Saturday, March 14, 2026

नाम नरेंद्र, काम सरेंडर: गैस संकट ने खोली केंद्र की नीतियों की पोल

भारत आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ वैश्विक युद्धों की आग हमारे देश के रसोई घरों तक पहुँच चुकी है। अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने केवल मध्य पूर्व को अस्थिर किया है, बल्कि भारत की गैस आपूर्ति श्रृंखला की कमर तोड़ दी है। लेकिन इस संकट की सबसे भयावह तस्वीर वह नहीं है जो समुद्र पार हो रही है, बल्कि वह है जो हमारे देश के भीतर 'सत्ता के अहंकार' और 'कुप्रबंधन' के रूप में दिखाई दे रही है।

गुजरात की धरती से लेकर दिल्ली के संसद भवन तक, आज केवल एक ही सवाल गूंज रहा हैक्या यही वह 'विश्वगुरु' होने का सपना था जहाँ आम जनता को फिर से चूल्हे और लकड़ी के युग में धकेला जा रहा है?

गुजरात: 'विकास' के मॉडल में चूल्हे की वापसी

गुजरात, जिसे भाजपा अपने विकास का 'पोस्टर बॉय' कहती है, आज गैस सिलेंडरों की भारी किल्लत से जूझ रहा है। राज्य के कई रेस्टोरेंट बंद होने की कगार पर हैं। जब व्यापार ठप हो रहा हो और रसोई सूनी पड़ रही हो, तब सरकार की चुप्पी आपराधिक जान पड़ती है।


विधानसभा में जो दृश्य देखने को मिला, वह जनता की पीड़ा का प्रतीक था। कांग्रेस विधायक अमित चावड़ा का कंधे पर सिलेंडर लेकर पहुंचना और तुषार चौधरी का सिर पर लकड़ियाँ ढोना मात्र एक विरोध प्रदर्शन नहीं था; यह उस कड़वी हकीकत का आईना था जिसे भाजपा सरकार झुठलाने की कोशिश कर रही है। विधायकों के पोस्टरों पर लिखा सवाल'क्या आपका विचार काम कर आया?' - प्रधानमंत्री के उन तमाम खोखले दावों पर सीधा प्रहार है जो उन्होंने 'उज्ज्वला' और 'सस्ती ऊर्जा' के नाम पर किए थे।

संसद में 'सरेंडर' की राजनीति

दिल्ली की सत्ता का गलियारा आज जनहित के मुद्दों से भागता नज़र रहा है। लोकसभा में विपक्षी सांसदों ने जब "नाम नरेंद्र, काम सरेंडर" के नारे लगाए, तो यह केवल तुकबंदी नहीं थी, बल्कि यह प्रधानमंत्री मोदी की उन नीतियों पर टिप्पणी थी जो संकट के समय घुटने टेक देती हैं। एक तरफ देश में गैस की हाहाकार मची है, और दूसरी तरफ सरकार चर्चा से भागने के लिए आठ सांसदों को निलंबित कर देती है।


राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा का संसद परिसर में ईंटों का चूल्हा जलाकर प्रदर्शन करना यह बताता है कि आज का 'न्यू इंडिया' वास्तव में पीछे की ओर कदम बढ़ा रहा है। जब प्रधानमंत्री कहते हैं कि "पैनिक करें," तो जनता समझ जाती है कि अब डरने का समय गया है। आखिर यह सरकार गैस की किल्लत को पहले से भांपने में विफल क्यों रही? क्यों हमारी ऊर्जा सुरक्षा इतनी कमज़ोर है कि विदेशी युद्ध छिड़ते ही देश की थाली सूनी हो जाती है?

भाजपा के 'जुमले' और मंत्रियों की विफलता

बीजेपी के मंत्रियों और नेताओं की टोली आज केवल हेडलाइन मैनेजमेंट में जुटी है। पेट्रोलियम मंत्री हों या अन्य वरिष्ठ नेता, किसी के पास भी इस बात का ठोस जवाब नहीं है कि जब आपूर्ति बाधित होने की आशंका थी, तो वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? क्या 'आत्मनिर्भर भारत' का मतलब यह है कि संकट आने पर जनता खुद के भरोसे लकड़ियाँ ढोए?


सरकार की विदेश नीति, जिसे बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था, आज बेनकाब हो गई है। हम जिस 'रणनीतिक संतुलन' की बात करते थे, उसने हमें ऊर्जा संकट से बचाने में कोई मदद नहीं की। "मोदी है तो मुमकिन है" का नारा अब महंगाई और किल्लत के साथ जुड़ गया है।

आर्थिक चोट और सामाजिक संकट

गैस संकट का असर केवल रसोई तक सीमित नहीं है। रेस्टोरेंट उद्योग के बंद होने से लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी छिन रही है। गुजरात के मध्यम और छोटे व्यापारी, जो कभी भाजपा के सबसे बड़े समर्थक थे, आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। जब सिलेंडर की कीमत और उपलब्धता आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि शासन तंत्र पूरी तरह विफल हो चुका है।

विपक्ष द्वारा इस्तेमाल किया गया स्लोगन "मोदी जी शर्म करो" आज हर उस गृहणी की आवाज़ है जो सुबह खाली सिलेंडर के साथ कतार में खड़ी होती है। यह सरकार केवल उत्सव मनाने और इवेंट करने में माहिर है, लेकिन जब वास्तविक प्रशासन और संकट प्रबंधन की बात आती है, तो यह पूरी तरह 'सरेंडर' कर देती है।

लोकतंत्र में संसद चर्चा के लिए होती है, विपक्ष को निलंबित करने के लिए नहीं। गुजरात से लेकर दिल्ली तक जो आक्रोश दिख रहा है, वह इस बात का सबूत है कि अब जनता का धैर्य जवाब दे रहा है। प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को यह समझना होगा कि मार्केटिंग से पेट नहीं भरता। अगर देश की ऊर्जा सुरक्षा की यही हालत रही, तो वह दिन दूर नहीं जब 'विकास' का यह गुब्बारा पूरी तरह फूट जाएगा।

भाजपा सरकार को अब अपनी तानाशाही छोड़कर ज़मीन पर उतरना चाहिए। निलंबन, दमन और जुमलों की राजनीति अब बंद होनी चाहिए। देश को लकड़ियाँ और धुआं नहीं, सस्ती और सुलभ गैस चाहिए।

- Abhijit

14/03/2026

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