आज शब्द कम पड़ रहे हैं और स्याही की जगह आंखों से लहू बह रहा है। क्या मानवता इतनी गिर चुकी है कि हम बच्चों की लाशों पर राजनीति करेंगे? ईरान के मीनाब शहर से आई तस्वीरें और खबरें दिल को दहला देने वाली ही नहीं, बल्कि इस तथाकथित सभ्य दुनिया के मुंह पर एक करारा तमाचा हैं। 168 मासूम बच्चियां... 168 वो कलियां जो अभी खिलने से पहले ही बारूद की भेंट चढ़ा दी गईं। यह कोई 'कोलैटरल डैमेज' नहीं है, यह सीधा-सीधा कत्लेआम है।
मौत का वो काला मंगलवार
ईरान का दक्षिणी शहर मीनाब, जो कभी अपनी शांति के लिए जाना जाता था, आज मातम के समुद्र में डूबा हुआ है। 'शजरे तय्यबा'
(Shajareh Tayyebeh) स्कूल, जहाँ शनिवार की सुबह बच्चियां अपने हाथों में कलम और आंखों में सपने लेकर पहुँची थीं, वहां अब सिर्फ मलबे के ढेर और खून से सनी किताबें बची हैं। एक ऐसी मिसाइल जो कथित तौर पर अमेरिका और इजरायल के साझा सैन्य अभियान का हिस्सा थी, उसने उस छत को ढहा दिया जिसके नीचे नन्हीं जानों का बसेरा था।
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने फेसबुक और एक्स (X) पर जो तस्वीर साझा की है, उसे देखकर पत्थर दिल इंसान भी रो पड़ेगा। 160 से अधिक ताज़ा खोदी गई कब्रें... छोटे-छोटे सफेद कफन... क्या इन मासूमों का कसूर सिर्फ इतना था कि वे ईरान की धरती पर पैदा हुई थीं? अरागची ने सही लिखा है, “ये कब्रें उन 160 से अधिक मासूम लड़कियों के लिए खोदी जा रही हैं जिनकी मौत तब हुई जब अमेरिकी-इजरायली बमबारी के दौरान एक मिसाइल उनके स्कूल से टकरा गई। उनके शरीर के चीथड़े उड़ गए। गज़ा से मीनाब तक, मासूमों की बेरहमी से हत्या की जा रही है।”
ट्रंप और नेतन्याहू: सत्ता के नशे में चूर 'कसाई'
यहाँ सवाल उठना लाजिमी है—डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू आखिर दुनिया को क्या संदेश देना चाहते हैं? क्या 'लोकतंत्र' और 'सुरक्षा' के नाम पर मासूमों का खून बहाना ही उनकी उपलब्धि है? डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता संभालते समय 'ईरानी लोगों के बचाव' का वादा किया था। क्या यही वो बचाव है, मिस्टर प्रेसिडेंट? क्या मिसाइलों से छोटे बच्चों के टुकड़े करना ही आपकी 'ग्रेट अमेरिका' वाली नीति है?
इतिहास आपको एक ऐसे नेता के रूप में याद रखेगा जिसने शांति वार्ताओं को ठुकराकर युद्ध की आग को हवा दी। और नेतन्याहू, जिनके हाथ पहले ही गज़ा के मासूमों के खून से रंगे हुए हैं, अब मीनाब की गलियों को भी कब्रिस्तान बना रहे हैं। इजरायल की सेना का यह कहना कि उन्हें इस हमले की जानकारी नहीं है, सरासर झूठ और बेशर्मी की पराकाष्ठा है। जब आपकी मिसाइलें जीपीएस और आधुनिक तकनीक से लैस हैं, तो क्या आपको एक स्कूल और सैन्य अड्डे का फर्क नजर नहीं आता? या शायद आपके लिए हर ईरानी बच्चा एक दुश्मन है?
लाखों का जनसैलाब और प्रतिशोध की ज्वाला
मंगलवार को जब मीनाब की सड़कों पर इन 160 बेटियों का जनाजा निकला, तो वह दृश्य प्रलय जैसा था। लाखों लोग सड़कों पर थे, लेकिन शोर से ज्यादा वहां सिसकियों की गूँज थी। उन माताओं को देखिए जो अपनी छाती पीट-पीट कर अपने जिगर के टुकड़ों को ढूंढ रही थीं। उन पिताओं की आंखों में देखिए, जहाँ दुख से ज्यादा प्रतिशोध की आग दहक रही है। जब एक पिता अपने 7 साल की बच्ची के पार्थिव शरीर के अवशेषों को एक छोटे से थैले में लेकर चलता है, तो वह केवल एक लाश नहीं ढो रहा होता, वह इस दुनिया के न्याय पर से विश्वास भी ढो रहा होता है।
ईरान और इजरायल का संघर्ष अब उस मोड़ पर पहुँच चुका है जहाँ से वापसी का रास्ता केवल तबाही की ओर जाता है। लेकिन इस तबाही की कीमत हमेशा आम नागरिक और बेगुनाह बच्चे क्यों चुकाते हैं?
पश्चिम की चुप्पी और दोहरे मापदंड
हैरत होती है उन मानवाधिकार संगठनों और पश्चिमी देशों पर, जो यूक्रेन में एक खिड़की टूटने पर हाय-तौबा मचाते हैं, लेकिन जब ईरान में 168 स्कूल की छात्राओं को जिंदा दफन कर दिया जाता है, तो वे 'जांच की प्रतीक्षा' करने लगते हैं। क्या इन भूरी आंखों वाली बच्चियों का खून सस्ता है? क्या उनके सपनों की कोई कीमत नहीं?
मिस्टर ट्रंप, आपने जिस 'बचाव'
का वादा किया था, वह हकीकत में मौत का पैगाम निकला। मीनाब की ये 168 रूहें आपसे और नेतन्याहू से सवाल पूछेंगी। जिस आग को आपने सुलगाया है, याद रखिये, उसकी लपटें केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेंगी। जब मासूमों का खून गिरता है, तो अर्श भी कांप उठता है।
आज पूरा मीनाब रो रहा है, पूरा ईरान गुस्से में है और दुनिया के न्यायप्रिय लोग शर्मिंदा हैं। मीनाब की हर कब्र आज अमेरिका और इजरायल की क्रूरता का वह जीता-जागता गवाह है, जिसे इतिहास कभी माफ नहीं करेगा।
- Abhijit
05/03/2026
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