मध्य-पूर्व में तेजी से भड़कते युद्ध ने एक बार फिर पूरी दुनिया को अस्थिरता के दौर में धकेल दिया है। अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने न केवल क्षेत्रीय शांति को खतरे में डाला है बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन को भी संकट में डाल दिया है। इसी बीच ईरान के नए सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई ने पद संभालने के बाद अपने पहले ही संदेश में अमेरिका और इज़राइल को कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने साफ कहा कि यदि अमेरिका ने मध्य-पूर्व में अपने सैन्य अड्डे बंद नहीं किए तो उन पर हमले जारी रहेंगे और इज़राइल तथा अमेरिका को ईरान पर हमलों की “कीमत चुकानी पड़ेगी”।
ईरान के इस कड़े संदेश के साथ ही एक और बयान ने दुनिया का ध्यान खींचा - ईरान ने संकेत दिया कि मौजूदा हालात में
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलना संभव नहीं है। यह वही समुद्री मार्ग है जिससे दुनिया के लगभग एक तिहाई तेल की आपूर्ति गुजरती है। ऐसे में यदि यह मार्ग बंद होता है तो उसका प्रभाव केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
लेकिन इस पूरे संकट के दौरान भारत के कई टीवी समाचार चैनलों का व्यवहार बेहद चिंताजनक रहा है। पत्रकारिता की जगह उत्तेजना, विश्लेषण की जगह प्रचार और तथ्य की जगह सनसनी ने ले ली है। कई चैनलों ने 'सोर्स' के हवाले से यह खबर चलानी शुरू कर दी कि ईरान ने भारत के तिरंगे जहाजों को विशेष अनुमति देकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने दिया जाएगा। यह खबर इतनी तेजी से फैलाई गई मानो भारत को युद्ध के बीच कोई “विशेष कूटनीतिक विजय” मिल गई हो।
हालांकि भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस पर बेहद संतुलित और जिम्मेदार बयान दिया। उन्होंने कहा कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री के बीच हाल के दिनों में तीन बार बातचीत हुई है, जिसमें समुद्री सुरक्षा और भारत की ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई है। लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस समय किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाज़ी होगी।
यहीं से भारतीय टीवी मीडिया की समस्या सामने आती है। पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है - तथ्यों की पुष्टि, संदर्भ का विश्लेषण और दर्शकों को संतुलित जानकारी देना। लेकिन आज कई चैनल युद्ध को एक “टीवी शो” में बदल चुके हैं। स्टूडियो में बैठे एंकर युद्ध के नक्शे बनाते हैं, मिसाइलों की दिशा बताते हैं और खुद को किसी सैन्य रणनीतिकार की तरह प्रस्तुत करते हैं। इस पूरे तमाशे में सबसे बड़ी हानि सत्य की होती है।
असल समस्या यह है कि भारत के कई बड़े चैनल अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भी घरेलू राजनीतिक बहस की तरह प्रस्तुत करते हैं। उनके लिए हर खबर “हम बनाम वे” के चश्मे से देखी जाती है। ईरान-इज़राइल संघर्ष जैसे जटिल मुद्दे को भी वे ऐसे दिखाते हैं मानो यह किसी क्रिकेट मैच की तरह हो - कौन जीत रहा है, कौन हार रहा है।
इस संदर्भ में अमेरिका की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठते हैं। डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने पहले ही मध्य-पूर्व की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया था। ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका के हटने के बाद क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ता गया। आज जो स्थिति बनी है, वह केवल एक दिन में पैदा नहीं हुई बल्कि वर्षों की आक्रामक नीतियों और कूटनीतिक विफलताओं का परिणाम है।
इसी तरह इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की रणनीति भी विवादों से घिरी रही है। ईरान के तेल डिपो और सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमले करके इज़राइल ने इस संघर्ष को और अधिक खतरनाक बना दिया है। जब किसी क्षेत्र में पहले से तनाव मौजूद हो, तब इस तरह की सैन्य कार्रवाई पूरे इलाके को युद्ध की आग में झोंक सकती है।
दुर्भाग्य से भारतीय मीडिया के कुछ हिस्से इन जटिल कूटनीतिक सवालों को उठाने के बजाय एकतरफा नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं। वे यह पूछने से बचते हैं कि क्या लगातार सैन्य हमले वास्तव में क्षेत्रीय स्थिरता ला सकते हैं? क्या युद्ध की राजनीति से आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है? और सबसे महत्वपूर्ण - क्या दुनिया को एक और बड़े युद्ध की ओर धकेलना किसी भी देश के हित में है?
मीडिया का काम सत्ता या किसी अंतरराष्ट्रीय शक्ति के प्रचारक की तरह व्यवहार करना नहीं है। उसका काम सवाल पूछना है। यदि अमेरिकी या इज़राइली नीतियां क्षेत्र में तनाव बढ़ा रही हैं तो उस पर आलोचनात्मक चर्चा होनी चाहिए। यदि ईरान के बयान से वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हो सकता है तो उसके आर्थिक परिणामों का विश्लेषण होना चाहिए।
भारत जैसे देश के लिए यह मुद्दा और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारी ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से जुड़ा है। यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होता है तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं और उसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। इसलिए इस संकट को भावनाओं या सनसनी के बजाय रणनीतिक दृष्टि से समझने की जरूरत है।
आज के दौर में सूचना भी एक प्रकार का हथियार बन चुकी है। जब टीवी चैनल अपुष्ट खबरों को बार-बार प्रसारित करते हैं, तब वे अनजाने में किसी न किसी राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बन जाते हैं। इससे न केवल दर्शकों में भ्रम फैलता है बल्कि देश की कूटनीतिक स्थिति भी प्रभावित हो सकती है।
भारत की पत्रकारिता की एक लंबी और समृद्ध परंपरा रही है, जिसमें तथ्यों की गंभीर जांच और संतुलित दृष्टिकोण को महत्व दिया जाता था। लेकिन टीआरपी की दौड़ और राजनीतिक ध्रुवीकरण ने उस परंपरा को कमजोर कर दिया है। आज जरूरत है कि मीडिया फिर से अपने मूल सिद्धांतों की ओर लौटे।
मध्य-पूर्व का यह संघर्ष केवल तीन देशों के बीच का युद्ध नहीं है। यह वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़ा हुआ संकट है। ऐसे समय में जिम्मेदार पत्रकारिता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।
यदि भारतीय टीवी चैनल सच में देशहित की बात करते हैं, तो उन्हें युद्ध की उत्तेजना को बढ़ावा देने के बजाय तथ्यों और विश्लेषण पर आधारित रिपोर्टिंग करनी चाहिए। क्योंकि अंततः पत्रकारिता का असली उद्देश्य दर्शकों को उत्तेजित करना नहीं बल्कि उन्हें जागरूक करना होता है।
- Abhijit
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