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया लोकतंत्र की रीढ़ है। इसमें ज़रा-सी भी राजनीतिक मिलावट, पूरे चुनावी तंत्र को दूषित कर देती है। चुनाव आयोग का यह दायित्व है कि वह ऐसी आपत्तियों को सख़्ती से खारिज करे और यह स्पष्ट संदेश दे कि पहचान की राजनीति को लोकतंत्र बर्दाश्त नहीं करेगा। दुर्भाग्य से,
आज आयोग की निष्क्रियता सवाल खड़े कर रही है।
यह भी सोचने वाली बात है कि अगर एक पद्मश्री सम्मानित नागरिक सुरक्षित नहीं, तो आम आदमी का क्या होगा? आज कलाकार, कल शिक्षक, परसों मज़दूर—कहीं यह सिलसिला थमेगा? या फिर नाम, धर्म और उपनाम के आधार पर नागरिकता की परीक्षा चलती रहेगी?
प्रधानमंत्री मोदी की सरकार को यह समझना होगा कि लोकतंत्र पुरस्कार समारोहों से नहीं, अधिकारों की रक्षा से मज़बूत होता है। चुनाव आयोग को राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम करना होगा। और सत्ता पक्ष के नेताओं को यह याद रखना होगा कि भारत कोई संदेह की प्रयोगशाला नहीं, बल्कि भरोसे का गणराज्य है।
आज ज़रूरत है स्पष्ट और साहसिक कार्रवाई की—हाजी रमकड़ू के नाम के साथ हुई इस शर्मनाक हरकत पर माफ़ी, दोषियों पर कार्रवाई और भविष्य में ऐसी सांप्रदायिक आपत्तियों पर ज़ीरो टॉलरेंस की नीति। वरना इतिहास यही लिखेगा कि एक दौर ऐसा भी था, जब भारत में कला को सम्मान मिला, लेकिन कलाकार को अपनी पहचान साबित करनी पड़ी।
- Abhijit
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