गुजरात, जिसे ‘विकास मॉडल’ के रूप में पेश किया जाता है, आज एक ऐसे विरोधाभास से जूझ रहा है जो किसी भी संवेदनशील समाज के लिए शर्मनाक है। एक तरफ सरकार ‘कुपोषण मुक्त’ होने के दावे करती है, वहीं दूसरी ओर लाखों बच्चे आज भी अधूरी थाली और कमजोर शरीर के साथ भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं। ₹5 के ‘पौष्टिक नाश्ते’ का दावा, बंद होती पारंपरिक पोषण योजनाएं और जमीनी स्तर पर फैली अव्यवस्था यह सवाल उठाती है - क्या विकास सिर्फ कागजों और विज्ञापनों तक सीमित है?
₹5 का 'मजाक' और मंत्रियों के शाही भोज
राज्य सरकार की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा प्रमाण 'मुख्यमंत्री पौष्टिक अल्पहार योजना' है। वर्ष 2024 में बड़े जोर-शोर से शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य 32,277 स्कूलों के लगभग 38 लाख छात्रों को पूरक आहार देना था। लेकिन क्या आपको पता है कि एक बच्चे के पोषण के लिए सरकार ने कितनी राशि तय की है? मात्र ₹5 प्रति छात्र।
आज के दौर में जब महंगाई आसमान छू रही है, ₹5 में एक कप चाय भी ढंग से नहीं मिलती, वहां सरकार बच्चों को 'पौष्टिक नाश्ता' देने का दावा कर रही है। इससे भी अधिक विचलित करने वाली बात यह है कि जहां सरकारी स्कूलों के बच्चों को ग्राम के हिसाब से मापा हुआ सूखा नाश्ता दिया जाता है, वहीं राज्य के मंत्रियों और अधिकारियों के सरकारी कार्यक्रमों में ₹400 से ₹500 प्रति प्लेट वाली महंगी और शाही डिश परोसी जाती हैं। क्या सत्ता के गलियारों में बैठने वालों का पेट बच्चों की भूख से ज्यादा कीमती है? यह नीति स्पष्ट रूप से सरकार के 'दोहरे मापदंड' और गरीब विरोधी मानसिकता को उजागर करती है।
NGO बनाम स्थानीय स्कूल: भेदभाव की राजनीति
पीएम पोषण योजना के क्रियान्वयन में भी सरकार की नीयत साफ नहीं दिखती। राज्य के करीब 5000 केंद्रों पर भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी निजी एनजीओ को दी गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिन स्कूलों में स्थानीय स्तर पर भोजन तैयार किया जाता है, वहां के प्रशासकों को एनजीओ की तुलना में बहुत कम भुगतान किया जाता है।
इतना ही नहीं, सेंट्रलाइज्ड किचन से जो खाना बच्चों तक पहुंचता है, वह स्कूलों तक आते-आते पूरी तरह ठंडा हो चुका होता है। भोजन की गुणवत्ता और तापमान को लेकर लगातार शिकायतें मिलने के बावजूद सरकार निजी संस्थाओं को करोड़ों का ठेका देने में मशगूल है, जबकि स्थानीय रसोई प्रणालियों को फंड की कमी के नाम पर हाशिए पर धकेल दिया गया है।
श्रमिकों का शोषण: न्यूनतम वेतन अधिनियम की धज्जियां
भूपेंद्र पटेल सरकार न केवल बच्चों के पोषण के साथ खिलवाड़ कर
रही है, बल्कि उन गरीब रसोइयों और सहायकों का भी शोषण कर रही है जो इन बच्चों के लिए भोजन तैयार करते हैं। गुजरात में न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत जो दरें निर्धारित हैं, स्कूलों में काम करने वाले इन कर्मचारियों को उससे कहीं कम पारिश्रमिक दिया जा रहा है। अक्टूबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, जहां एक अकुशल श्रमिक का दैनिक वेतन लगभग ₹500 होना चाहिए, वहां इन कर्मियों को केवल नाममात्र का 'मानदेय' देकर टरका दिया जाता है। क्या एक 'कल्याणकारी राज्य' की यही परिभाषा है जहाँ सरकार खुद ही श्रम कानूनों का उल्लंघन करे?
सुखड़ी योजना पर 'ताला': फिट इंडिया के नाम पर पोषण से समझौता
कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में 'सुखड़ी' (गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बना पारंपरिक व्यंजन) एक महत्वपूर्ण हथियार था। वर्ष 2013-14 में सप्ताह में एक दिन सुखड़ी देने की योजना शुरू हुई थी। मार्च 2024 में सरकार ने इसके लिए बजट बढ़ाकर ₹30 करोड़ किया था ताकि बच्चों को कैलोरी और सूक्ष्म पोषक तत्व मिल सकें। लेकिन अचानक 'फिट इंडिया' अभियान और 'वसा कम करने' के अजीबोगरीब तर्क के नाम पर इस पारंपरिक और पोषक आहार को पूरी तरह बंद कर दिया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि 'फिट इंडिया' के नियम उन बच्चों के लिए हैं जो मोटापे से जूझ रहे हैं, न कि उन बच्चों के लिए जो गंभीर रूप से कम वजन के शिकार हैं। सुखड़ी को हटाकर उसकी जगह बाजरे की सुखड़ी या हल्का नाश्ता लाना असल में लागत कम करने का एक बहाना मात्र है। सरकार ने यह नहीं सोचा कि आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के लिए वह एक दिन की सुखड़ी ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत थी।
क्या यही है 'विकसित गुजरात'?
नीति आयोग के एसडीजी इंडेक्स में गुजरात 'हंगर इंडेक्स' में पिछड़ता जा रहा है। प्रति व्यक्ति आय में शीर्ष राज्यों में होने के बावजूद पोषण के मामले में गुजरात का बिहार और झारखंड की कतार में खड़ा होना मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व पर गंभीर सवालिया निशान लगाता है।
मुख्यमंत्री जी, जब तक राज्य का बच्चा भूखा और कुपोषित है, तब तक वाइब्रेंट गुजरात और जी-20 जैसे आयोजनों की चमक फीकी है। ₹5 के नाश्ते और ठंडे खाने से कुपोषण नहीं मिटेगा। इसके लिए विज्ञापनों वाली 'राजनीति' नहीं, बल्कि बच्चों की थाली के प्रति 'ईमानदारी' चाहिए। अगर सरकार ने जल्द ही अपनी नीतियों में सुधार नहीं किया और बजट आवंटन को वास्तविक महंगाई के अनुरूप नहीं बढ़ाया, तो आने वाली पीढ़ी इस संवेदनहीनता के लिए वर्तमान नेतृत्व को कभी माफ नहीं करेगी।
- Abhijit
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