पिछले तीन दिनों से रुपया लगातार गोते लगा रहा है। कारण बताए जा रहे हैं—ईरान के साथ अमेरिका-इजरायल का युद्ध और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतें। लेकिन क्या सिर्फ वैश्विक परिस्थितियां ही इसके लिए जिम्मेदार हैं? या फिर हमारी विदेश नीति और आर्थिक प्रबंधन की विफलताएं भी इस खाई को गहरा कर रही हैं?
आंकड़ों की भयावहता: 14 साल की सबसे बड़ी गिरावट
आंकड़े झूठ नहीं बोलते। पिछले एक महीने में रुपया करीब 4% टूट चुका है। यदि हम वित्तीय वर्ष 2025-26 की बात करें, तो यह गिरावट 10% से अधिक हो चुकी है। यह पिछले 14 वर्षों में भारतीय मुद्रा की सबसे बड़ी गिरावट है। विदेशी ब्रोकरेज फर्म 'बर्नस्टीन' की ताजा रिपोर्ट तो और भी डरावनी है; उनका कहना है कि यदि ईरान युद्ध लंबा खिंचा, तो रुपया बहुत जल्द 98 के स्तर को भी पार कर सकता है।
जब रुपया गिरता है, तो सिर्फ डॉलर महंगा नहीं होता, बल्कि हर भारतीय की थाली महंगी होती है। पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते हैं, परिवहन महंगा होता है और अंततः महंगाई मध्यम वर्ग की कमर तोड़ देती है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि जो सरकार 'महंगाई डायन' के गीतों पर सत्ता में आई थी, वह आज पूरी तरह मौन है।
मोदी जी, आपकी 'प्रतिष्ठा' अब कहां है?
इतिहास के पन्ने पलटिए। साल 2013 का वह समय याद कीजिए जब रुपया डॉलर के मुकाबले 60 के करीब पहुंचा था। तब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर तीखे हमले किए थे। उन्होंने कहा था, "जिस तरह रुपया गिर रहा है, वैसे ही प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा भी गिर रही है।" उन्होंने यह भी तंज कसा था कि "रुपये और दिल्ली सरकार के बीच होड़ लगी है कि कौन ज्यादा नीचे गिरेगा।"
आज वही नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। रुपया 60 से गिरकर 95 के पार चला गया है। आज उनकी 'प्रतिष्ठा' किस पाताल में है? भाजपा के वे तमाम नेता जो उस वक्त सड़कों पर सिलेंडर लेकर प्रदर्शन करते थे, आज उन्हें जैसे सांप सूंघ गया है। आज न कोई ट्वीट आता है, न कोई तीखा बयान। क्या सत्ता में आते ही रुपये की गिरावट 'राष्ट्रीय आपदा' से बदलकर 'वैश्विक मजबूरी' बन गई?
विफल विदेश नीति और आर्थिक अदूरदर्शिता
इस सरकार की विदेश नीति को अक्सर 'विश्वगुरु' बनने की दिशा में एक मास्टरस्ट्रोक बताया जाता है। लेकिन हकीकत यह है कि जब संकट की घड़ी आई, तो हमारी रणनीतिक स्वायत्तता कहीं नजर नहीं आ रही। कच्चे तेल के लिए हमारी निर्भरता और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने हमारी अर्थव्यवस्था को घुटनों पर ला दिया है।
सरकार का दावा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था सबसे तेजी से बढ़ रही है, लेकिन अगर मुद्रा ही सुरक्षित नहीं है, तो यह विकास किसके काम का? विदेशी संस्थागत निवेशक तेजी से भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। बर्नस्टीन जैसी फर्मों की चेतावनियां स्पष्ट कर रही हैं कि भारत की बाहरी झटकों को सहने की क्षमता कमजोर हो चुकी है।
चुप्पी तोड़िए प्रधानमंत्री जी
डॉ. मनमोहन सिंह को 'मौन मोहन' कहने वाले आज खुद मौन धारण किए हुए हैं। एक तरफ देश का रुपया आईसीयू में है और दूसरी तरफ सरकार अपनी छवि चमकाने में व्यस्त है। जनता जानना चाहती है कि क्या 100 का आंकड़ा पार करने के बाद ही सरकार की नींद खुलेगी?
प्रधानमंत्री जी, देश की मुद्रा आपकी विदेश नीति और आर्थिक विफलता का रिपोर्ट कार्ड है। अब समय आ गया है कि आप कैमरा और रैलियां छोड़कर देश की गिरती साख और डूबते रुपये को बचाने की चिंता करें। वरना इतिहास आपको एक ऐसे नेता के रूप में याद रखेगा जिसने दूसरों की आलोचना तो जमकर की, लेकिन जब खुद की बारी आई, तो जिम्मेदारियों से मुंह फेर लिया।
95.22 का आंकड़ा महज एक नंबर नहीं,
बल्कि एक आम भारतीय के विश्वास का टूटना है। अब देखना यह है कि 'सांप सूंघने' वाली यह स्थिति कब तक बनी रहती है।
-Abhijit
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