Wednesday, March 25, 2026

चुनावी बिसात पर 'यूनिफॉर्म' राजनीति: समानता का ढोंग या ध्रुवीकरण का नया हथियार?

गुजरात विधानसभा ने सात साढ़े सात घंटे की लंबी और तीखी बहस के बाद 'समान नागरिक संहिता' (UCC) विधेयक पारित कर दिया है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल द्वारा पेश किए गए इस बिल के पारित होते ही सत्ता पक्ष ने 'जय श्री राम' के नारों के साथ इसका स्वागत किया, लेकिन इस शोर-शराबे के बीच समानता के उस बुनियादी सिद्धांत की बलि चढ़ा दी गई, जिसका दावा यह बिल करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की 'डबल इंजन' सरकार ने इस विधेयक के जरिए जिस "चयनात्मक समानता" का परिचय दिया है, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला और विरोधाभासी पहलू यह है कि एक तरफ तो सरकार 'एक देश, एक कानून' का नारा बुलंद कर रही है, वहीं दूसरी तरफ गुजरात की कुल आबादी के लगभग 14.8% हिस्से (लगभग 89 लाख से अधिक लोग) यानी आदिवासी समुदाय को इस कानून से पूरी तरह बाहर रखा गया है। यदि यह कानून वास्तव में नागरिक अधिकारों में समानता लाने के लिए है, तो आदिवासियों के लिए अलग नियम और मुस्लिमों के लिए अलग मापदंड क्यों? क्या यह प्रधानमंत्री की उस 'सबका साथ, सबका विकास' वाली नीति का हिस्सा है, जिसमें विकास और न्याय के पैमाने समुदाय विशेष के वोट बैंक को देखकर तय किए जाते हैं?

डबल इंजन सरकार का दोहरा मापदंड

भाजपा की रणनीति स्पष्ट है: आदिवासियों को नाराज करना ताकि उनका वोट बैंक सुरक्षित रहे, और दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर अपनी कोर विचारधारा को धार देना। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने सदन में कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय में चचेरे भाई-बहनों के बीच विवाह की परंपरा है, लेकिन यह कानून उन पर सख्ती से लागू होगा, जबकि आदिवासी परंपराओं को संवैधानिक संरक्षण के नाम पर छेड़ा नहीं जाएगा।

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या केवल मुस्लिम महिलाओं को ही "न्याय और सशक्तिकरण" की आवश्यकता है? क्या आदिवासी समाज की कुरीतियों या उनके व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की गुंजाइश नहीं है? सच तो यह है कि सरकार आदिवासियों के गुस्से से डरी हुई है। गुजरात के साबरकांठा से लेकर डांग तक फैला आदिवासी बेल्ट भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। उनकी प्रथागत कानून (Customary Laws) और संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत मिलने वाले अधिकारों को छूने का मतलब था एक बड़ा विद्रोह मोल लेना। इसलिए, सरकार ने चतुराई से उन्हें "संरक्षण" दिया, लेकिन मुस्लिम समुदाय के धार्मिक और व्यक्तिगत कानूनों को 'समानता' के नाम पर कुचलने की ठान ली।

मुस्लिम समुदाय को निशाना और 'शरिया' का सवाल

सदन में बहस के दौरान हलाला, शाह बानो केस और यहां तक कि श्रद्धा वालकर हत्याकांड जैसे संवेदनशील मुद्दों का उल्लेख किया गया। विपक्षी विधायक इमरान खेड़ावाला ने बिल्कुल सही तर्क दिया कि यह बिल सुधार के लिए नहीं, बल्कि एक "राजनीतिक एजेंडा" है। उन्होंने चुनौती दी कि मुस्लिम समाज की महिलाएं इस कानून की मांग नहीं कर रही हैं और समाज शरिया कुरान के अनुसार चलता है।

डबल इंजन सरकार ने इस बहस को जिस तरह से 'चार बीवियों' और 'हलाला' तक सीमित कर दिया, उससे साफ झलकता है कि उनकी मंशा सामाजिक सुधार की कम और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ज्यादा थी। जब सरकार कहती है कि "सख्त पुलिस कार्रवाई ही समाधान है", तो वह यह भूल जाती है कि कानून का उद्देश्य न्याय देना होता है, कि किसी विशेष समुदाय को डराना।

चुनावी चश्मा और जनहित की अनदेखी

कांग्रेस विधायक शैलेश परमार ने सदन में जो सवाल उठाए, वे सरकार की प्राथमिकताओं की पोल खोलते हैं। जब बजट जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होती है, तब सत्ता पक्ष के विधायक सदन से नदारद रहते हैं। लेकिन जैसे ही UCC जैसा भावनात्मक और ध्रुवीकरण करने वाला मुद्दा आता है, पूरी 'डबल इंजन' मशीनरी दोगुनी ताकत से सक्रिय हो जाती है। चुनाव नजदीक हैं, और जब विकास के आंकड़े और बेरोजगारी के सवाल सरकार को घेरने लगते हैं, तब ऐसे "संवैधानिक हथकंडे" अपनाए जाते हैं।

गुजरात में आदिवासियों की साक्षरता दर (लगभग 62.5%) और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति आज भी सामान्य वर्ग से काफी पीछे है। उनके जल-जंगल-जमीन के अधिकारों पर सरकार की चुप्पी और UCC से उन्हें मिली "छूट" यह साबित करती है कि भाजपा उन्हें केवल एक सुरक्षित वोट बैंक मानती है, नागरिक नहीं।

संवैधानिक संकट और भविष्य

अब यह बिल राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास जाएगा। लेकिन क्या यह वास्तव में 'समान' है? एक ऐसा कानून जो आबादी के एक बड़े हिस्से को उसकी 'संस्कृति' के नाम पर छोड़ देता है और दूसरे को उसकी 'संस्कृति' के नाम पर दंडित करता है, वह 'समान नागरिक संहिता' कैसे हो सकता है? यह तो 'विभाजनकारी नागरिक संहिता' है।

प्रधानमंत्री मोदी वैश्विक मंचों पर भारत को "लोकतंत्र की जननी" कहते हैं, लेकिन उनके अपने गृह राज्य में लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है। यदि समानता का संकल्प राष्ट्रीय है, तो वह अखंड होना चाहिए। खंडित समानता केवल अन्याय का दूसरा नाम है।

गुजरात का यह UCC बिल तो न्याय के लिए है, समानता के लिए। यह केवल आगामी चुनावों में वोटों की फसल काटने के लिए बोया गया ध्रुवीकरण का बीज है। आदिवासियों को बाहर रखना भाजपा की मजबूरी है और मुस्लिमों को शामिल करना उसकी राजनीतिक जरूरत। इस दोहरी राजनीति ने गुजरात के सामाजिक ताने-बाने को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ 'न्याय' की परिभाषा सत्ता की सुविधा के अनुसार बदली जा रही है।

डबल इंजन सरकार को यह समझना होगा कि संविधान की धारा 44 का लक्ष्य राष्ट्र को जोड़ना था, कि समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना। आदिवासियों के अधिकारों का संरक्षण स्वागत योग्य है, लेकिन इसे दूसरे समुदायों के खिलाफ हथियार बनाना घोर निंदनीय है। यह बिल समानता का स्मारक नहीं, बल्कि भाजपा की अवसरवादी राजनीति का दस्तावेज है।

- Abhijit

25/03/2026

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