Tuesday, March 3, 2026

एक पुरानी दोस्ती और नई मजबूरियों का सौदा: कहाँ गया भारत का स्वाभिमान?

भारत और ईरान के संबंध महज़ कूटनीति की फाइलों तक सीमित नहीं रहे हैं; ये इतिहास, संस्कृति और साझा हितों की मज़बूत बुनियाद पर टिके रहे हैं। लेकिन आज जब पश्चिम एशिया की धरती रक्त से भीग रही है और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या कर दी गई है, तब भारत की चुप्पी खामोशी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक आत्मसमर्पण जैसी प्रतीत होती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इज़राइल यात्रा के ठीक अगले दिन अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान पर हमला किया। इस हमले में ईरान के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व, खामेनेई की जान चली गई। दुनिया के कई देशों ने इस पर प्रतिक्रिया दी, लेकिन विश्व गुरु बनने की चाह रखने वाला भारत अपने सबसे पुराने सहयोगियों में से एक के साथ खड़ा होने की हिम्मत तक नहीं जुटा सका।

इंदिरा गांधी का वह दौर और मोदी का यह दौर


वर्ष 1982 की वह तस्वीर याद कीजिए, जब भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने खड़ी थीं। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा था "एक दोस्ती दूसरी दोस्ती के आड़े नहीं सकती।" यह वह दौर था जब भारत अपनी विदेश नीति की मर्जी का मालिक था। हम अमेरिका के साथ हाथ मिलाते थे, तो सोवियत संघ या ईरान जैसे दोस्तों की पीठ में छुरा नहीं घोंपते थे।

परंतु आज, "एक दोस्ती" के नाम पर दूसरी दोस्ती की बलि दी जा रही है। प्रधानमंत्री मोदी की इज़राइल और अमेरिका के साथ बढ़ती नज़दीकियां क्या इतनी महंगी पड़ेंगी कि हमें अपने पुराने दोस्तों की मय्यत पर मातम मनाने से भी रोक दिया जाएगा?

हैदराबाद हाउस में कूटनीतिक शब्दों का मायाजाल

सोमवार सुबह जब दिल्ली के हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री मोदी और कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की मुलाकात हुई, तो पूरी दुनिया की नज़रें भारत के आधिकारिक बयान पर थीं। पश्चिम एशिया में छिड़े इस युद्ध पर प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत चिंतित है और शांति चाहता है। उन्होंने संवाद के जरिए समाधान की बात कही।

ये शब्द सुनने में बहुत 'शांतिप्रिय' और 'संतुलित' लगते हैं, लेकिन इनमें वह कड़वा सच छिपा है जिसे सरकार स्वीकार नहीं करना चाहती। प्रधानमंत्री ने तो अमेरिका-इज़राइल की आक्रामकता की निंदा की और ही अयातुल्ला खामेनेई की मौत पर शोक व्यक्त किया। यह वही ईरान है जिसने मुश्किल वक्त में भारत का साथ दिया, जिसने चाबहार बंदरगाह के जरिए भारत को मध्य एशिया का रास्ता दिया। आज उसी दोस्त के घर में मातम है और हमारे प्रधानमंत्री कूटनीतिक शब्दों के जाल में अपनी 'मजबूरी' छिपा रहे हैं।

क्या इज़राइल प्रेम में हम अंधे हो चुके हैं?

प्रधानमंत्री मोदी की इज़राइल यात्रा के तुरंत बाद इस हमले का होना कई सवाल खड़े करता है। क्या भारत को इस हमले की भनक थी? और अगर थी, तो क्या हमने अपने पुराने मित्र ईरान को सचेत करने की कोशिश की? आलोचना इस बात की नहीं है कि हम इज़राइल के मित्र हैं, बल्कि इस बात की है कि हम उस मित्रता के दबाव में इतने झुक गए हैं कि न्याय और अन्याय के बीच का अंतर भूल गए हैं।

ईरान केवल एक देश नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। अयातुल्ला खामेनेई की हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं है, बल्कि एक पूरे राष्ट्र की संप्रभुता पर प्रहार है। क्या भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) अब सिर्फ कागजों पर रह गई है? क्या हम अब वाशिंगटन और तेल अवीव की इच्छाओं के बंधक बन चुके हैं?

चुप्पी के मायने और गिरता साख

जब आप अन्याय के समय तटस्थ रहने का नाटक करते हैं, तो वास्तव में आप अत्याचारी का साथ दे रहे होते हैं। प्रधानमंत्री की यह चुप्पी ईरान के लोगों को एक कड़ा संदेश दे रही हैकि भारत एक ऐसा दोस्त है जो अच्छे वक्त में तो साथ रहता है, लेकिन जब सरहदें गोलियों से गूँजती हैं, तो वह 'शांति' और 'संवाद' के जुमले उछालकर पीछे हट जाता है।

मोदी सरकार की विदेश नीति को अक्सर 'मज़बूत' बताया जाता है, लेकिन यह मज़बूती तब कहाँ गायब हो जाती है जब अमेरिका के खिलाफ खड़े होने की बात आती है? क्या हमारी विदेश नीति अब 'चुन-चुन कर बोलने' (Selective Outrage) की नीति बन गई है?

खोता हुआ आत्मसम्मान

भारत ने हमेशा गुटनिरपेक्षता और न्याय का झंडा बुलंद किया है। लेकिन आज की कूटनीति में स्वाभिमान की जगह 'मजबूरी' ने ले ली है। इंदिरा गांधी ने अमेरिका की धरती पर खड़े होकर भारत के आत्मसम्मान की रक्षा की थी, लेकिन आज हम अपनी ही धरती पर एक पुराने दोस्त की शहादत पर चुप हैं।

यह चुप्पी आने वाले समय में भारत के लिए महंगी साबित होगी। कूटनीति केवल व्यापारिक समझौतों और फोटो-अप्स का नाम नहीं है, यह विश्वसनीयता का खेल है। और आज, भारत ने ईरान की नज़रों में अपनी वह ऐतिहासिक विश्वसनीयता खो दी है। प्रधानमंत्री मोदी को यह समझना होगा कि दुनिया केवल मज़बूत अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि मज़बूत चरित्र और निष्ठा से चलती है।

अफ़सोस, आज भारत के पास कूटनीति तो है, लेकिन उसमें वह 'भारतीयता' और 'ईमानदारी' गायब है जो कभी हमारी पहचान हुआ करती थी।

- Abhijit

03/03/2026

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